Saturday, October 28, 2017

दैनिक समसामयिकी 28 Oct 2017(Saturday)

October 28, 2017 0
दैनिक समसामयिकी 28 Oct 2017(Saturday)

1.कैटेलोनिया ने खुद को स्पेन से आजाद घोषित किया

• कई दिनों से जारी राजनीतिक उठापटक के बीच कैटेलोनिया ने खुद को स्पेन से आजाद घोषित कर दिया है। शुक्रवार को स्थानीय संसद द्वारा पारित प्रस्ताव में कहा गया कि कैटेलोनिया ने एक स्वतंत्र, संप्रभु और सामाजिक लोकतांत्रिक राज्य का गठन किया है।
• संसद ने दूसरे देशों और संस्थानों से उसे मान्यता देने की अपील की है। प्रस्ताव में कहा गया है कि वह स्पेन के साथ नए गणराज्य की स्थापना में सहयोग करना चाहता है।
• जब यह प्रस्ताव पास हुआ तो स्वतंत्रता समर्थक हजारों लोग संसद भवन के बाहर जमा थे। हालांकि, विपक्षी सदस्यों ने संसद की बैठक में हिस्सा नहीं लिया। 1हालांकि, स्पेन ने कैटेलोनिया को आजाद देश मानने से इन्कार कर दिया है।
• स्पेन की सीनेट ने कैटेलोनिया में केंद्रीय शासन लगाने की अनुमति दे दी है। कैटेलोनिया द्वारा आजादी की घोषणा के तुरंत बाद स्पेन के प्रधानमंत्री मारियानो राखोय ने लोगों से शांत रहने की अपील की और कहा कि वहां कानून का राज शीघ्र स्थापित किया जाएगा।
• स्वतंत्रता समर्थक गठबंधन के सांसद मारता रोविरा ने बहस में भाग लेते हुए कहा कि यह इतना आसान नहीं है। आजादी हमें मुफ्त में मिलने नहीं जा रही है। एक ही दिन में सबकुछ नहीं बदला जाएगा। लेकिन, एक स्वतंत्र कैटेलोनिया की प्रक्रिया शुरू करने के अलावा हमारे पास कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है।
• हालांकि, कैटेलोनिया द्वारा आजादी की घोषणा सांकेतिक कदम है, क्योंकि स्पेन के अलावा अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी स्वीकार नहीं करेगा। लेकिन इस कदम ने स्पेन के राजनीतिक संकट को चार दशकों के सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया है।
• कई वर्षो से था लोगों में गुस्सा : कैटेलोनिया में स्पेन की करीब 16 फीसद आबादी रहती है। यह देश का पूर्वोत्तर  इलाका है। स्पेन की आर्थिक क्षमता में उसका हिस्सा 20 फीसद है। मैडिड के कथित हस्तक्षेप के खिलाफ गुस्सा कई वर्षो से उबल रहा था, जिसकी पराकाष्ठा इस साल एक अक्टूबर को आजादी पर जनमत संग्रह के रूप में सामने आई।
• अदालतों और केंद्रीय सरकार ने इसे गैरकानूनी घोषित कर दिया। इसके बावजूद मतदान हुआ और करीब 90 फीसद लोगों ने आजादी का पक्ष लिया। हालांकि, सिर्फ 43 फीसद लोगों ने मतदान में भाग लिया था। कैटेलोनिया के स्पेन से आजाद होने की घोषणा के बाद बार्सिलोना में संसद के बाहर जमा कैटेलोनिया के समर्थकों की भीड़।
• दूसरे देशों और संस्थानों से की मान्यता देने की अपील 14स्पेन सरकार ने कैटेलोनिया को प्रत्यक्ष नियंत्रण में लेने का किया फैसला

2. स्वदेशी पर कायम इसरो, खुद बनाएगा नैनो एंटीना
• डाईइलेक्टिक रेसोनेटर एंटीना विद मेटा मैटेरियल बनाने की तकनीक फिलहाल नासा, यूरोपियन यूनियन व रूसी स्पेस एजेंसी के पास ही है।
• भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने इस कमी को दूर करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। इस काम के लिए भारतीय प्रोद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) धनबाद को जिम्मा सौंपा गया है। जिसका दावा है कि दो साल के भीतर वह नैनो-एंटीना यानी डाईइलेक्टिक रेसोनेटर एंटीना विद मेटा मैटेरियल बनाने में सफल हो जाएगा।
• इसरो ने दुनियाभर में अपना डंका बजाया है। सटीक और कारगर उपग्रह तकनीक, सस्ती व सफलतम उपग्रह प्रक्षेपण प्रणाली और चंद्रयान व मंगलयान जैसी महत्वाकांक्षी उड़ानों ने इसरो को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी स्थान पर ला खड़ा किया है।
•  आने वाला समय छोटे उपग्रहों का होगा। हल्के व उच्च क्षमता युक्त उपग्रहों यानी नैनो-सेटेलाइट्स का। इनमें जो सबसे जरूरी चीज है, वह है इनमें लगाया जाने वाला नैनो एंटीना। इसरो के सामने इसे विकसित करने की चुनौती है।
• क्यों पड़ी जरूरत : इसरो के पास नैनो-सेटेलाइट्स प्रक्षेपण को इच्छुक अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों की लंबी कतार है। इसी साल फरवरी में इसरो ने एक बड़ा कीर्तिमान स्थापित किया। एक रॉकेट से 104 उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजकर इस तरह का इतिहास रचने वाला भारत पहला देश बन गया। इनमें से भारत के तीन व अंतर्राष्ट्रीय ग्राहकों के 101 नैनो-सेटेलाइट्स शामिल थे।
• नैनो-सेटेलाइट्स का व्यावसायिक प्रक्षेपण इसरो की व्यावसायिक शाखा अंतरिक्ष कॉर्पोरेशन लिमिटेड की देखरेख में किया जा रहा है। आने वाला उच्च क्षमता युक्त नैनो-सेटेलाइट्स का होगा। इसके लिए इसरो ने तैयारी शुरू कर दी है।
• क्यों जरूरी है यह एंटीना : दरअसल, एंटीना किसी भी उपग्रह का सबसे अहम हिस्सा होता है। जो सोर्स से रिसीव की जाने वाली सूक्ष्म तरंगों को बिना परिवर्तित किए परावर्तित (दूसरी दिशा में मोड़ने) का काम करता है। नैनो-सेटेलाइट्स क्योंकि अपेक्षाकृत छोटे और हल्के होते हैं, लिहाजा इनका एंटीना भी बहुत ही छोटा और बहुत हल्का होता है। इसे बेहद हल्के मेटा मैटेरियल (पदार्थ) से बनाया जाता है।
• मेटा मैटेरियल को प्रयोगशाला में तैयार किया जाता है। एंटीना इतना छोटा होता है कि हथेली में सिमट जाए। इसकी लंबाई 20 मिमी व चौड़ाई करीब 15 मिमी होती है। इस तकनीक से सुसज्जित होने पर इसरो की अंतरिक्ष में पकड़ और बढ़ेगी।
• इसरो स्वदेशी तकनीक के दम पर ही अमेरिका, यूरोपियन यूनियन व रूस को कड़ी टक्कर दे रहा है। इन तीनों के पास यह एंटीना बनाने की तकनीक है, लेकिन इसरो इनका सहयोग लेने की बजाय स्वदेशी तकनीक विकसित करने की ओर अग्रसर है।
• मिलेगी सफलता : इसरो ने इस काम के लिए आइआइटी धनबाद के इलेक्ट्रॉनिक एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग को दो साल का वक्त दिया है। प्रोजेक्ट पर काम शुरू हो गया है।

3. जजों की नियुक्ति प्रक्रिया का मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में

• शीर्ष न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर (एमओपी) को अंतिम रूप देने में हो रही देरी के मसले पर सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को सुनवाई के लिए तैयार हो गया।
• अदालत ने अटॉर्नी जनरल से जवाब तलब करते हुए कहा कि एमओपी को अंतिम रूप देने के लिए इस अदालत ने कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की थी, फिर भी इसे अनिश्चितकाल के लिए नहीं लटकाया जा सकता।
• जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस यूयू ललित की पीठ ने कहा, ‘व्यापक जनहित में एमओपी को अंतिम रूप देने में आगे और देरी नहीं होनी चाहिए।’ पीठ ने कहा, सर्वोच्च अदालत ने 2015 में आदेश दिया था कि शीर्ष न्यायपालिका में नियुक्ति के लिए एमओपी होना चाहिए और इस आदेश को दिए हुए एक साल और दस महीने पहले ही बीत चुके हैं।
• सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता आरपी लूथरा की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में लूथरा ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टो में नियुक्तियों को इस आधार पर चुनौती दी है कि आदेश के मुताबिक अभी तक एमओपी को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है।
• हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी मांग को खारिज कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने वरिष्ठ वकील केवी विश्वनाथन को मामले में न्यायमित्र नियुक्त किया और अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को नोटिस जारी कर दिया। अगली सुनवाई 14 नवंबर को होगी।
• अक्टूबर 2015 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने संसद द्वारा पारित एनजेएसी एक्ट को रद कर दिया था।

4. राफेल के साथ ही फाल्कन का भी निर्माण हब बनेगा भारत
• रक्षा क्षेत्र में कार्यक्रम के तहत संभवत: अभी तक का सबसे बड़ा कदम उठाया गया है। नागपुर के पास मिहान में देश के पहले एविएशन मैन्युफैक्चरिंग हब का शुक्रवार को शुभारंभ किया गया है।
• यह हब न सिर्फ फ्रांस से खरीदे जाने वाले फाइटर जेट राफेल के लिए आवश्यक कलपुर्जे व अन्य उपकरण बनाएगा बल्कि यह दुनिया की दूसरी एविएशन कंपनियों को भारत में निवेश करने के लिए भी आकर्षित करेगा।
• शुक्रवार को यहां फ्रांस की रक्षा मंत्री फ्लोरेंस पार्ले, स्थानीय सांसद व देश के सड़क व राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी, महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फड़नवीस, भारत में फ्रांस के राजदूत अलेक्जेंडर जेगलर की उपस्थिति में दासो एविएशन के चेयरमैन एरिक ट्रैपियर और रिलायंस एडीए समूह के चेयरमैन अनिल अंबानी ने धीरूभाई अंबानी एविएशन पार्क का शिलान्यास किया।
• इस परियोजना के लिए संयुक्त उद्यम दासो रिलायंस एयरोस्पेस लिमिटेड के नाम से बनाया गया है। इसमें रिलायंस के पास 51 फीसद इक्विटी है जबकि दासो के पास शेष 49 फीसद हिस्सेदारी होगी। पहले चरण में इस परियोजना के तहत 6500 करोड़ रुपये की राशि का निवेश होगा।
• भारत और फ्रांस के बीच सितंबर, 2016 में दासो के फाइटर प्लेन राफेल खरीदने का समझौता हुआ था। अभी भारत ने तकरीबन 60 हजार करोड़ रुपये की लागत से 36 राफेल खरीदने का फैसला किया है। इसकी संख्या बढ़ाने पर बात हो रही है।
• रिलायंस और राफेल का संयुक्त उद्यम इस युद्धक विमान के लिए तमाम कलपुर्जे बनाएगा। कंपनी का दावा है कि सीधे तौर पर 700 लोगों को इससे रोजगार मिलेगा जबकि परोक्ष तौर पर 20 हजार लोगों को रोजगार मिलेगा।
• सबसे बड़ी बात यह है कि जिस तरह से मारुति सुजुकी ने देश में कार उद्योग की नींव रखी और कई आटोमोबाइल कल पुर्जे बनाने वाली घरेलू कंपनियों को स्थापित किया उसी तरह से यह खरीद समझौता देश में एविएशन क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों की नई पौध तैयार करेगा।
• रिलायंस एडीए समूह के चेयरमैन अनिल अंबानी ने कहा कि यहां राफेल के साथ ही दासो के फाल्कन विमान का भी निर्माण स्थल बनेगा।
• फाल्कन को अभी दुनिया के बेहतरीन कमर्शियल वायुयानों में माना जा रहा है। इन दोनों कंपनियों के लिए तमाम छोटे-बड़े उपकरण व कलपुर्जे बनाने के लिए 500 छोटी व मझोली कंपनियां अपना निर्माण केंद्र खोलेंगी।

5. सरकारी खर्च बढ़ाकर विकास में तेजी के प्रयास

• वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि सार्वजनिक वित्त प्रबंधन प्रणाली (पीएफएमएस) के अनिवार्य इस्तेमाल से सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं में लाभार्थियों तक पैसे के प्रवाह की निगरानी करने में मदद मिलेगी। केंद्रीय योजनाओं के लिए पीएफएमएस के अनिवार्य इस्तेमाल शुरू करने पर आयोजित कार्यक्रम में जेटली ने यह बात कही।
• केंद्रीय योजनाओं में बजट के तहत 666,644 करोड़ रुपये व्यय का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि वेब आधारित सॉफ्टवेयर एप पीएफएमएस से पैसे के प्रवाह की रीयल टाइम जानकारी मिल सकेगी। इससे कार्यक्रमों और वित्तीय प्रबंधन में सुधार होगा।
• पैसा तुरंत जारी किया जा सकेगा। सरकारी उधारी को बेहतर तरीके से संभाला जा सकेगा। इससे ब्याज की लागत में भी बचत होगी।
• कुछ मंत्रलयों को छोड़ अधिकांश ने बढ़ाई खर्च करने की रफ्तार1जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली1आर्थिक विकास दर की रफ्तार को बनाये रखने के लिए सरकार ने चालू वित्त वर्ष में अपने खर्च में बढ़ोतरी बनाये रखने का फैसला किया है।
• चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में सरकार ने पिछले साल के मुकाबले सवा लाख करोड़ रुपये अधिक खर्च किया है। वर्ष की शेष अवधि में सरकार खर्च की इसी रफ्तार को बनाये रखेगी ताकि विकास की अपेक्षित दर हासिल की जा सके।
• सरकार के आंकड़ों के मुताबिक सितंबर तक वर्ष 2017-18 के लिए अनुमानित 21.46 लाख करोड़ रुपये के कुल व्यय में से सरकार 11.47 लाख करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। जो पिछले साल की समान अवधि के व्यय से करीब 1.2 लाख करोड़ रुपये ज्यादा होने का अनुमान है।
• सरकार ने वित्त वर्ष के लिए 3.09 लाख करोड़ रुपये के पूंजीगत व्यय का लक्ष्य रखा था जो बीते साल के मुकाबले 31.28 फीसद अधिक था। इसमें से सरकार सितंबर 2017 तक 1.46 लाख करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है।
• सरकारी खर्च का ब्यौरा रखने वाले लेखा महानियंत्रक के अगस्त तक के आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश मंत्रलयों ने चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीने की अवधि में पिछले वर्ष के मुकाबले अधिक खर्च किया है। खासतौर पर सामाजिक विकास और पिछड़े तबकों के विकास से जुड़े मंत्रलयों के खर्च में बीते साल के मुकाबले अधिक व्यय का रुख बना हुआ है।
• हालांकि सीजीए के अगस्त के आंकड़े बताते हैं कि रेल, बिजली और सड़क परिवहन मंत्रलय का खर्च पहले पांच महीने में बीते वित्त वर्ष के मुकाबले अभी कम बना हुआ है। लेकिन पिछले दिनों ही वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक प्रेस कान्फ्रेंस में इस खर्च की रफ्तार बढ़ाने का भरोसा दिया है।
• अगस्त तक के आंकड़ों के आधार पर देखें तो बजट में आवंटित राशि के मामले में पहले पांच महीने में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले उपभोक्ता व नागरिक आपूर्ति, पेट्रोलियम, सिविल एविएशन, शहरी आवास और गरीबी उन्मूलन जैसे मंत्रलयों ने अधिक खर्च किया है।
• अगस्त तक नागरिक आपूर्ति व उपभोक्ता मंत्रलय कुल अनुमानित राशि का 78 फीसद खर्च कर चुका है। जबकि बीते वित्त वर्ष की इसी अवधि में केवल 54 फीसद खर्च हो पाया था। इसी तरह पेट्रोलियम मंत्रलय ने अपने लिए आवंटित राशि में से अब तक 65 फीसद खर्च कर दिया है। जबकि सिविल एविएशन और शहरी आवास व गरीबी उन्मूलन ने पांच महीने में कुल आवंटन का 64-64 फीसद खर्च किया है।
• कुछ मंत्रलयों को छोड़कर अधिकांश मंत्रलयों में चालू वित्त वर्ष में खर्च की रफ्तार तेज बनी हुई है। सरकार के उच्च पदस्थ सूत्र बताते हैं कि शेष अवधि में सरकारी खर्च की रफ्तार को और तेज किया जा रहा है।

6. गौतम अधिकारी

• हिंदी और मराठी टीवी उद्योग की हस्तियों में शुमार गौतम अधिकारी का शुक्रवार को अपने आवास पर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। वह 67 वर्ष के थे।
• गौतम और उनके भाई मार्कंड अधिकारी ने 1985 में ‘श्री अधिकारी ब्रदर्स’ समूह की शुरुआत की थी। बाद में देश की ऐसी पहली टेलीविजन प्रोडक्शन कंपनी बनी जो 1995 में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हुई।
• शुरुआत में कंपनी ने मराठी भाषा में धारावाहिक बनाने शुरू किए। फिर फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन और प्रोडक्शन में हाथ आजमाए। देखते ही देखते श्री अधिकारी ब्रदर्स एक अग्रणी भारतीय मीडिया और एंटरटेनमेंट कंपनी बन गई। वह सब टीवी के भी संस्थापक थे।
• इस टीवी चैनल पर ही घर-घर में लोकप्रिय ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ जैसे सीरियल आते हैं।

26 अक्टूबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ

October 28, 2017 0
26 अक्टूबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ

🔷26 अक्टूबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ 🔷

1774 - फिलाडेल्फिया में अमेरिका की पहली महाद्वीपीय कांग्रेस स्थगित।

1858 - एच.ई. स्मिथ ने वॉशिंग मशीन का पेटेंट कराया।

1905 - नॉर्वे ने स्वीडन से स्वतंत्रता प्राप्त की।

1934 - महात्मा गांधी के संरक्षण में अखिल भारतीय ग्रामीण उद्योग संघ की स्थापना।

1943 - कलकत्ता (तत्कालीन कोलकाता) में हैजे की महामारी से अक्टूबर के तीसरे सप्ताह में 2155 लोगों की मौत।

1947 - राजा हरि सिंह जम्मू-कश्मीर काे भारत में विलय करने पर सहमत हुए।इराक में ब्रिटिश सेना का कब्जा हटा

1950 - संत मदर टेरेसा ने कलकत्ता में चैरिटी मिशन की स्थापना की।

1951 - विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने।

1969 - चांद पर कदम रखने वाले पहले अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग और एडविन एल्ड्रिन मुंबई आये।

1975 - मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात अमेरिका की आधिकारिक यात्रा करने वाले देश के पहले राष्ट्रपति बने।

1976 - त्रिनिदाद एंड टोबैगो गणराज्य को ब्रिटेन से आजादी मिली।

1980 - इजरायल के राष्ट्रपति यित्झाक नावोन मिस्र की यात्रा करने वाले पहले इजरायली राष्ट्रपति बने।

1994 - इस्रायल और जार्डन के बीच अरावा क्रासिंग पर बहुप्रतीक्षित शांति संधि सम्पन्न।

1999 - उच्चतम न्यायालय ने आजीवन कारावास की अवधि 14 वर्ष तय की

2001जापान ने भारत और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ लगे प्रतिबंधों को हटाने की घोषणा की।

2005 - वर्ष 2006 को भारत-चीन मैत्री वर्ष के रूप में मनाने का फैसला।

2006 - इस्रायल में एक मंत्री ने भारत से बराक सौदे पर जांच की मांग की।

2007 - अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का महत्त्वपूर्ण यान डिस्कवरी अंतर्राष्ट्रीय स्पेश स्टेशन पर सफलतापूर्वक उतरा। अमेरिका ने ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स तथा वहाँ के बैंकों पर प्रतिबन्ध लगाया।

2012 - बर्मा में हिंसक झड़पों में 64 लोगों की मौत।अफ़ग़ानिस्तान में एक मस्जिद में आत्मघाती हमले में 41 की मौत, 50 घायल।

2015 - उत्तर पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान के हिंदूकुश पर्वत श्रृंखला में 7.5 तीव्रता वाले भूकंप से 398 लोगों की मौत, 2536 घायल।

🔷26 अक्टूबर को जन्मे व्यक्ति 🔷

1775 - बहादुरशाह ज़फ़र - भारत में मुग़लों का अंतिम सम्राट।

1924 - ठाकुर प्रसाद सिंह - भारत में नवगीत विधा के कवियों में में से एक थे

1971 - प्रीति सिंह - भारतीय साहित्यकार, उपन्यासकार एवं सम्पादिका।

1923 - राम प्रकाश गुप्ता - 'भारतीय जनता पार्टी' के प्रसिद्ध नेता तथा उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री तथा मध्य प्रदेश के राज्यपाल।

1890 - गणेशशंकर विद्यार्थी - स्वाधीनता संग्राम में गणेशशंकर विद्यार्थी का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

1886 - गोदावरीश मिश्र - उड़ीसा के प्रसिद्ध समाज सुधारक, साहित्यकार और सार्वजनिक कार्यकर्ता।

🔷26 अक्टूबर को हुए निधन 🔷

1947 - लॉर्ड लिटन द्वितीय - बंगाल के ब्रिटिश गवर्नर (1922-27 ई.) और मंचूरिया थे।

1955 - डी. वी. पलुस्कर, प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक

1981 - दत्तात्रेय रामचन्द्र बेंद्रे - भारत के प्रसिद्ध कन्नड़ कविऔर साहित्यकार

2000- मन्मथनाथ गुप्त- प्रमुख क्रान्तिकारी तथा लेखक

1956 - बलराज भल्ला - प्रसिद्ध क्रांतिकारी तथा महात्मा हंसराज के पुत्र।

नौकरशाही को बेजा संरक्षण Rajasthan

October 28, 2017 0
नौकरशाही को बेजा संरक्षण Rajasthan

नौकरशाही को बेजा संरक्षण
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राजस्थान में लोकसेवकों और न्यायाधीशों के खिलाफ परिवाद पर जांच से पहले अनुमति की अनिवार्यता वाला विवादित विधेयक विपक्ष, मीडिया और जनता के जबरदस्त विरोध के कारण पारित नहीं हो पाया। काले कानून की यह खिलाफत लोकतंत्र की रक्षा का सुखद संदेश है। इस विधेयक के प्रावधानों से असंतुष्ट विधायक घनश्याम तिवाड़ी और भाजपा को समर्थन दे रहे निर्दलीय विधायक माणकचंद सुराणा भी सत्ता पक्ष के विरुद्ध खड़े दिखाई दिए। लोकसेवकों के कथित हितों की रक्षा के बहाने भ्रष्ट नौकरशाही को सुरक्षा कवच देने वाले इस विधेयक पर राजस्थान उच्च न्यारयालय ने भी तल्ख टिप्पणी की। इस बाबत प्रस्तुत एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि ‘अब तो हद हो गई है कि सरकार इन ऐसे अफसरों को बचाने के लिए अध्यादेश तक ला रही है।’ अदालत की यह टिप्पणी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार की सामंती सोच की निर्लज्जता पर कुठाराघात है। इस अध्यादेश के प्रावधानों में प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी बाधित करने के अलोकतांत्रिक उपाय किए गए थे, यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी आम-आदमी अपनी तकलीफ बयान नहीं कर सकता था। अब चयन समिति इसके प्रारूप पर पुनर्विचार करेगी।

अब तक किसी भी भारतीय नागरिक को निजी इस्तगासा के मार्फत अपने ऊपर हुए अत्याचार या किसी लोकसेवक द्वारा बरते गए कदाचरण को संज्ञान में लाने का अधिकार है। किसी नौकरशाह द्वारा बरते गए गलत आचरण की शिकायत जब थाना में नहीं सुनी जाती तो पीड़ित व्यक्ति निजी इस्तगासा दायर कर अपने हक में कानूनी लड़ाई लड़ सकता है। किंतु विधेयक के माध्यम से वसुंधरा राजे सिंधिया सरकार ऐसे लोगों के मुंह सिल देना चाहती हैं, जो भ्रष्ट नौकरशाहों के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ने को आमादा रहते हैं। इस संशोधन विधेयक के जरिए आईपीसी की धारा 228 में 228 बी जोड़कर प्रावधान किया गया है कि सीआरपीसी की धारा 156 और धारा 190 सी के विपरीत कार्य किया गया तो दो साल का कारावास और जुर्माने की सजा दी जा सकती है। न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट व लोकसेवक के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति मिलने से पहले उनका नाम एवं अन्य जानकारी का प्रकाशन व प्रसारण भी नहीं किया जा सकेगा। हालांकि न्यायपालिका को शक के दायरे में लाने से पहले उच्च न्यायालय की मंजूरी आवश्यक है। लोकसेवकों, यानी कार्यपालिका को तो इनकी आड़ में जोड़कर उनके भ्रष्ट आचरण को सुरक्षा प्रदान की जा रही थी। यह उपाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस नारे की भावना का भी उल्लंघन है, जिसमें वे 56 इंची सीना तानकर कहते रहे हैं कि ‘न खाऊंगा  और न ही खाने दूंगा।’ भ्रष्टाचार से मुक्ति देश की राष्ट्रीय आकांक्षा है। देश की तमाम लोक-कल्याणकारी योजनाएं केवल भ्रष्ट नौकरशाही के कारण नाकाम हो जाती हैं। इसके बावजूद राजस्थान सरकार द्वारा भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारियों को सरंक्षण देने के ऐसे उपाय करना जिससे आरोपितों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मिलने तक कोई कार्यवाही न हो तो सरकार मंशा पर भी सवाल उठना लाजिमी है। दरअसल वर्तमान राज्य सरकारों के नेतृत्वकर्ता धन उगाही, गाहे-बगाहे नौकरशाही के माध्यम से ही कर रहे हैं। यह उगाही राजनीतिक चंदे के लिए की जा रही हो अथवा निजी वित्तपोषण के लिए, नौकरशाही एक माध्यम बनकर पेश आ रही है। इसीलिए खासतौर से देश में जिन-जिन प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, वहां-वहां नौकरशाही निरंकुशता के चरम पर है। राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारों में तो इसी सांठगांठ के चलते नौकरशाही बेलगाम है। महाराष्ट्र सरकार ने इस आशय का कानून दो साल पहले ही पारित किया है। इसमें अभियोजन स्वीकृति की अवधि तीन माह है, जबकि राजस्थान में इसे बढ़ाकर छह माह कर दिया गया है।1सरकार की यदि मंशा ईमानदारी होती तो उसे जरूरत तो यह थी कि वह सीआरपीसी की धारा 197 में संशोधन का प्रावधान लाती। इसकी ओट में भ्रष्ट अधिकारी मुकदमे से बचे रहते हैं। इसीलिए इसे हटाने की मांग लंबे समय से चल रही है। इस धारा के तहत यदि कोई लोक सेवक पद पर रहते हुए कोई कदाचरण करता है तो उस पर मामला चलाने के लिए केंद्र सरकार से और राज्य लोक सेवा का अधिकारी है तो राज्य सरकार से मंजूरी लेना जरूरी है।

राजस्थान सरकार ने इस धारा को विलोपित करने की मांग उठाने की बजाय, इसे ताकत देने का काम कर दिया था। क्योंकि संशोधिक विधेयक पारित हो जाता तो फिर मीडिया भी तत्काल भ्रष्टाचारियों से संबंधित समाचारों के प्रकाशन व प्रसारण के अधिकार से वंचित हो जाता। साफ है, यह विधेयक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध था, लिहाजा लोकतंत्र की मूल भावना को आघात पहुंचाने वाला था। यह इसलिए भी असंवैधानिक था, क्योंकि अधिकारी से संबंधित शिकायत पर जांच करने या न करने के अधिकार सत्तारूढ़ दल के पास सुरक्षित थे। अब वह सत्तारूढ़ दल उस नौकरशाह के खिलाफ जांच के आदेश कैसे दे
सकता है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्तारूढ़ दल के हित साधने में लगा हो? जाहिर है, सरकार भ्रष्टाचार को संस्थागत करने के प्रावधान को कानूनी रूप देने की कुटिल मंशा पाले हुए थी।

फिलहाल मीडिया को शिकायत के आधार पर अथवा गोपनीय रूप से गड़बड़ी के सरकारी दस्तावेजों के आधार पर ही खबर छापने एवं प्रसारित करने का हक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत था। इस अध्यादेश को यदि विधेयक के रूप में स्वीकृति मिल जाती तो शिकायत हमेशा के लिए ठंडे बस्ते के हवाले कर दी जाती। इस लिहाज से यह विधेयक राजस्थान सरकार का भ्रष्टाचार को सरंक्षण देने की बेहद निर्लज्ज व निरकुंश कोशिश थी। निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी है। उसे प्रत्येक पांच साल में मतदाता के समक्ष खरा उतरने की चुनौती पेश आती है, लेकिन प्रशासन का न कोई समयबद्ध कार्यकाल है और न ही उनकी जवाबदेही जनता के प्रति और न ही कर्तव्य के प्रति सुनिश्चित है। राज्य सरकार को चाहिए था कि वह प्रशासनिक सुधार की पहल करती।