Saturday, September 16, 2017

दैनिक समसामयिकी 16 Sep 2017(Saturday)

September 16, 2017 0
दैनिक समसामयिकी
16 Sep 2017(Saturday)

1.अफगान में महत्वपूर्ण चुनौतियों की जड़ पाकिस्तान : अमेरिका

• अफगानिस्तान में अमेरिका के राजदूत नामित किए गए जॉन आर बास ने सांसदों से कहा कि अमेरिका, अफगानिस्तान में पाकिस्तान के समर्थन और सहयोग के बिना कामयाब नहीं हो पाएगा, जो युद्धग्रस्त इस देश में महत्वपूर्ण चुनौतियों की जड़ रहा है।
• जॉन आर बास ने अपने नामांकन को मंजूरी देने के लिए सीनेट की विदेश संबंधों की समिति के समक्ष हुई बहस के दौरान कहा कि अगर उनके नाम को मंजूरी मिल जाती है तो वह पाकिस्तान सरकार के रुख को बदलने की और इस समस्या का सबसे अच्छा समाधान खोजने की कोशिश करेंगे। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बास को अफगानिस्तान में अमेरिका का राजदूत नामित किया है।
• बास ने कहा, जाहिर तौर पर, पाकिस्तान की अफगानिस्तान में अहम भूमिका है। जैसा कि हम जानते हैं वे अफगानिस्तान में कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों की जड़ हैं। इसलिए हमें काफी काम करना है। सांसदों के सवालों का जवाब देते हुए बास ने कहा कि अमेरिका के पास अगर पाकिस्तान, उसके पड़ोसियों और व्यापक क्षेत्र में महत्वपूर्ण देशों का समर्थन और सहयोग नहीं होगा तो वह कामयाब नहीं हो पाएगा।
• उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि इस जटिल परिदृश्य से गुजरते हुए हमारे पक्ष में जो बात है, वह यह है कि हर कोई अफगानिस्तान में एक जैसे परिणाम देखना चाहता है।
• अफगानिस्तान में हिंसा जारी रहना और आतंकवादियों के लिए पनाहगाह बने रहना किसी के भी हित में नहीं है। हमारी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि इन सभी देशों के बीच हम एक साझा रुख बनाएं कि कैसे हम वे परिणाम हासिल कर सकते हैं, जो हम सब देखना चाहते हैं।

2. भारत-जापान की बढ़ती नजदीकी से चीन बेचैन : इससे चीन के बेल्ट रोड इनिसिएटिव को मिलेगी बड़ी चुनौती

• अगर भारत और जापान के बीच गुरुवार को अहमदाबाद में हुई 12वीं द्विपक्षीय सालाना बैठक को इन दोनों देशों के बीच अभी तक का सबसे अहम विमर्श माना जा रहा है तो उसके पीछे कई वजहें भी हैं। दोनों देशों ने अप्रैल, 2017 में इस बात के संकेत दे दिए थे कि वे चीन की ‘वन बेल्ट, वन रोड’ (नया नाम बेल्ट रोड इनिशिएटिव-बीआरआइ) को चुनौती पेश करेंगे, लेकिन इस बैठक के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि इनकी रणनीति क्या है।
• दोनों देशों की नजर एशिया से लेकर अफ्रीका तक में सिर्फ रेलवे, सड़क व समुद्री मार्ग को विकसित करने की ही नहीं है बल्कि इनके साथ औद्योगिक कॉरीडोर व औद्योगिक नेटवर्क का जाल विकसित करने की भी है। सीधे तौर पर भारत और जापान की तरफ से की गई यह घोषणा चीन की बीआरआइ की तरह दिखती है लेकिन इसके क्रियान्वयन का तरीका पूरी तरह से भिन्न होगा।
• भारत और जापान के कूटनीतिक रणनीतिकारों को यह मालूम है कि चीन की एशिया, अफ्रीका व पूर्वी यूरोप को ढांचागत कनेक्टिविटी से जोड़ने की योजना अभी सही तरीके से शुरू भी नहीं हुई है कि इसको लेकर कई तरह के विरोध का स्वर सुनाई देने लगे हैं।
• यही वजह है कि मोदी और एबी के बीच जब अफ्रीका व एशिया के दूसरे देशों में संयुक्त तौर पर विकास कार्य करने को लेकर बात हुई तो इसमें सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया गया कि जिस भी देश में परियोजना चालू हो उसकी पूरी सहमति हो। जिस देश में परियोजना लागू की जाएगी उसके कायदे कानून का पूरी तरह से पालन करने के साथ ही इस बात का भी ख्याल रखा जाएगा कि इस परियोजना से उस देश के हितों को कोई नुकसान नहीं पहुंचे।
• भारत और जापान के बीच अफ्रीका के विकास में सहयोग को लेकर वैसे तो वर्ष 2010 से ही वार्ता हो रही है लेकिन इसकी अभी तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है। गुरुवार को यह सहमति बनी है कि अफ्रीका में बनाए जाने वाले औद्योगिक कारीडोर के नेटवर्क को लागू करने में इंडो-जापान डॉयलाग ऑन अफ्रीका में अहम फैसले किए जाएंगे। सूत्रों के मुताबिक औद्योगिक नेटवर्क दोनों देशों के निजी क्षेत्र के लिए कई तरह के अवसर पैदा करेगा।
• चूंकि अफ्रीका भारत के ज्यादा करीब है, इसलिए निश्चित तौर पर इसका वह ज्यादा फायदा उठाने की स्थिति में होगा। जापान की तरफ से वित्तीय व तकनीकी मदद दी जाएगी, और जापानी की कंपनियों को भी एक बड़ा बाजार मिल सकेगा। एशियाई विकास बैंक और अफ्रीकन डेवलपमेंट बैंक के साथ भी दोनों देशों की बात हो रही है कि उन्हें औद्योगिक नेटवर्क में शामिल किया जाए।
• पूर्वी एशिया में इस नेटवर्क का जो हिस्सा होगा उससे भारत को सबसे अहम फायदा यह होगा कि पूवरेत्तर राज्यों को इससे जोड़ा जा सकेगा। जापान चाहता है कि भारत की लुक ईस्ट नीति को और मजबूती मिले और इसके लिए पूर्वोत्तर  राज्यों का विकास बहुत जरूरी है।
• जापान इसके लिए अलग से भारत को मदद देने को भी तैयार है। साथ ही पूवरेत्तर राज्यों का विकास चीन की तरफ से नेपाल, बांग्लादेश व म्यांमार को एक रोड नेटवर्क से जोड़ने की योजना के लिए भी चुनौती पेश कर सकेगा।

3. भारत और रूस के बीच होगा पहला त्रिकोणीय युद्ध अभ्यास

• रूस अब भारत के साथ त्रिकोणीय युद्ध अभ्यास करने वाला है। भारत और रूस ने शुक्रवार को एक समझौते पर दस्तखत किए जिसमें तीनों सेनाओं के साथ सैन्य अभ्यास की बात कही गई है। 19 अक्टूबर से 29 अक्टूबर के बीच यह बड़ा सैन्य अभ्यास होगा, जिसमें आर्मी, एयरफोर्स और नेवी की भागीदारी के साथ त्रिकोणीय युद्ध अभ्यास किया जाएगा।
• मजबूत सामरिक रिश्ते रखने वाले भारत और रूस के बीच इस तरह का यह पहला युद्ध अभ्यास होगा। यह पहली बार होगा जब भारत की तीनों सेनाएं एक साथ किसी देश का साथ अभ्यास करेंगी। रूस भारत के लिए पिछले काफी दशकों से सबसे बड़ा रक्षा उत्पादों का आपूर्तिकर्ता रहा है।
• 1960 के दशक से देखा जाए तो भारत रूस से 50 अरब डॉलर से ज्यादा के हथियार और सैन्य सामग्री खरीद चुका है, लेकिन दोनों देशों की सेनाओं के बीच उस अनुपात में सैन्य अभ्यास नहीं होता। उल्लेखनीय है कि हाल के वर्षो में रूस ने पाकिस्तान के साथ अपनी नजदीकियां बढ़ाई हैं। हाल ही में उसने पाकिस्तान के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास भी किया है।

4. कैदियों की अस्वाभाविक मौत पर परिजनों को दें मुआवजा : सुप्रीम कोर्ट

• सुप्रीम कोर्ट ने जेल में अमानवीय स्थितियों और कैदियों की मौतों पर चिंता जताते हुए शुक्रवार को जेल सुधार पर 11 दिशा निर्देश जारी किए।
• कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों से कहा है कि वे कैदियों की अस्वाभाविक मौतों के मामले में स्वत: संज्ञान लेकर जनहित याचिका पर सुनवाई करें और उनके परिजनों की पहचान कर उन्हें मुआवजा दें। ये मुआवजा राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में 2012 से 2015 के बीच दर्ज कैदियों की अस्वाभाविक मौतों के मामलों में दिया जाएगा।
• इसके अलावा सुधार गृहों में रह रहे बच्चों की अस्वाभाविक मौतों के बारे में कोई आंकड़ा या ब्योरा न मौजूद होने पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय  को निर्देश दिया कि वह राज्यों से परामर्श करके इस बारे में आंकड़े और ब्योरा रखने की प्रक्रिया तैयार करे।
• जस्टिस मदन बी. लोकुर व जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने 1382 जेलों में अमानवीय स्थिति मामले की सुनवाई करते हुए जेल सुधार पर ये दिशानिर्देश जारी किए। कोर्ट में इस मामले की सुनवाई पूर्व प्रधान न्यायाधीश आरसी लाहोटी की ओर से जेलों में अमानवीय स्थिति पर प्रधान न्यायाधीश को भेजे गए पत्र पर शुरू हुई थी।
• पत्र में जस्टिस लाहोटी ने जेलों में जरूरत से ज्यादा कैदी, कैदियों की अस्वाभाविक मौतों, स्टाफ की कमी और उपलब्ध स्टाफ के अप्रशिक्षित या कम प्रशिक्षित होने का मुद्दा उठाया था। सुप्रीम कोर्ट ने 43 पेज के अपने फैसले में कहा है कि हिरासत में ¨हसा सभ्य समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
• फैसले में जेलों में स्वाभाविक और अस्वाभाविक मौतों के बारे में एनसीआरबी के 2012 से 2015 तक के आंकड़े उद्धत किए गए हैं। हालांकि कोर्ट ने कहा कि इसमें एनसीआरबी ने स्पष्ट वर्गीकरण नहीं दिया है। इसमें हिरासत में मौतों को लेकर एनएचआरसी के दिशानिर्देशों और रिपोर्टो की भी चर्चा की गई है।
• हाई कोर्ट लें स्वत: संज्ञान : कोर्ट ने फैसले की प्रति सभी हाई कोर्ट को भेजने का निर्देश देते हुए मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध किया है कि वे स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई करें और एनसीआरबी के 2012 से 2015 तक के आंकड़ों में कैदियों की अस्वाभाविक मौतों के मामलों में परिजनों की पहचान कर उन्हें उचित मुआवजा दें।
• कोर्ट ने कहा कि वे सभी उपाय किए जाएं जिससे हिरासत में मौत की संभावनाएं न बनें। यह भी कहा है कि जेल में होने वाली हर स्वाभाविक और अस्वाभाविक मौत का दस्तावेजी रिकॉर्ड रखा जाए।
• गृह मंत्रलय को 31 अक्टूबर तक का समय : कोर्ट ने गृह मंत्रलय को निर्देश दिया है कि वह 31 अक्टूबर तक मॉडल प्रिजन मैनुअल, जेलों में आत्महत्याएं रोकने पर एनएचआरसी की रिपोर्ट, सरकार की विभिन्न एडवाइजरी, हिरासत में मौतों की जांच के बारे में इंटरनेशनल रेड क्रॉस कमेटी की गाइडलाइंस आदि सभी राज्यों के जेल अधीक्षकों को भेजें। साथ ही गृह मंत्रलय एनसीआबी को निर्देश दे कि वह स्वाभाविक और अस्वाभाविक मौतों को आंकड़ों में अलग-अलग स्पष्ट करे और उपश्रेणियां भी बनाए।
• इस पर 31 अक्टूबर तक अमल होना चाहिए। 1परिजनों से मिलाई को दें बढ़ावा : राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे कैदियों की काउंसलिंग के लिए काउंसलर नियुक्त करें। कैदियों के परिजनों की मिलाई को बढ़ावा दिया जाए। कैदी की परिजनों से फोन अथवा वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये बात कराई जाए। कोर्ट ने कहा कि कैदियों को बेहतर चिकित्सीय सुविधाएं मिलनी चाहिए।
• खुली जेलों के सुझाव पर विचार करे सरकार : सरकारें एमाइकस क्यूरी गौरव अग्रवाल के खुली जेलें बनाने के सुझाव पर भी विचार करें। क्योंकि बताया गया है कि हिमाचल प्रदेश के शिमला और दिल्ली में सेमीओपन जेल के प्रयोग सफल रहे हैं ऐसे में इस पर अध्ययन होना चाहिए।

5. रूपये की मजबूती पर रोक लगाए रिजर्व बैंक

• पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार शंकर आचार्य ने शुक्रवार को कहा कि रिजर्व बैंक को रूपये  का अब और मजबूत होने से रोकना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह सही समय है जब इस स्थिति को बदला जाना चाहिए।
• उन्होंने एमसीसीआई के एक कार्यक्रम में यहां कहा, अर्थव्यवस्था की अल्पकालिक मदद के लिए रिजर्व बैंक को तुरंत कदम उठाने चाहिए और रूपये में आती मजबूती को नरम करना चाहिए।
• इससे निर्यात को बल मिलेगा तथा घरेलू विनिर्माण क्षेत्र में तेजी आएगी।
• इंडियन कौंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशल इकोनॉमिक रिलेशंस के मानद प्रोफेसर आचार्य ने कहा कि अभी जब अर्थव्यवस्था खराब स्थिति में है, सरकार के लिए खर्च बढ़ाकर इसे संभालना मुश्किल होगा।
• उन्होंने कहा, अभी के समय इसके लिए काफी कम संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि जीएसटी के क्रियान्वयन के बाद राजस्व संग्रहण में अनिश्चितता के कारण यह स्थिति है।
• आचार्य ने कहा, अभी 2017-18 में जो चिंता की बात है वह यह कि केंद्र और राज्यों का सम्मिलित वित्तीय घाटा जीडीपी का करीब सात सात होगा। यह बहुत ज्यादा है। उन्होंने आगे कहा कि कृषि ऋण माफी के कारण राज्य भी बुरी स्थिति में हैं।
• सरकार मौजूदा खर्च अथवा कर्ज के जरिए निवेश जरूरतों की पूर्ति कर सकती है पर इससे ब्याज दरों पर फिर से दबाव पड़ेगा।

6. विदेशी मुद्रा भंडार 400 अरब डालर के पार

• देश का विदेशी मुद्रा भंडार 2.60 अरब डालर बढ़कर 400.72 अरब डालर हो गया है जो अब तक का रिकार्ड उच्च स्तर है। यह आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक ने आठ सितम्बर को समाप्त हुए सप्ताह के आधार पर जारी किया है।
• इससे पिछले हफ्ते में यह 3.57 अरब डालर बढ़कर 398.12 अरब डालर था। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार विदेशी मुद्रा भंडार में इस बढ़ोतरी की प्रमुख वजह विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों का बढ़ना है।
• समीक्षा अधीन सप्ताह में यह 2.56 अरब डालर बढ़कर 376.20 अरब डालर हो गई। देश का स्वर्ण भंडार इसी अवधि में 20.691 अरब डालर पर अपरिवर्तित रहा है।

7. हृदय रोग और तंबाकू से विश्व में सबसे ज्यादा मौतें

• दुनिया में पिछले साल सबसे अधिक मौतें हृदय रोग और तंबाकू के कारण हुईं। वहीं पौष्टिक आहार की कमी और मानसिक विकार के कारण सर्वाधिक लोग बीमार हुए। ये बातें ‘द ग्लोबल बर्डेन ऑफ डिसीज’ (जीबीडी) के अध्ययन में सामने आईं हैं। इसे ‘द लैंसेट मेडिकल जर्नल’ में प्रकाशित किया गया है।
• शोध के अनुसार लोगों की जीवन प्रत्याशा (आयु सीमा) बढ़ने के साथ ही बीमारियां भी बढ़ी हैं। बीमारियों से ग्रस्त जीवन बिताने वालों की संख्या समृद्ध देशों की तुलना में गरीब देशों में अधिक है।
•  मुख्य शोधकर्ता क्रिस्टोफर मुरे ने कहा, ‘बढ़ती मृत्यु दर किसी भी देश या व्यक्ति के लिए नसीहत है ताकि वो इन बीमारियों से निपटने का तरीका ढूंढे । विडंबना है कि इन बीमारियों से निपटने के लिए अधिक प्रयास नहीं किए गए हैं। मोटापा और मानसिक बीमारियां लंबे समय से लोगों के स्वस्थ जीवन शैली में बाधा बनी हुई हैं।’
• शोध में शामिल 130 देशों के 2500 शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन में पाया कि 2016 में पांच में से एक मौत पौष्टिक आहार की कमी से हुई और करीब 70 लाख लोग तंबाकू के कारण मरे। दुनिया भर में हुई मौतों में से 72 फीसद मधुमेह और हृदय रोग के कारण हुईं।
• 2016 में करीब 95 लाख लोग हृदय रोग के कारण समय पूर्व मृत्यु का शिकार हुए। इनके अतिरिक्त विश्व में करीब एक अरब लोग मानसिक बीमारियों से पीड़ित हैं। यह शोध बिल एंड मिलिंडा गेट्स फांउडेशन से वित्त पोषित था जिसमें 195 देशों में मृत्यु के कारण और 330 बीमारियों के आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं।
• लगभग एक दशक में ऐसा पहली बार हुआ है जब विश्व में भुखमरी बढ़ी है। दुनिया की 11 फीसदी जनसंख्या भुखमरी से प्रभावित हुई है। यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने मिलकर तैयार की है। पिछले साल विश्व भर में करीब 81.5 करोड़ लोग भुखमरी से पीड़ित थे जो 2015 से 3.8 करोड़ ज्यादा है।
• रिपोर्ट में यह बात भी निकल कर सामने आई कि सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने के लिए हमें इसकी समीक्षा करनी चाहिए और 2030 तक इसके खत्म करने के उपाय पर विचार करना चाहिए। पहली बार 2014 में भुखमरी बढ़ने के लक्षण देखने को मिले थे।
• दुनिया भर में बढ़ता संघर्ष भी इसकी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। दुनिया भर में युद्धरत क्षेत्रों में करीब 48.9 करोड़ लोग भुखमरी से पीड़ित हैं। इनमें दक्षिण सूडान, नाइजीरिया, सोमालिया, यमन आदि देश शामिल है।

8. ओजोन क्षरण से पृथ्वी का अस्तित्व खतरे में

• विश्व में हो रहे विभिन्न कायरें का ओजोन परत पर दुष्प्रभाव पड़ने से इसमें लगातार क्षरण, जहरीली गैसों का उत्सर्जन और पर्यावरण असंतुलन हो रहा है। ओजोन परत में इसी तरह क्षरण जारी रहा तो पृथ्वी  पर रहने वाले मनुष्य, जीव-जन्तु, वनस्पति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
• ओजोन परत सूर्य से पृथ्वी पर आने वाली हानिकारक अल्ट्रावॉयलट किरणों को रोकने के साथ ही सुरक्षा कवच का भी काम करती है।आधिकारिक जानकारी के अनुसार एप्को के कार्यपालन संचालक एवं प्रमुख सचिव अनुपम राजन ने यह बात आज अन्तर्राष्ट्रीय ओजोन दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में कही।
• एप्को ने अन्तरराष्ट्रीय ओजोन दिवस पर आज भोपाल सहित प्रदेश के सभी जिलों में ओजोन परत पर आधारित प्रश्नोत्तरी, चित्रकला, निबंध आदि प्रतियोगिताएं और रैली का आयोजन किया।
• उन्होंने बच्चों का आह्वान करते हुए कहा कि पूरे विश्व, देश और प्रदेश के जिलों में आज ओजोन परत को बचाने के लिये कार्यक्रम हो रहे हैं। इनका उददेश्य भावी पीढ़ी को बेहतर पर्यावरण और धरती देना है।
• श्री राजन ने बच्चों से कहा पिछले 50 वर्षों से धरती का तापमान लगातार बढ़ने के साथ पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है।

भारत-जापान : इस दोस्ती के मायने (डॉ विजय राय)

September 16, 2017 0
भारत-जापान  : इस दोस्ती के मायने

(डॉ विजय राय)

पहले खास मेहमान के साथ आठ किलोमीटर का अभूतपूर्व शानदार रोड शो और फिर उनके दिलखुश स्वागत में सजाये गए सिलसिलेवार घटनाक्रम के बीच देश-दुनिया ने पाया कि वैयक्तिक-स्पर्शित राजनय ने द्विपक्षीय संबंधों में एक विशिष्ट गत्यात्मक आयाम दे दिया है। इससे गहराई और ऊंचाई के साथ विस्तार मिल गया है। अब भारत-जापान संबंध इकहरे नहीं रहे बल्कि वह वर्तमान और भविष्य के वास्तविक तकाजों को देखते बहुउद्देशीय और बहुदेशीय हो गए हैं। प्रशांत क्षेत्र के साथ अफ्रीका तक में सहभागिता की भारत की क्षेत्रीय और नियंतण्र महत्त्वाकांक्षी भूमिका को ठोस तरीके से परिभाषित करती है। इसने कइयों को चिढ़ा दिया है-चीन को भी। यह अहम सिरा है, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की दो दिवसीय भारत यात्रा के निहितार्थ के समझने का। हालांकि यह संदेश बुलेट ट्रेन के सपने को साकार होते देखने में कहीं दब गया है।इसमें संदेह नहीं कि चहुंमुखी तरक्की को एक नियमित और व्यवस्थित रफ्तार देने के लिए भारत को बुलेट ट्रेन की जरूरत है। आखिर, अंतरिक्ष कार्यक्रमों के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन करने वाले भारत को केवल इसी आधार पर कैसे रोका जा सकता है कि वह अभी इसकी पात्रता नहीं रखता है!

आजादी के बाद जब परमाणु या अंतरिक्ष कार्यक्रमों की नींव रखी गई तो भी यही तर्क दिया गया था कि भारत को पहले अपनी मूलभूत समस्याओं से निजात पा लेनी चाहिए। निश्चित रूप से आत्मनिर्भरता किसी भी देश की प्राथमिकता होती है। लेकिन एक काम को रोक कर दूसरा नहीं किया जा सकता। आज देश की वैज्ञानिक-तकनीकी प्रगति और उस पर मिल रही वाहवाही ने तत्कालीन नेतृत्व के उस फैसले को सही ठहराया कि भारत को अलभ्य लगने वाली दिशा में भी पांव बढ़ाना चाहिए। मंगल पर पहुंचना इसका बड़ा प्रमाण है। अलबत्ता, बुलेट ट्रेन के मार्ग के चयन को लेकर असहमति हो सकती है। यह अहमदाबाद और मुंबई के बीच चलाई जाने वाली है, जिनके बीच पहले से ही यातायात के भरपूर संसाधन हैं। यह जायज आलोचना हो सकती है। यह भी कि जब बिना नागा किये ट्रेनें रोज पटरी से उतरने के रिकार्ड बना रही हों, पहले उनको संभालना जान-माल की सुरक्षा के लिहाज से ज्यादा सही होता। इसके बजाय आगामी गुजरात विधान सभा चुनाव जीतने के लिए एक लाख 10 हजार करोड़ रुपये की महंगी परियोजना लाई जा रही है। इतनी राशि स्वास्य क्षेत्र पर खर्च की जाती तो लोग नहीं मरते।

बुलेट के ट्रैक और टाइम को लेकर आलोचनाएं हो रही हैं। सरकार को चाहिए कि वह इन चिंताओं को अपनी सक्रियता से दूर करे। दरअसल, बुलेट ट्रेन के बहाने जो संबंध विकसित हो रहे हैं, वे अहम हैं। जापानी प्रधानमंत्री आबे ने इसे ‘‘भारत के लिए एशिया का कारखाना बनने का अवसर’ माना है। उनका मंतव्य भारत के सस्ते श्रम और जापानी तकनीक का कमाल दिखा कर अवसरों को एक साथ झटकना है। उनका साफ इशारा चीन से यह जगह छीनने का है। इसलिए ही बीजिंग ने आबे के आगमन से लेकर उनके भारत रहते जारी द्विपक्षीय संयुक्त घोषणा पत्र का हर्फ-हर्फ पढ़ा है, जिसमें देशीय रिश्ते को नियंतण्र बनाने का मंसूबा जताया गया है।

भारत-जापान ने पाकिस्तान को आतंकवाद समर्थक देश माना है और उत्तर कोरिया के परमाणु हथियारों के इस्तेमाल के उन्माद के पीछे पाकिस्तान और चीन की तकनीकी शह को जिम्मेदार माना है। हालांकि इसके पहले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पाकिस्तान में पल रहे आतंकी संगठनों की बात की गई थी, चीन के न चाहने के बावजूद इसमें भारत को रूस का भी समर्थन मिला था। अब जापान-भारत ने भी पाकिस्तान में पल रहे आतंकवादी संगठनों के उल्लेख के साथ उनसे मिल रही चुनौतियों से निबटने की बात कही है, जिसे विदेश सचिव जयशंकर ‘‘मूल्यवान’ मानते हुए उसे ‘‘क्रियान्वयन लायक विचार’ मानते हैं। यहां तक चीन को भारत-जापान से ज्यादा आपत्ति नहीं है। दरअसल, उसकी आपत्ति के मूल में एशिया में भारत के रूप में एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी खड़ा करने की जापान और अमेरिका की साझा रणनीति से है। दक्षिण चीन सागर में भारत के आवागमन पर तटीय देशों का समर्थन जुटाने, मालाबार में भारत-अमेरिका और जापान के संयुक्त सैन्याभ्यास से लेकर डोकलाम में चीन से बने ताजा गतिरोध में भारत का साथ देने के ऐलान के बाद बीजिंग कोई मुगालता नहीं रखना चाहता। यह सही है कि अमेरिका की एशिया के प्रति अस्थिर नीति और चीन के लगातार मजबूत होते जाने के बीच एशिया का शक्ति संतुलन डगमगाया है। ऐसे में जापान, जो अमेरिका का विश्वस्त देश है, संतुलन कायम करने के लिए भारत के साथ रहना चाहता है।

दक्षिण चीन सागर का नाम लिये बिना ही वहां संयुक्त राष्ट्र के नियमों के मुताबिक अबाध आवागमन का हवाला दिया गया है। फिर यह भी कि चीन की नियंतण्र महत्त्वाकांक्षा वाली ‘‘ओबोर’ परियोजना में शामिल होने वाले देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के मुताबिक वित्तीय लेन-देन की बात की गई है। पाकिस्तान और श्रीलंका के संभावित हश्र के मद्देनजर यह उल्लेखनीय तय है। घोषणा पत्र में ओबोर के विरु द्ध भारतीय नजरिये का समर्थन करते हुए एशिया-अफ्रीका के देशों को सड़क मार्ग से जोड़ने के समानांतर कार्यक्रमों को जारी रखने तथा भारत-प्रशांत क्षेत्रों तक सहभागिता निभाने के मुकम्मल इरादों ने भी चीन को चटका दिया है।जापान का उभय-उपयोगी यूएस2 विमान देने पर सहमति जताना बड़ी बात है। इससे भारत की नौसैनिक क्षमता में इजाफा होगा। भले ही चीन इसे दक्षिण चीन सागर से जोड़कर देखता हो।

इसी तरह, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में परिवहन के साधन विकसित करने में निवेश की जापानी इच्छा ने चीन को संशकित कर दिया है। यह उसके विरोध करने से जाहिर होता है। पूर्वोत्तर पर चीन की कड़ी नजर रहती है। इन क्षेत्रों में बेहतर कनेक्टिविटी बनाने की बात चीन को हजम नहीं होगी। वह भी ऐसे समय में जब भारत की सेना के प्रमुख डोकलाम के दोहराये जाने के खतरे को देखते हुए चौतरफा तैयारी पर जोर दे रहे हैं। तो कहने का आशय कि भारत-जापान की अंतरंगता के अनेक स्तरीय आयाम हैं, जिनमें अपनी जगह सुरक्षित करने से लेकर शक्ति को संतुलित रखने का जतन है। (RS)