Thursday, September 7, 2017

9 वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन

September 07, 2017 0
9 वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन

9 वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन

9 वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन चीन के #ज़ियामेन में आयोजित किया गया था। इस शिखर सम्मेलन का विषय "उज्ज्वल भविष्य के लिए मजबूत भागीदारी" था। यह 2011 के शिखर सम्मेलन के बाद चीन में दूसरी बार आयोजित किया गया था।

समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर

ब्रिक्स #सीमा #शुल्क #सहयोग का सामरिक ढांचा पर समझौता ज्ञापन। ब्रिक्स एक्शन प्लान फॉर इनोवेशन कोऑपरेशन (2017-2020) पर समझौता ज्ञापन। आर्थिक और व्यापार सहयोग पर ब्रिक्स एक्शन एजेंडा पर समझौता ज्ञापन। ब्रिक्स बिजनेस काउंसिल और स्ट्रैटेजिक सहकारिता पर नए विकास बैंक के बीच समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किया गया था।

9 वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की विशेषताएं

ब्रिक्स देशों ने उभरते बाजारों और विकासशील देशों के साथ व्यापक साझेदारी की ओर रुख किया हैं और ब्रिक्स प्लस सहयोग (जिसमें थाईलैंड, तजाकिस्तान, मिस्र, और केन्या इसमें शामिल हैं)

सदस्य देशों ने ब्रिक्स स्थानीय मुद्रा बांड बाजारों के विकास को बढ़ावा देने के लिए संकल्पित किया और संयुक्त रूप से एक ब्रिक्स स्थानीय मुद्रा बांड फंड की स्थापना की और वित्तीय बाजार एकीकरण की सुविधा के लिए सहमति व्यक्त की।

डेटा विश्लेषिकी, क्लाउड कंप्यूटिंग, नैनोटेक्नोलॉजी, कृत्रिम बुद्धि, 5 जी और उनके अभिनव अनुप्रयोगों सहित सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) में संयुक्त अनुसंधान, विकास और नवीनता को बढ़ाने के लिए सहमत हुए हैं।

ऊर्जा के क्षेत्र में ब्रिक्स सहयोग को मजबूत करने और ऊर्जा वस्तुओं और प्रौद्योगिकियों के लिए खुले, लचीले और पारदर्शी बाजारों को बढ़ावा देने के लिए काम करने पर सहमत हुए।

जीवाश्म ईंधन के सबसे प्रभावी उपयोग, गैस, जल और परमाणु ऊर्जा के व्यापक उपयोग को कम उत्सर्जन अर्थव्यवस्था, तथा बेहतर ऊर्जा की पहुंच और टिकाऊ विकास की दिशा में आगे बढ़ने के लिए साथ मिलकर काम करने के लिए सहमत हुए हैं।

यह भारत में स्थापित होने का प्रस्ताव है, जो प्राथमिक क्षेत्रों में सहयोग के लिए आभासी नेटवर्क के रूप में काम करेगा।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय से, आतंकवाद विरोधी गठबंधन स्थापित करने और इस संबंध में संयुक्त राष्ट्र की केंद्रीय समन्वयशील भूमिका का समर्थन करने का आह्वान किया।

ब्रिक्स देशों के बीच आपसी समझ, दोस्ती और सहयोग के विकास और वृद्धि के लिए इसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

#ब्रिक्स

ब्रिक्स, ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका की पांच प्रमुख उभरती हुई राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए एक संघ है। यह 2009 में स्थापित किया गया था। मूल रूप से यह 2011 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने से पहले ब्रिक के रूप में जाना जाता था। पहले औपचारिक शिखर सम्मेलन 2009 में येकातेरिनबर्ग, रूस में आयोजित किया गया था।

चीन ने #क्रिप्टो मुद्राओं के माध्यम से धन जुटाने पर प्रतिबंध लगाया

चीन ने व्यक्तियों और संगठनों को इनिशियल कॉइन ऑफरिंग्स (आईसीओ), या डिजिटल मुद्राओं की शुरूआत के माध्यम से फण्ड जुटाने से प्रतिबंधित कर दिया है। यह कदम गैर-क़ानूनी तरीके से धन-जुटाने पर रोक लगाने के लिए उठाया गया है। घोषणा के बाद दो सबसे बड़ी क्रिप्टो मुद्राएं bitcoin और ethereum की कीमतों में तेजी से गिरावट आयी है ।

#उर्मिला देवी ने राष्ट्रमंडल युवा भारोत्तोलन चैम्पियनशिप में #स्वर्ण पदक जीता

भारत की कोनसाम उर्मिला देवी ने आस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में हुई राष्ट्रमंडल युवा (बालक और बालिका) भारोत्तोलन चैम्पियनशिप के शुरूआती दिन 44 किग्रा वजन वर्ग में स्वर्ण पदक प्राप्त किया। उर्मिला देवी ने स्नैच में 57 किग्रा जबकि क्लीन एवं जर्क में 76 किग्रा का वजन उठाया जिससे उनका कुल प्रयास 133 किग्रा का रहा। इससे वह पोडियम में पहला स्थान हासिल करने में सफल रहीं। इस प्रयास से उर्मिला ने अभी तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी किया।

कूड़े का प्रबंधन और हमारी आदतें (सुनीता नारायण) (पर्यावरणविद व महानिदेशक, सीएसई) (साभार, हिंदुस्तान )

September 07, 2017 0
कूड़े का प्रबंधन और हमारी आदतें

(सुनीता नारायण)
(पर्यावरणविद व महानिदेशक, सीएसई) 
(साभार, हिंदुस्तान )

हर दिन आती नई-नई खबरों के बीच गाजीपुर हादसे को  चंद रोज में ही हम भूलने लगे हैं। दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर स्थित इस इलाके में पिछले दिनों कूड़े के पहाड़ के ढहने से दो लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। इस घटना के बाद संबंधित अमला सक्रिय जरूर हुआ, लेकिन वह सक्रियता भी चंद रोज में ही शांत होती दिखने लगी है। यहां आशय उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना को फिर से शब्द देने का नहीं, बल्कि उस घटना के बहाने देश में कचरा प्रबंधन की स्थिति पर ध्यान खींचना है।

हम यह तो बखूबी जानते हैं कि कचरा आज एक बड़ी समस्या बन चुका है। मगर यह शायद ही हम जानते हैं कि इसका समाधान सिर्फ उसके निस्तारण की तकनीक में नहीं, बल्कि घरेलू स्तर के पृथक्करण तंत्र से तकनीक को जोड़ने में छिपा है, ताकि लैंडफिल एरिया (भराव क्षेत्र) तक उसके पहुंचने की नौबत ही न आए। यानी उसे पहले ही साफ किया जा सके और किसी न किसी रूप में उसका दोबारा इस्तेमाल हो सके। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो ऊर्जा या अन्य दूसरे कामों के लिए कचरे का कोई मोल नहीं रह जाएगा। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हमारी कचरा प्रबंधन प्रणाली इस मोर्चे पर निष्क्रिय-सी दिखाई देती है।

यह स्थानीय निकायों की जवाबदेही है कि वे शहरी ठोस कचरा (एमएसडब्ल्यू) कानून 2016 के अनुसार स्रोत पर ही कचरे को अलग-अलग करना सुनिश्चित करें। इसका अर्थ यह है कि लोगों को इसके लिए जागरूक किया जाए और फिर इस सूखे व गीले या सड़न योग्य या दोबारा इस्तेमाल होने वाले कचरे को नगर निकाय अलग-अलग जमा करके उनके उचित निस्तारण की व्यवस्था करे। असल में, कचरा प्रबंधन को लेकर एक आसान सा समाधान यही दिखता है कि उसे जमा करो और भराव क्षेत्र में डाल दो या फिर प्रोसेगिंग प्लांट (निपटान इकाई) के हवाले कर दो। मगर देश-दुनिया के अनुभव बताते हैं कि कचरे को अलग-अलग किए बिना निस्तारित किए जाने वाले कूड़े से तैयार ईंधन की गुणवत्ता खराब होती है और वह हमारे काम का नहीं रह जाता है। लिहाजा हमारे नगर निगमों को घर के स्तर पर ही कचरे को अलग-अलग करने की मुहिम चलानी चाहिए।

इस मामले में गोवा की राजधानी पणजी एकमात्र ऐसा शहर है, जिसने इस व्यवस्था को सही मायने में जमीन पर उतारा है। वहां घरों से अलग-अलग दिन अलग-अलग कचरा जमा किया जाता है। इससे घरों में ही कचरे का पृथक्करण सुनिश्चित हो जाता है। इतना ही नहीं, वहां ऐसा न करने वाले नागरिकों पर जुर्माने की व्यवस्था तो है ही, कॉलोनी स्तर पर ही कचरे के निस्तारण की व्यवस्था भी की गई है। और सबसे खास बात यह कि होटल जैसे बड़े-बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए बैग मार्किंग सिस्टम भी बनाया गया है, ताकि नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रतिष्ठानों को पकड़ा जा सके और दंडित किया जा सके।

केरल के अलेप्पी में एक दूसरी व्यवस्था काम करती है। वहां म्युनिसिपल कॉरपोरेशन कचरा जमा नहीं करता, क्योंकि वहां ऐसी कोई जगह ही नहीं, जहां इसे फेंका जा सके। वहां के एकमात्र भराव क्षेत्र को नजदीकी गांव वालों ने बंद करा दिया है। साफ है, जब म्युनिसिपैलिटी कचरा जमा ही नहीं कर रहा, तो लोग इसका खुद प्रबंध कर रहे हैं। वे इसे अलग-अलग जमा करते हैं और फिर उससे जितनी खाद बना सकते हैं, बनाते हैं। यह खाद घरेलू बागवानी में काम आती है। रही बात नॉन-बायोडिग्रेडेबल (प्राकृतिक तरीके से न सड़ने वाला) कचरे की, तो इस मोर्चे पर सरकार सक्रिय है। ऐसे कचरों के निस्तारण के लिए वह पहले से ही व्यवस्थित अनौपचारिक वेस्ट-रिसाइकिलिंग क्षेत्रों की मदद लेती है। इस व्यवस्था को अपनाकर म्युनिसिपैलिटी ने कचरे के भंडारण या उसकी ढुलाई आदि पर होने वाला अपना खर्च भी बचा लिया है।
यह कचरा प्रबंधन का एक पहलू है। इसका दूसरा पहलू यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि ऐसे कूडे़ के लिए कहीं कोई जगह ही न छोड़ी जाए, जिसे छांटकर अलग न किया गया हो। मतलब साफ है कि शहरों में लैंडफिल एरिया का प्रबंधन सख्ती से किया जाए। एमएसडब्ल्यू कानून 2015 में कहा गया है कि लैंडफिल एरिया का इस्तेमाल सिर्फ ऐसे कचरे के लिए होना चाहिए, जो दोबारा उपयोग लायक न हो, किसी दूसरे काम में इस्तेमाल न आ सके, जो ज्वलनशील या रिएक्टिव न हो। सवाल यह है कि इसे लागू कैसे किया जाए? फिलहाल नगर निगम या नगर पालिकाएं कचरा प्रबंधन को लेकर जो अनुबंध करती हैं, उसमें अधिक से अधिक मात्रा में कचरे को भराव क्षेत्र तक लाने को प्रोत्साहित किया जाता है। चूंकि ठेकेदार को कचरे की मात्रा के अनुसार ही रकम अदा की जाती है, यानी अधिक से अधिक कचरा व उसी अनुपात में ठेकेदारों का आर्थिक लाभ। इतना ही नहीं, इन निकायों को कचरे को फिर से इस्तेमाल के लायक बनाने की बजाय उसे जमा करना, ढुलाई करना और फिर भराव क्षेत्र में फेंक देना कहीं ज्यादा आसान लगता है।

इस सोच को बदलने के लिए जरूरी है कि लैंडफिल टैक्स लगाया जाए। अनुबंध इस तरह के हों कि कचरे के लिए नगरपालिका कोई भुगतान न करे, बल्कि ठेकेदारों से इसके लिए रकम वसूली जाए। यह व्यवस्था कचरा निस्तारण इकाइयों को भी आर्थिक लाभ पहुंचाएगी और सुनिश्चित करेगी कि भराव क्षेत्र तक कम से कम कचरा पहुंचे। यहां यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि कचरे के आधार पर घरों से भी टैक्स वसूला जाए और अगर वे घरेलू कचरा अलग-अलग नहीं करते, तो उनसे जुर्माना लिया जाए। हमें यह मानना ही होगा कि हर घर, हर प्रतिष्ठान, हर होटल कचरा पैदा करने का स्रोत है, इसलिए वह प्रदूषक  है। लिहाजा उन पर भी वह टैक्स लगना चाहिए, जो किसी अन्य प्रदूषक इकाई पर लगता है, वरना हमारे शहर कचरे के ढेर में तब्दील हो जाएंगे।

इस मामले में ‘निम्बी’ यानी नॉट इन माई बैकयार्ड (मेरे घर के पीछे नहीं) अभियान एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है। अब गरीब व गांव-समाज के लोग अपने-अपने घरों के पीछे कचरा फेंकने का विरोध करने लगे हैं। वे अब ऐसी जगहों के आस-पास कतई नहीं रहना चाहते, जहां लैंडफिल एरिया हो। वाकई जब यह भूमि अपनी है, तो फिर इसे साफ रखने की जिम्मेदारी भी हमारी ही होनी चाहिए। क्या हम ऐसा करेंगे?

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

प्रक्षेपण की नाकामी और इसरो की राह (अभिषेक कुमार ) (साभार दैनिक जागरण )

September 07, 2017 0
प्रक्षेपण की नाकामी और इसरो की राह

(अभिषेक कुमार )
(साभार दैनिक जागरण )

हाल में इसरो के बेहद प्रतिष्ठित रॉकेट- पीएसएलवी यानी आइआरएनएसएस-1एच का का ताजा प्रक्षेपण नाकाम रहा, जिससे स्वदेशी जीपीएस नेटवर्क पूरा करने के लिए भेजा जा रहा नवीनतम नैविगेशन उपग्रह भी अंतरिक्षीय कबाड़ बनने की तरफ बढ़ गया। एक के बाद एक सफल प्रक्षेपण की बदौलत जिस पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल(पीएसएलवी) ने पूरी दुनिया में अपनी धाक जमा ली थी, उस पर सवाल उठ रहे हैं। खासतौर से इसलिए क्योंकि इसरो ने पहली बार किसी मिशन के लिए निजी भागीदारी को मौका दिया था।

प्रक्षेपण की यह नाकामी दो अहम सवाल पैदा करती है। पहला तो यह कि क्या पीएसएलवी दुनिया के अंतरिक्ष बाजार में अपना मुकाम दोबारा हासिल कर पाएगा, जो उसने हाल में बना लिया था। और दूसरे, क्योंकि इसरो अंतरिक्ष के काम में निजी कंपनियों का सहयोग आगे भी लेगा। देसी जीपीएस के लिए नैविगेशन उपग्रह को छोड़ने के लिए निश्चय ही पीएसएलवी से बेहतरीन रॉकेट भारत के पास नहीं है। इसलिए इसरो के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर से हाल में जब संस्थान के मुखिया किरण कुमार ने प्रक्षेपण के कुछ ही समय बाद नवीनतम नैविगेशन उपग्रह के नाकाम होने की खबर दी, तो सवाल उठा कि यह असफलता आखिर किसकी है, उपग्रह की या रॉकेट की। शुरुआती जांच में साबित हो गया कि 19 मिनट की उड़ान की योजना से दागे गए रॉकेट पीएसएलवी में उड़ान के तीसरे मिनट ही एक उल्लेखनीय त्रुटि पैदा हो गई, जिस कारण रॉकेट की हीट शील्ड उससे अलग नहीं हो पाई। यह शील्ड धातु की एक मोटी प्लेट के रूप में उपग्रह को वायुमंडल के घर्षण से पैदा होने वाले उच्च तापमान और घर्षण से बचाती है। वायुमंडल को पार कर निर्वात में पहुंचने में पर यह शील्ड योजना के अनुसार फट जाती है, जिससे उपग्रह रॉकेट से अलग होकर अपनी निर्धारित कक्षा की तरफ बढ़ जाता है। मगर ताजा प्रक्षेपण में यह हीट शील्ड उपग्रह के साथ चिपकी रही और अब यह अंतरिक्ष में घूमती रहेगी।

स्पष्ट है कि यह इसरो के सबसे प्रतिष्ठित रॉकेट पीएसएलवी की नाकामी थी, जिस पर देश के भावी चंद्र मिशन से लेकर दुनिया के कई उपग्रहों के प्रक्षेपण का दारोमदार है और जिससे इसरो या कहें कि भारत भारी मात्र में विदेशी मुद्रा अर्जित कर रहा है।1आर्थिक पैमाने पर देखें, तो करीब 400-500 करोड़ रुपये के नुकसान के साथ पीएसएलवी की यह नाकामी एक दीर्घकालिक असर छोड़ते दिख रही है। हो सकता है कि अभी तक जो देश अपने उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए इसरो (पीएसएलवी) की सेवाएं लेने की योजना बना चुके हैं या इसका मन बना रहे हैं, वे अपनी योजना पर पुनर्विचार करें। निश्चय ही उन्हें इसका हक है पर सच्चाई यह है कि आज की तारीख में दुनिया के दूसरे मुल्कों के पास पीएसएलवी से बेहतर विकल्प है ही नहीं। गौरतलब है कि अब तक 41 उड़ानों में पीएसएलवी के सिर्फ दो मिशन नाकाम रहे हैं। इसका पहला प्रक्षेपण नाकाम रहा था और अब यह 41वां मिशन फेल हुआ है, लेकिन इसने अपनी कामयाब 39 उड़ानों से साबित किया है कि इसके जोड़ का दूसरा रॉकेट मिलना बेहद मुश्किल है।

उल्लेखनीय है कि कभी साइकिल से रॉकेट के पुर्जे ढोने वाले इसरो ने जिस तरह पीएसएलवी की बदौलत दुनिया भर के दर्जनों उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचाए हैं, वैसी सफलता किसी दूसरे विकासशील देशों की किस्मत में नहीं बदा है। इसमें भी ज्यादा रेखांकित करने वाली बात यह है कि जितना धन अमेरिकी स्पेस सेंटर- नासा अपने स्पेस मिशन पर एक साल में खर्च करता है, उतने पैसों में इसरो 40 साल तक काम करता रह सकता है। यही नहीं, पीएसएलवी की मदद से हमारा देश उपग्रहों की व्यावसायिक लॉन्चिंग दुनिया में सबसे कम कीमत पर कर रहा है। आम तौर पर एक सामान्य आकार की पीएसएलवी से लॉन्चिंग 100 करोड़ रुपयो की पड़ती है, जबकि अमेरिका के ऐटलस-5 से इसकी कीमत 6692 करोड़ रुपये होती है। हालांकि अभी भी सैटेलाइट लॉन्चिंग के अंतरिक्ष बाजार में अमेरिका की हिस्सेदारी 41 फीसद तक है, जबकि इसरो की हिस्सेदारी सिर्फ चार प्रतिशत। इसकी बड़ी वजह यह है कि नासा के पास एक खाली ट्रक के बराबर वजन वाले उपग्रह को स्पेस में छोड़ने की क्षमता है, जबकि इसरो अभी एक मध्यम आकार की कार के बराबर वजन वाले सैटेलाइट छोड़ पा रहा है। फिर दुनिया को ही नहीं अब तो अमेरिका को भी यही लग रहा है कि क्यों न वह भी कम कीमत में इसरो से ही अपने उपग्रह स्पेस में पहुंचा ले। गौरतलब है कि इसरो ने इस तरह की लॉन्चिंग के कारोबार का जिम्मा अपने सहयोगी संगठन एंटिक्स कॉरपोरेशन को दे रखा है और इस संगठन ने पीएसएलवी की पहली लॉन्चिंग से बाद से 2014 तक साढ़े चार अरब रुपये कमाकर दिए हैं।

2016 में इकोनॉमिक फोरम की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार 2013 में अमेरिका का स्पेस बजट सबसे अधिक 39.3 अरब डॉलर था, चीन 6.1 अरब डॉलर के साथ दूसरे, रूस, 5.3 अरब डॉलर के साथ तीसरे और जापान 3.6 अरब डॉलर के स्पेस बजट के साथ चौथे स्थान पर था। इन सभी देशों के मुकाबले भारत का बजट महज 1.2 अरब डॉलर था। बहरहाल, यह स्पष्ट है कि पीएसएलवी के ताजा असफल प्रक्षेपण का जो कुछ असर होगा, वह बहुत क्षीण होगा और इससे इसरो की प्रतिष्ठा पर कोई आंच नहीं आएगी। पूरी दुनिया समझती है कि अंतरिक्ष में उपग्रह छोड़ना अत्यधिक जोखिम वाला काम है, जिसमें बेहद दक्ष माने जाने वाले अमेरिका, रूस और यहां तक प्राइवेट स्पेस एजेंसी चला रहे एलन मस्क के दमदार रॉकेट- फॉल्कन 9 को कई असफलताओं का सामना करना पड़ा है।

सवाल उठता है कि क्या ताजा नाकामी के बाद इसरो निजी एजेंसियों की मदद लेगा? दरअसल अब इसरो का ध्यान अंतरिक्ष से देश के लिए पूंजी जुटाने पर है। इसीलिए उसे निजी क्षेत्र से सहयोग लेने में भी कोई गुरेज नहीं है। असल में, अब उसकी कोशिश है कि निजी क्षेत्र की मदद से वह उपग्रहों और रॉकेट के निर्माण में तेजी लाए और उनके जरिए विभिन्न देशों के सैटेलाइट बेहद प्रतिस्पर्धी कीमतों पर अंतरिक्ष में छोड़े और इससे राजस्व हासिल करे। उम्मीद करें कि निजी सहभागिता इसरो के कामकाज में तेजी लाएगी और इससे होने वाली कमाई से भारत अंतरिक्ष संबंधी वे कामयाबियां हासिल करने की तरफ बढ़ सकेगा, जिनका सपना अभी विकसित देश भी देख रहे हैं।

दूसरे चंद्र अभियान की तैयारी

(शशांक द्विवेदी)

अंतरिक्ष तकनीक में कामयाबी की एक नई कहानी लिखने के लिए भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) 2018 की पहली तिमाही में बड़े मानवरहित अभियान के तहत चंद्रमा पर दूसरा मिशन ‘चंद्रयान-2’ भेजने जा रहा है। इसरो के चेयरमैन एस. किरण कुमार के अनुसार चंद्रमा की धरती पर स्पेसक्रॉफ्ट की लैंडिंग को लेकर परीक्षण चल रहा है और 2018 तक चंद्रयान-2 अभियान लॉन्च हो जाने की उम्मीद है। इसरो इसके लिए एक विशेष इंजन विकसित करेगा जो लैंडिंग को नियंत्रित कर सके। फिलहाल इसका अभ्यास किया जा रहा है जिसके लिए चंद्रमा की सतह जैसी आकृति और वातावरण बनाकर प्रयोग जारी है। फिलहाल इस अभियान को लेकर कई तरह के परीक्षण इसरो कर रहा है और चंद्रमा के लिए जाने वाला उपग्रह भी तैयार है। चंद्रयान-2 नई तकनीकी से तैयार किया गया है जो चंद्रयान-1 से काफी एडवांस है और इसको जीएसएलवी-एमके-2 के जरिए लॉन्च किया जाएगा। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 2003 में भारत की ओर से चंद्रयान-1 अभियान की घोषणा की थी और इसे 2008 में भेजा गया था। चंद्रमा के लिए भारत का पहला मानवरहित अभियान चंद्रयान-1 था। करीब 3.9 अरब रुपये की लागत से तैयार चंद्रयान-1 को साल 22 अक्टूबर 2008 में प्रक्षेपित किया गया था और इसका उद्देश्य चंद्रमा की सतह की मैपिंग और कीमती धातुओं का पता लगाना था।

चंद्रयान-1 की बड़ी सफलता के बाद ही इसरो अब ‘चंद्रयान-2’ को प्रक्षेपित करने की तैयारी कर रहा है।1जीएसएलवी प्रक्षेपण यान द्वारा प्रस्तावित इस अभियान में भारत में निर्मित एक लूनर ऑर्बिटर (चन्द्र यान), एक रोवर एवं एक लैंडर शामिल होंगे। इसरो के अनुसार यह अभियान विभिन्न नई प्रौद्योगिकियों के इस्तेमाल तथा परीक्षण के साथ नए प्रयोगों को भी करेगा। पहिएदार रोवर चंद्रमा की सतह पर चलेगा तथा ऑन-साइट विश्लेषण के लिए मिट्टी या चट्टान के नमूनों को एकत्र करेगा। आंकड़ों को चंद्रयान-2 ऑर्बिटर के माध्यम से पृथ्वी पर भेजा जाएगा। इस अभियान को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से जियोसिंक्रोनस सेटेलाइट लॉन्च वेहिकल एमके-2 द्वारा भेजे जाने की योजना है। उड़ान के समय इसका वजन लगभग 2,650 किलो होगा। ऑर्बिटर को इसरो द्वारा डिजाइन किया जाएगा और यह 200 किलोमीटर की ऊंचाई पर चंद्रमा की परिक्रमा करेगा। इस अभियान में ऑर्बिटर को पांच पेलोड के साथ भेजे जाने का निर्णय लिया गया है। तीन पेलोड नए हैं, जबकि दो अन्य चंद्रयान-1 ऑर्बिटर पर भेजे जाने वाले पेलोड के उन्नत संस्करण हैं। चंद्रमा की सतह से टकराने वाले चंद्रयान-1 के लूनर प्रोब के विपरीत, लैंडर धीरे-धीरे नीचे उतरेगा। लैंडर तथा रोवर का वजन लगभग 1250 किलो होगा। रोवर सौर ऊर्जा द्वारा संचालित होगा। रोवर चंद्रमा की सतह पर पहियों के सहारे चलेगा, मिट्टी और चट्टानों के नमूने एकत्र करेगा, उनका रासायनिक विश्लेषण करेगा और डाटा को ऊपर ऑर्बिटर के पास भेज देगा, जहां से इसे पृथ्वी के स्टेशन पर भेज दिया जाएगा।

इसरो ने कर्नाटक के चल्लाकेरे स्थित केंद्र में अपने महत्वाकांक्षी चंद्रयान-2 मिशन के लिए परीक्षण किए हैं, जहां लैंडिंग मिशन के लिए छद्म चंद्र गड्ढे (सिम्यलैटेड लुनर क्रेटर) बनाए गए हैं। चंद्रयान-2 के उपकरणों और संवेदकों की परख के लिए चंद्रमा की सतह की तरह ही इस केंद्र में जमीन पर कई गड्ढे बनाए गए हैं। साथ ही चल्लाकेरे केंद्र के इस छद्म क्षेत्र में कुछ उपकरणों से लैस एक विमान को उड़ाया गया। उन्होंने कहा, ‘हमने वहां कुछ गड्ढे बनाए हैं। ये परीक्षण हमारे ‘जोखिम टालने एवं लैंडिंग’ अभ्यास का हिस्सा है। लैंडर के नीचे (चंद्रमा पर) उतरने की उम्मीद है। हमें यह पक्का कर लेना होगा कि यह यह उस जगह उतरे जहां बहुत ज्यादा ढलान न हो। अन्यथा लैंडर का एक पैर गड्ढे में फंस सकता है।’ मिशन चंद्रयान-2 पिछले चंद्रयान-1 मिशन का उन्नत संस्करण है जिसमें एक लूनर ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर हैं।
(लेखक मेवाड़ विश्वविद्यालय में उपनिदेशक हैं)

07 September 2017(Thursday)

September 07, 2017 0
07 September 2017(Thursday)

दैनिक समसामयिकी

1.सुप्रीम कोर्ट हैरान, कैसे बढ़ रही नेताओं की दनादन आमदनी

• दो चुनावों के बीच नेताओं की सम्पत्ति में 500 प्रतिशत से भी अधिक बढ़ोतरी होने के बावजूद उनका ब्योरा न देने पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया। केंद्र सरकार द्वारा इस तरह के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई न करने पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी नाराजगी व्यक्त की।
• सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हालांकि सरकार यह कह रही है कि वह चुनाव सुधार के खिलाफ नहीं है लेकिन उसने जरूरी विवरण पेश नहीं किए हैं। यहां तक कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड(सीबीडीटी) द्वारा उसके समक्ष सौंपे गए हलफनामे में दी गई सूचना अधूरी थी।
• जस्टिस जे चेलमेश्वर और एस अब्दुल नजीर की बेंच ने कहा कि सीबीडीटी के हलफनामे में सूचना अधूरी है। क्या यह भारत सरकार का रुख है। आपने अब तक क्या किया है। अदालत ने कहा कि सरकार कह रही है कि वह कुछ सुधार के खिलाफ नहीं है। जरूरी सूचना अदालत के रिकार्ड में होनी चाहिए। अदालत ने सरकार से 12 सितंबर तक इस संबंध में विस्तृत हलफनामा दायर करने को कहा।
• सुप्रीम कोर्ट चुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने के दौरान उम्मीदवारों द्वारा आय के स्रेत का खुलासा करने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है। सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी। सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से पेश वकील ने कहा कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव देश के लोकतांत्रिक ढांचे का अभिन्न हिस्सा है और वे इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के किसी भी निर्देश का स्वागत करेंगे।
• उन्होंने कहा कि भारत सरकार स्वच्छ भारत अभियान चला रही है जिसके दायरे में यह क्षेत्र भी आएगा। यह सिर्फ कचरे की सफाई करने तक सीमित नहीं है। भारत सरकार की मंशा सही दिशा में है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि सरकार सूचना सार्वजनिक करना नहीं चाहती तो वह सीलबंद लिफाफे में संबंधित जानकारी दे सकती है। लेकिन आमदनी में बेतहाशा वृद्धि की बात स्पष्ट करनी होगी। एनजीओ लोक प्रहरी ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।
• याचिका में कहा गया है कि नामांकन के समय प्रत्याशी अपनी सम्पत्ति का ब्योरा देते हैं लेकिन यह नहीं बताते कि उनकी आमदनी का जरिया क्या है। आय का स्रेत बतना जरूरी है ताकि जनसाधारण को पता चल सके कि नेताओं की आय तेजी से कैसे बढ़ जाती है।

2. रोहिंग्या संकट पर भारत म्यांमार के साथ

• भारत ने म्यांमार के रखाइन प्रांत में रोहिंग्या समुदाय के कट्टरपंथी लोगों की हिंसा   और सुरक्षाबलों की जवाबी कार्रवाई में जनजीवन की हानि को लेकर वहां की सरकार की चिंताओं को साझा किया और उसके साथ सुरक्षा संबंधी सहयोग को व्यापक एवं सशक्त बनाने का फैसला किया।
• प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी समकक्ष एवं म्यांमार की स्टेट काउंसलर आंग सान सू की के साथ बुधवार को यहां द्विपक्षीय बैठक में यह भावना व्यक्त की।
• प्रधानमंत्री ने विास व्यक्त किया कि आने वाले समय में भारत एवं म्यांमार पारस्परिक लाभ के लिए सशक्त और नजदीकी साझेदारी बनाने के लिए मिलकर काम करेंगे।
• सहयोग के कदम : दोनों देशों ने आपसी सहयोग की दिशा में अहम कदम उठाते हुए 11 समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिनमें चार समझौते समुद्री एवं तटीय सुरक्षा एवं पुलिस प्रशिक्षण में सहयोग से जुड़े हैं। अन्य समझौते प्रेस परिषद, संस्कृति, चुनाव आयोग, स्वास्य एवं तकनीकी प्रशिक्षण से संबंधित हैं।
• निकट संबंध का संकल्प : मोदी ने म्यांमार के सभी नागरिकों को नि:शुल्क वीजा दिए जाने तथा भारत की जेलों में कैद म्यांमार के 40 नागरिकों को रिहा किए जाने की भी घोषणा की। इस प्रकार से भारत ने म्यांमार के बीच नागरिकों के स्तर पर निकट संबंध स्थापित करने के संकल्प का इजहार किया।
• सू की की सराहना : बैठक के बाद संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में मोदी ने म्यांमार शांति प्रक्रिया में सुश्री आंग सान सू की के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा, जिन चुनौतियों का आप मुकाबला कर रही हैं, हम उन्हें पूरी तरह समझते हैं। राखाइन प्रांत में चरमपंथी हिंसा  के चलते खासकर सुरक्षाबलों और मासूम जनजीवन की हानि को लेकर आपकी चिंताओं के हम भागीदार हैं।
• सुरक्षा के हित : भारत एवं म्यांमार के बीच सुरक्षा एवं रक्षा संबंधी सहयोग की महत्ता को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, पड़ोसी होने के नाते, सुरक्षा के क्षेत्र में हमारे हित एक जैसे ही हैं। इसलिए यह जरूरी है कि हम अपनी लंबी जमीनी और समुद्री सीमा पर सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने के लिए मिलकर काम करें।
• प्रधानमंत्री ने कहा, चाहे वह बड़ी शांति प्रक्रिया हो या किसी विशेष मुद्दे को सुलझाने की बात, हम आशा करते हैं कि सभी पक्षकार मिलकर ऐसा हल निकालने की दिशा में काम कर सकते हैं जिससे म्यांमार की एकता और भौगोलिक अखंडता का सम्मान करते हुए सभी के लिए शांति, न्याय और सम्मान सुनिश्चित होंगे।

• मोदी ने कहा, भारत एवं म्यांमार के बीच सड़कों और पुलों का निर्माण, ऊर्जा के लिंक्स और कनेक्टिविटी बढ़ाने के हमारे प्रयास, एक अच्छे भविष्य की ओर संकेत करते हैं।
• उन्होंने कहा, भविष्य में भी हमारी परियोजनाएं म्यांमार की आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के अनुरूप होंगी। हमारे दोनों देशों के बीच हुए समझौतों से हमारे बहुमुखी द्विपक्षीय सहयोग को और भी बल मिलेगा। प्रधानमंत्री ने ने प्यी ताउ में अपने प्रवास को ‘‘बहुत सार्थक’ बताया और कहा, म्यांमार में अपने शेष प्रवास को लेकर भी उनके मन में उत्साह हैं।

3. भारत, जापान रक्षा सहयोग बढ़ाएंगे

• भारत एवं जापान ने दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकी सहित रक्षा उत्पादन में वृद्धि के लिए सहयोग बढ़ाने पर बुधवार को सहमति जतायी। साथ ही दोनों देशों ने द्विपक्षीय विशेष सामरिक प्रारूप के तहत समग्र सैन्य संपर्क कायम करने के प्रयास तेज करने पर प्रतिबद्धता जताई।
• रक्षामंत्री की हैसियत से जापान गये अरूण जेटली और उनके जापानी समकक्ष इत्सुनोरी ओनेडेरा के बीच मंगलवार को टोक्यो में विभिन्न मुद्दों पर र्चचा हुई।
• यह बातचीत भारत-जापान वार्षकि रक्षा मंत्री वार्ता के तहत हुई जिसमें अमेरिका के जल-थल-आकाश में चलने वाले विमान का मुद्दा भी उठा। एक संयुक्त वक्तव्य में यह जानकारी दी गई। भारत एवं जापान के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने का यह निर्णय ऐसे समय में हुआ है जबकि उत्तरी कोरिया के परमाणु परीक्षण के चलते क्षेत्र में तनाव कायम हो गया है तथा दक्षिणी चीन सागर को लेकर चीन की दावेदारी बढ़ती जा रही है।
• भारत अपनी नौसेना के लिए जापान से यूएस-2 शिनमायवा विमान खरीदने की योजना बना रहा है। पिछले साल चीन ने इन खबरों पर प्रतिक्रिया दी थी कि जापान भारत को सस्ते दामों पर हथियार बेचने की योजना बना रहा है।

4. भारत-रूस मैत्री बहुत मजबूत : सुषमा

• विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने बुधवार को रूस के अपने समकक्ष सरजेई लावरोव से कहा कि दोनों देशों के बीच बेहद मजबूत दोस्ती को कोई कमजोर नहीं कर सकता। सुषमा ने व्लादिवोस्तोक में आयोजित हो रहे ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम के इतर लावरोव से मुलाकात की।
• उन्होंने कहा, दोनों देशों के बीच संबंध चट्टान की तरह मजबूत हैं। रूस स्थित भारतीय दूतावास ने एक ट्वीट करके यह जानकारी दी। उनके बीच बातचीत का ब्योरा तत्काल उपलब्ध नहीं है। इससे पहले सुषमा ने फोरम में भारत रूस व्यापारिक र्चचा में भाग लिया।
• उन्होंने कहा, भारत रूस के संसाधन समृद्ध सुदूर पूर्वी भाग के साथ अपने आर्थिक संबंधों का विस्तार करने का इच्छुक है और भारत ने क्षेत्र में भारतीय निवेशकों की मदद हेतु रूसी सरकार से सहायता मांगी है।
• उन्होंने कहा, मेक इन इंडिया और स्टार्ट अप इंडिया कार्यक्रमों के तहत भारत सरकार ने दुनियाभर से निवेश एवं प्रौद्योगिकी आकर्षित की है।

5. प्रतिबंध और दबाव से नहीं मानेगा उत्तर कोरिया

• उत्तर कोरिया पर प्रतिबंधों को बढ़ाने की तैयारी के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि प्रतिबंध और दबाव से कोरियाई प्रायद्वीप की समस्या हल नहीं होगी। उत्तर कोरिया को मुख्यधारा में लाने के लिए उसके साथ बैठकर बात करनी होगी।
• पुतिन ने यह बात दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जेई-इन के साथ वार्ता में कही है। इससे पहले मून ने कहा कि उत्तर कोरिया ने अपनी भड़कावे वाली गतिविधियां बंद नहीं कीं तो कोरियाई प्रायद्वीप की स्थिति अप्रत्याशित रूप से बिगड़ सकती है।
• आर्थिक सम्मेलन में शामिल होने के लिए रूस के शहर व्लादिवोस्टक पहुंचे दोनों नेताओं ने अलग से मुलाकात की है। 1मून ने उत्तर कोरिया के लगातार जारी मिसाइल परीक्षणों और ताजा परमाणु परीक्षण पर गहरी चिंता जताई। कहा कि उत्तर कोरिया लंबी दूरी की बैलेस्टिक मिसाइल का परीक्षण करने की तैयारी में है, इससे हालात और बिगड़ेंगे। व
• ह चाहते हैं कि उत्तर कोरिया को रोकने के लिए रूस भी अपने प्रभाव का इस्तेमाल करे। उत्तर कोरिया के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र के और कड़े प्रतिबंधों की वकालत करते हुए मून ने कहा कि अब उनके पड़ोसी को तेल का निर्यात रोका जाना चाहिए। लेकिन पुतिन ने इस प्रस्ताव पर ठंडी प्रतिक्रिया दी।
• इससे पहले संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत निक्की हेली ने कहा कि कोरियाई प्रायद्वीप में हालात बिगड़ते जा रहे हैं। अमेरिका युद्ध नहीं चाहता लेकिन उत्तर कोरिया युद्ध करने पर आमादा है। संयम की भी सीमा होती है। इसलिए समय रहते उत्तर कोरिया को रोका जाना चाहिए। जबकि संयुक्त राष्ट्र में उत्तर कोरिया के राजदूत हान तेई सोंग ने कहा है कि उनका देश आत्मरक्षा में हथियारों का विकास कर रहा है, जो उसका हक है।
• इस बीच अमेरिका ने चीन में हुए ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण के निंदा किये जाने की सराहना की है।
• दक्षिण कोरिया में थाड की तैनाती : दक्षिण कोरिया में उत्तर कोरिया की सीमा के नजदीक अमेरिकी एंटी मिसाइल सिस्टम थाड की चार और बैटरी गुरुवार को तैनात कर दी जाएंगी। दो बैटरी वहां पहले से ही कार्य कर रही हैं। उत्तर कोरिया की ओर से हमले के खतरे को देखते हुए अमेरिका ने इस अत्याधुनिक एंटी मिसाइल सिस्टम को तैनात किया है।
• चीन के कड़े विरोध के बावजूद दक्षिण कोरिया में थाड की तैनाती की गई है। थाड के शक्तिशाली रडार चीन में काफी भीतर की सैन्य गतिविधियों को पकड़ लेते हैं।

6. टीआरएस विधायक रमेश चिन्नमनेनी की भारत की नागरिकता छिनी

• केंद्रीय गृह मंत्रालय  ने तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के विधायक रमेश चिन्नमनेनी की नागरिकता छीन ली है। जांच में उनके पास जर्मनी का पासपोर्ट पाया गया है। इस मामले में प्रतिक्रिया के लिए काफी प्रयासों के बावजूद चेन्नमनेनी से संपर्क नहीं हो सका है।
• भारत में दोहरी नागरिकता का कोई प्रावधान नहीं है। जन प्रतिनिधित्व कानून के अनुसार, कोई भी व्यक्ति, जो भारतीय नागरिक नहीं है, वह किसी भी चुनाव में न तो भाग ले सकता है और न ही मतदान कर सकता है।
• रमेश तेलंगाना में करीमनगर जिले की वेमुलावडा विधानसभा सीट से विधायक हैं।
• उन्होंने कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के जरिये भारतीय नागरिकता हासिल की है। वह एक उपचुनाव सहित तीन बार विधानसभा के लिए चुने गए हैं।
• गृह मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया, अदालत ने विधायक की जांच का आदेश दिया था। जांच में पता चला कि रमेश चेन्नमनेनी जर्मन नागरिक हैं। इसके बाद उनकी नागरिकता रद की गई। रमेश के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में उनके निर्वाचन को यह कहते हुए चुनौती दी थी कि चेन्नमनेनी जर्मनी के पासपोर्ट धारक हैं।
• उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने जांच के आदेश दिए थे। जांच में पाया गया कि विधायक के पास जर्मनी की नागरिकता है। वह कभी भी भारत में 12 महीनों से अधिक नहीं रुके, जैसा कि विदेशी अधिनियम के तहत किसी विदेशी नागरिक के लिए आवश्यक है।
• रमेश पहली बार 2009 में तेदेपा के टिकट पर अविभाजित आंध्र प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए थे। बाद में वह टीआरएस में शामिल हो गए और पद से इस्तीफा दे दिया। 2010 में हुए उप चुनाव में टीआरएस के टिकट पर वह उसी सीट से फिर चुने गए। साल 2013 में, आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने उनके निर्वाचन को खारिज कर दिया। इसके बाद रमेश ने सुप्रीम कोर्ट में शरण ली। तब शीर्ष कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी।
• रोक जारी रहने के दौरान ही वह 2014 में हुए तेलंगाना विधानसभा चुनाव में टीआरएस के टिकट पर मैदान में उतरे और जीत हासिल की। इस पर उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार ने सुप्रीम कोर्ट से हाई कोर्ट के आदेश पर लगाई रोक को हटाने की मांग की।
• शीर्ष कोर्ट ने तब केंद्रीय गृह मंत्रालय को इस मामले में रिपोर्ट दाखिल करने को कहा। जांच के बाद मंत्रलय ने रमेश के पास जर्मनी की नागरिकता होने की पुष्टि की।