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Saturday, October 28, 2017

नौकरशाही को बेजा संरक्षण Rajasthan

October 28, 2017 0
नौकरशाही को बेजा संरक्षण Rajasthan

नौकरशाही को बेजा संरक्षण
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राजस्थान में लोकसेवकों और न्यायाधीशों के खिलाफ परिवाद पर जांच से पहले अनुमति की अनिवार्यता वाला विवादित विधेयक विपक्ष, मीडिया और जनता के जबरदस्त विरोध के कारण पारित नहीं हो पाया। काले कानून की यह खिलाफत लोकतंत्र की रक्षा का सुखद संदेश है। इस विधेयक के प्रावधानों से असंतुष्ट विधायक घनश्याम तिवाड़ी और भाजपा को समर्थन दे रहे निर्दलीय विधायक माणकचंद सुराणा भी सत्ता पक्ष के विरुद्ध खड़े दिखाई दिए। लोकसेवकों के कथित हितों की रक्षा के बहाने भ्रष्ट नौकरशाही को सुरक्षा कवच देने वाले इस विधेयक पर राजस्थान उच्च न्यारयालय ने भी तल्ख टिप्पणी की। इस बाबत प्रस्तुत एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि ‘अब तो हद हो गई है कि सरकार इन ऐसे अफसरों को बचाने के लिए अध्यादेश तक ला रही है।’ अदालत की यह टिप्पणी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार की सामंती सोच की निर्लज्जता पर कुठाराघात है। इस अध्यादेश के प्रावधानों में प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी बाधित करने के अलोकतांत्रिक उपाय किए गए थे, यहां तक कि सोशल मीडिया पर भी आम-आदमी अपनी तकलीफ बयान नहीं कर सकता था। अब चयन समिति इसके प्रारूप पर पुनर्विचार करेगी।

अब तक किसी भी भारतीय नागरिक को निजी इस्तगासा के मार्फत अपने ऊपर हुए अत्याचार या किसी लोकसेवक द्वारा बरते गए कदाचरण को संज्ञान में लाने का अधिकार है। किसी नौकरशाह द्वारा बरते गए गलत आचरण की शिकायत जब थाना में नहीं सुनी जाती तो पीड़ित व्यक्ति निजी इस्तगासा दायर कर अपने हक में कानूनी लड़ाई लड़ सकता है। किंतु विधेयक के माध्यम से वसुंधरा राजे सिंधिया सरकार ऐसे लोगों के मुंह सिल देना चाहती हैं, जो भ्रष्ट नौकरशाहों के विरुद्ध कानूनी लड़ाई लड़ने को आमादा रहते हैं। इस संशोधन विधेयक के जरिए आईपीसी की धारा 228 में 228 बी जोड़कर प्रावधान किया गया है कि सीआरपीसी की धारा 156 और धारा 190 सी के विपरीत कार्य किया गया तो दो साल का कारावास और जुर्माने की सजा दी जा सकती है। न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट व लोकसेवक के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति मिलने से पहले उनका नाम एवं अन्य जानकारी का प्रकाशन व प्रसारण भी नहीं किया जा सकेगा। हालांकि न्यायपालिका को शक के दायरे में लाने से पहले उच्च न्यायालय की मंजूरी आवश्यक है। लोकसेवकों, यानी कार्यपालिका को तो इनकी आड़ में जोड़कर उनके भ्रष्ट आचरण को सुरक्षा प्रदान की जा रही थी। यह उपाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस नारे की भावना का भी उल्लंघन है, जिसमें वे 56 इंची सीना तानकर कहते रहे हैं कि ‘न खाऊंगा  और न ही खाने दूंगा।’ भ्रष्टाचार से मुक्ति देश की राष्ट्रीय आकांक्षा है। देश की तमाम लोक-कल्याणकारी योजनाएं केवल भ्रष्ट नौकरशाही के कारण नाकाम हो जाती हैं। इसके बावजूद राजस्थान सरकार द्वारा भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारियों को सरंक्षण देने के ऐसे उपाय करना जिससे आरोपितों के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मिलने तक कोई कार्यवाही न हो तो सरकार मंशा पर भी सवाल उठना लाजिमी है। दरअसल वर्तमान राज्य सरकारों के नेतृत्वकर्ता धन उगाही, गाहे-बगाहे नौकरशाही के माध्यम से ही कर रहे हैं। यह उगाही राजनीतिक चंदे के लिए की जा रही हो अथवा निजी वित्तपोषण के लिए, नौकरशाही एक माध्यम बनकर पेश आ रही है। इसीलिए खासतौर से देश में जिन-जिन प्रदेशों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, वहां-वहां नौकरशाही निरंकुशता के चरम पर है। राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकारों में तो इसी सांठगांठ के चलते नौकरशाही बेलगाम है। महाराष्ट्र सरकार ने इस आशय का कानून दो साल पहले ही पारित किया है। इसमें अभियोजन स्वीकृति की अवधि तीन माह है, जबकि राजस्थान में इसे बढ़ाकर छह माह कर दिया गया है।1सरकार की यदि मंशा ईमानदारी होती तो उसे जरूरत तो यह थी कि वह सीआरपीसी की धारा 197 में संशोधन का प्रावधान लाती। इसकी ओट में भ्रष्ट अधिकारी मुकदमे से बचे रहते हैं। इसीलिए इसे हटाने की मांग लंबे समय से चल रही है। इस धारा के तहत यदि कोई लोक सेवक पद पर रहते हुए कोई कदाचरण करता है तो उस पर मामला चलाने के लिए केंद्र सरकार से और राज्य लोक सेवा का अधिकारी है तो राज्य सरकार से मंजूरी लेना जरूरी है।

राजस्थान सरकार ने इस धारा को विलोपित करने की मांग उठाने की बजाय, इसे ताकत देने का काम कर दिया था। क्योंकि संशोधिक विधेयक पारित हो जाता तो फिर मीडिया भी तत्काल भ्रष्टाचारियों से संबंधित समाचारों के प्रकाशन व प्रसारण के अधिकार से वंचित हो जाता। साफ है, यह विधेयक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विरुद्ध था, लिहाजा लोकतंत्र की मूल भावना को आघात पहुंचाने वाला था। यह इसलिए भी असंवैधानिक था, क्योंकि अधिकारी से संबंधित शिकायत पर जांच करने या न करने के अधिकार सत्तारूढ़ दल के पास सुरक्षित थे। अब वह सत्तारूढ़ दल उस नौकरशाह के खिलाफ जांच के आदेश कैसे दे
सकता है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्तारूढ़ दल के हित साधने में लगा हो? जाहिर है, सरकार भ्रष्टाचार को संस्थागत करने के प्रावधान को कानूनी रूप देने की कुटिल मंशा पाले हुए थी।

फिलहाल मीडिया को शिकायत के आधार पर अथवा गोपनीय रूप से गड़बड़ी के सरकारी दस्तावेजों के आधार पर ही खबर छापने एवं प्रसारित करने का हक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत था। इस अध्यादेश को यदि विधेयक के रूप में स्वीकृति मिल जाती तो शिकायत हमेशा के लिए ठंडे बस्ते के हवाले कर दी जाती। इस लिहाज से यह विधेयक राजस्थान सरकार का भ्रष्टाचार को सरंक्षण देने की बेहद निर्लज्ज व निरकुंश कोशिश थी। निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति उत्तरदायी है। उसे प्रत्येक पांच साल में मतदाता के समक्ष खरा उतरने की चुनौती पेश आती है, लेकिन प्रशासन का न कोई समयबद्ध कार्यकाल है और न ही उनकी जवाबदेही जनता के प्रति और न ही कर्तव्य के प्रति सुनिश्चित है। राज्य सरकार को चाहिए था कि वह प्रशासनिक सुधार की पहल करती।

कैसे दोगुनी हो किसानों की आय (अमरनाथ त्रिपाठी)

October 28, 2017 0
कैसे दोगुनी हो किसानों की आय
(अमरनाथ त्रिपाठी)

वर्तमान केंद्र सरकार वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए प्रयासरत है। प्रारंभ में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके बारे में जिक्र किया तो लोगों को समझ में नहीं आया कि वह किस तरह आय बढ़ाने की बात कर रहे हैं? जैसे कृषि से आय या कृषि और गैर कृषि से कुल आय, नाममात्र आय या वास्तविक आय-किस प्रकार की आय को सरकार दोगुना करना चाहती है। इस असमंजस को नीति आयोग ने अपने एक नीति पत्र द्वारा दूर किया है जिसके अनुसार सरकार वास्तविक आय और कृषि से प्राप्त आय को दोगुना करने की बात कर रही है। इसे अशोक दलवई की अध्यक्षता में बनी समिति भी सत्यापित कर रही है।

बहरहाल कृषि से होने वाली आय को बढ़ाने के लिए उत्पादन को बढ़ाना होगा और कृषि लागत में कमी लानी होगी। उत्पादन में वृद्धि बोये गए क्षेत्र में वृद्धि और उत्पादकता में वृद्धि से प्राप्त होती है। हालांकि बोये गए कुल क्षेत्र को एक सीमा से ज्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता। इसके साथ यह भी ध्यान देना होगा कि जोत के आकार में लगातार कमी हो रही है। इस कमी का मुख्य कारण परिवारों में होने वाले बंटवारे हैं। 1995-96 में जहां औसत जोत का आकार 1.41 हेक्टेयर था वहीं यह घटकर 2010-11 में 1.15 हेक्टेयर हो गया। 85 प्रतिशत जोतों के आकार 2 हेक्टेयर से कम हैं। अर्थात इतने प्रतिशत जोत सीमांत और लघु जोत के श्रेणी में आते हैं। अनुकूलतम आकार से जोत के आकार कम होने से उत्पादकता में वृद्धि पैमाने की असमानता की वजह से नहीं लाई जा सकती इसलिए कृषि को लाभप्रद बनाए रखने के लिए जोतों के कम होते आकार पर विशेष ध्यान देना होगा और इसे रोकने के प्रयास करने होंगे। सामूहिक कृषि से इसका हल निकल सकता है। भूमि पट्टे पर देना भी इस लिहाज से कारगर हो सकता है। वर्तमान केंद्र सरकार ने इस क्षेत्र में एक कदम उठाया है और मॉडल अधिनियम 2016 लागू किया है।

उत्पादकता को बढ़ाने के लिए उत्तम प्रकार के बीज जैसे हाइब्रिड बीज आदि का उपयोग बढ़ाना होगा। दूसरी तरफ उत्पादन-दक्षता को भी सुधारना होगा, क्योंकि वर्तमान में उत्पादन-दक्षता अधिकांश उपजों की कम है जिस कारण वास्तविक उत्पादन संभावित उत्पादन से काफी कम रहता है। मिट्टी परीक्षण कराकर परीक्षण-परिणाम के अनुसार उर्वरक और अन्य पोषक तत्वों का उपयोग करने से उत्पादकता और उत्पादन-दक्षता दोनों में ही वृद्धि होगी। मोदी सरकार ने मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन के नाम से इस क्षेत्र में एक योजना शुरू की है जिसके तहत किसानों के खेतों की मिट्टी का परीक्षण करके उन्हें मृदा स्वास्थ्य कार्ड मुहैया कराया जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 9.9 करोड़ किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराया जा चुका है। 2017 के अंत तक और 13 करोड़ किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड प्रदान करने का लक्ष्य रखा गया है। इस लक्ष्य को अभी तक 76 प्रतिशत ही हासिल किया जा सका है और 24 प्रतिशत सिर्फ ढाई महीने में हासिल करने की चुनौती है। हाल ही में एक अध्ययन के दौरान उत्तर प्रदेश राच्य के फिरोजाबाद जिले के परतापुर गांव में किसानों से बातचीत करने पर यह पता चला कि वहां किसी भी किसान की मिट्टी का परीक्षण नहीं हुआ है। इससे यह प्रतीत होता है कि मृदा परीक्षण के काम में तेजी लानी होगी।

कृषि लागत का एक बड़ा हिस्सा मजदूरों और सिंचाई पर खर्च होता है। मजदूरी पर होने वाले खर्चे को मशीनीकरण को बढ़ावा देकर कम किया जा सकता है। चूंकि अधिकांश किसान संसाधनहीन लघु और सीमांत किसान हैं इसलिए कस्टम हायरिंग सेंटर जैसी योजना अधिक कारगर साबित हो सकती है। इस योजना का एक और लाभ है कि कुछ नवयुवकों को रोजगार भी प्राप्त होगा। सिंचाई पर होने वाले खर्च में कमी तब तक नहीं हो सकेगी जब तक हम इसके तरीके में बदलाव नहीं लाएंगे और भू-पृष्ठ जल और भूजल का संयुक्त उपयोग नहीं करेंगे। साथ ही साथ जल संचयन को भी बढ़ावा देना होगा। जहां सिंचाई के लिए किसानों की निर्भरता भूजल पर बढ़ती जा रही है वहीं भूजल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है। जिससे पानी को भूगर्भ से बाहर लाने में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ रही है। इस प्रकार किसानों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है और वातावरण पर भी दुष्प्रभाव पड़ रहा है।

किसान किसी प्रकार यदि उपज पैदा कर भी लेते हैं तो उन्हें उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता है। हाल ही में कुछ राच्य सरकारों ने कृषि ऋण को माफ करने की घोषणा की है, लेकिन किसानों से बात करने पर यह पता चलता है कि वे ऋण माफी की जगह अपने उत्पाद के उचित मूल्य प्राप्त करने को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। उचित मूल्य न मिलने का एक बहुत बड़ा कारण अधिक उत्पादन भी है। जैसे इस वर्ष उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए आलू बोझ बन गया है। अधिक पैदावार के कारण किसानों को शीतगृह में आलू रखने के खर्चे को भी निकाल पाना कठिन हो गया है। किसानों को उचित मूल्य दिलाने के लिए ज्यादातर सरकारी खरीद योजना ही उपयोग में लाई जाती है, जबकि इससे बेहतर होगा कि स्थानीय स्तर पर खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को बढ़ावा दिया जाय। इससे गैर-कृषि रोजगार के अवसर भी उपलब्ध होंगे। इसके साथ-साथ मानकीकरण और श्रेणीकरण को भी बढ़ावा देना पड़ेगा जिससे खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को अपनी जरूरत के अनुसार उपज प्राप्त हो जाए।

उपरोक्त उपायों से किसानों की आय को बढ़ाया जा सकता है। इन उपायों को ईमानदारी और मिशन के तरीके से लागू करने के लिए राच्य सरकारों की प्रबल इच्छाशक्ति और कुशल नौकरशाही की आवश्यकता है। जनधन योजना इन दोनों के समन्वयन का एक उचित उदाहरण है। कुछ उसी प्रकार से कृषि आय बढ़ाने वाले इन उपायों को भी लागू करने की आवश्यकता है।(आभार सहित दैनिक जागरण )
(लेखक आर्थिक विकास संस्थान में प्राध्यापक सदस्य हैं)

शिक्षा को बेहतर बनाएगी मातृभाषा (एम वेंकैया नायडू)

October 28, 2017 0
शिक्षा को बेहतर बनाएगी मातृभाषा

(एम वेंकैया नायडू)

शिक्षा को बेहतर बनाएगी मातृभाषा

(एम वेंकैया नायडू)

भाषा समाज की आत्मा और मानवीय अस्तित्व को एक सूत्र में पिरोने वाला धागा है। वह चिरकाल से ही विचारों और वों की अभिव्यक्ति का माध्यम रही है। शब्द मानवता के विश्व-दर्शन को निर्धारित करते हैं। हम शब्दों को उन विचारों से अलग नहीं कर सकते जिन्हें हम दूसरों तक पहुंचाना चाहते हैं। शायद इसीलिए भारत के सुविख्यात महाकवि कालिदास ने अपनी कालजयी काव्यकृति ‘रघुवंशम’ का आरंभ ही भगवान शिव और माता पार्वती से उन्हें शब्द और उनके अर्थ समझने की शक्ति प्रदान करने के निवेदन से जुड़ी स्तुति के साथ किया है-
‘वागर्थविवा संप्रक्तौ, वागर्थ प्रतिपत्तये’1जगत: पितरौ वंदे, पार्वती परमेश्वरौ’

यहां कवि ने वाक और अर्थ का संदर्भ अटूट रिश्ते के रूप में दिया है। भारतीय संस्कृति में वाक परंपरा वाग्देवी सरस्वती के प्रतीक के रूप में सदियों से विद्यमान है। देवी ललिता के हजारों नामों में से उनका एक नाम भाषा रूपा’ भी है। स्पष्ट है कि हमारे समाज का निर्माण इसी मान्यता के आधार पर ही हुआ है कि भाषा हमारी संस्कृति की प्राणवायु है, जो सभ्यता को आकार देती है। किसी संस्कृति की संपन्नता का अहसास उसके शब्दकोश, व्याकरण और एक-दूसरे से गुंथे हुए शब्दों से होता है जो न केवल सूचनाओं का संप्रेषण करते हैं, बल्कि मानवीय विचारों और भावों के समूचे संसार को भी व्यक्त करते हैं। समय के साथ भाषाएं और समृद्ध होती जाती हैं और शब्दकोश में और शब्द जुड़ते जाते हैं। जब वक्ताओं को नए अनुभवों के बारे में बताना पड़ता है तो यह बेहद जरूरी हो जाता है।
जीवन के साथ बंधी भाषा की डोर उतनी ही दिलचस्प है जितना रोचक खुद मानवता का इतिहास है। चूंकि हम अपने दैनिक जीवन में वस्तुओं, स्थानों, व्यक्तियों, भावों और घटनाओं को परिषित एवं श्रेणीबद्ध करने की जुगत में रहते हैं तो इस दौरान भाषा हमारी जीवन यात्रा  को प्रतिबिंबिंत करती है। यह हमें हमारे इर्द-गिर्द घट रही घटनाओं से रूबरू कराने और दूसरों को उससे परिचित कराने में मददगार होती है। नए अनुभव नए व उत्पन्न करते हैं। जैसे ही हमारा विश्व दर्शन परिवर्तित होता है तो षा उन परिवर्तनों से एकाकार कराने का प्रयास करती है। आखिर एक दशक पहले तक किसने कल्पना की होगी कि हमारा सामना ‘स्टार्टअप’ ‘उद्यमिता’ ‘इंटरनेट सर्फिग’ या ट्विटर जैसे शब्दों से भी होगा? दरअसल भाषा हमारे आसपास के जीवन की वास्तविकताओं और सांस्कृतिक परिवेश को प्रतिध्वनित करती है। यही वजह है कि कुछ विशेष भाषाओं में कुछ खास शब्द इतने अनोखे होते हैं कि किसी अन्य भाषा में उनका अनुवाद करना लगभग असंभव होता है। इसमें संस्कृत भाषा के ‘धर्म’ जैसे शब्द का ही उदाहरण लें जिसके व्यापक अर्थ और गहराई की किसी अन्य भाषा में थाह लेना बेहद मुश्किल है। इस प्रकार भाषा किसी व्यक्ति की सामूहिक चेतना और संस्कृति की द्योतक है।

आधुनिक भारतीय भाषाओं की यात्रा बड़ी समृद्ध रही है। एक अध्ययन के अनुसार भारत में करीब 780 भाषाओं का अस्तित्व है और 839 भाषाओं वाले पापुआ न्यू गिनी के बाद यह दुनिया में सबसे अधिक भाषाओं के वजूद वाला देश है। हमारी एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है जहां कवियों, उपन्यासकारों, संगीतकारों और कला की विभिन्न विधाओं के महारथियों ने चतुराई और कुशलता से सभी भाषाओं का उदार हृदय से उपयोग किया। हमने अन्य भाषाओं से भी शब्द आत्मसात कर अपनी भाषाओं को और समृद्ध बनाया है। हमें सभी भाषाओं को प्रोत्साहित करने के लिए निरंतर प्रयास करने चाहिए और नई रचनाओं को बढ़ावा देने के लिए विख्यात साहित्यिक हस्तियों को भी इससे जोड़ना चाहिए।

हालांकि इस परिप्रेक्ष्य में देश का मौजूदा परिदृश्य कुछ चिंतित करने वाला है। इसके लिए पर्याप्त प्रयास नहीं किए जा रहे कि बच्चे स्कूली शिक्षा के दौरान किसी एक विषय में पूरी तरह पारंगत हो जाएं। हालिया सर्वेक्षण दर्शाते हैं कि बच्चे शिक्षा तो हासिल कर रहे हैं, लेकिन उनकी शैक्षणिक क्षमताएं बेहद कमजोर हैं। इससे उच्च अध्ययन के लिए बुनियाद कमजोर हो जाती है। हमें इस स्थिति का निदान तलाशना ही चाहिए। तमाम बच्चे विशेषकर आदिवासी इलाकों के छात्र स्कूल जाने से कन्नी काट रहे हैं, क्योंकि उन्हें उस भाषा में नहीं पढ़ाया जा रहा जो भाषा वे अपने घर पर बोलते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि भाषा अवरोध भी हो सकती है। हम ऐसी व्यावहारिक नीति अपना सकते हैं जहां स्कूल के शुरुआती स्तर पर मातृषाभा पढ़ाई जाए और बाद में दूसरी भाषाओं को अपनाया जाए। लचर बुनियादी शैक्षणिक कौशल के दम पर ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था का निर्माण बड़ी चुनौती होगी। हमें विश्वविद्यालयों को ऐसे पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा जिनमें शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर शैक्षणिक एवं भाषाई कौशल को निखारने पर विशेष ध्यान दिया जाए।

अध्ययन दर्शाते हैं कि अगर बच्चों को उनकी मातृषाभा में पढ़ाया जाए तो सबसे बेहतर नतीजे हासिल होते हैं। जापान, स्वीडन, चीन और फ्रांस जैसे तमाम देशों में न केवल स्कूली, बल्कि उच्च शिक्षा भी मातृषाभा में मिलती है। अंतरराष्ट्रीय मातृषाभा दिवस के अवसर पर इस साल 21 फरवरी को दिए अपने संदेश में यूनेस्को के महानिदेशक ने अध्ययन के माध्यम के रूप में मातृषाभा के महत्व को स्पष्ट रूप से इन शब्दों में रेखांकित किया था, ‘अध्ययन, आत्मसम्मान और स्वाभिमान का स्तर सुधारने में मातृषाभा में शिक्षा प्रदान करना बेहद आवश्यक है जो विकास के सबसे प्रमुख पहलुओं में शुमार है।’ आज दुनिया एक छोटे गांव में सिमट गई है और तमाम भाषाओं की प्रासंगिकता बनी रहेगी। ऐसे में विचारों के आदान-प्रदान में अध्ययन की विधा के रूप में भाषा, साहित्य और अनुवाद के साथ सांस्कृतिक अध्ययन अपरिहार्य हो गए हैं। हमें ऐसे अच्छे शोध की दरकार है जिनका लक्ष्य उत्कृष्ट समालोचना, ऐतिहासिक, सैद्धांतिक और सृजनात्मक विद्वता की हमारी परंपरा को सशक्त बनाने के साथ ही उसे और सक्षम बनाना हो। हमें भाषा और साहित्य में अनुप्रयुक्त शोध पद्धतियों और आधारभूत अवधारणाओं की सोच भी विकसित करनी होगी। शोध और भाषाई अध्ययन एवं अध्यापन के साथ जुड़ी सामाजिक चुनौतियों के बीच सेतु भी बनाना होगा।

डॉ. अंबेडकर का दृढ़ विश्वास था कि हम बेहतर शिक्षा के दम पर अपने देश की तकदीर बदल सकते हैं। हर कोई उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने की स्थिति में नहीं है। वर्तमान में विश्वविद्यालय लचीली व्यवस्था के माध्यम से अधिक से अधिक छात्रों के लिए उच्च शिक्षा के द्वार खोल रहे हैं जैसे महिलाओं या कामकाजी लोगों के लिए अलग से सत्र संचालित किए जाते हैं। उनके पाठ्यक्रमों को भी व्यक्ति की जरूरत के मुताबिक प्रासंगिक बनाने के साथ ही उनके तौर-तरीकों को भी रुचिकर एवं सहगिता और संवाद आधारित बनाना होगा। इसमें पाठ्यक्रम की गुणवत्ता और प्रासंगिकता सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगी। इस शिक्षा अभियान को संभव बनाने के लिए विश्वविद्यालय तकनीक का भी हरसंभव उपयोग कर रहे हैं। विश्वविद्यालयों को निरंतर नवीनता-नवाचार की दिशा में काम करते रहना चाहिए और इस बात के उपाय तलाशने चाहिए कि अपने राज्य के और उससे इतर छात्रों को उनकी पसंदीदा षाभा में कैसे पढ़ा सकें।(आभार सहित दैनिक जागरण )
(लेखक भारत के उप-राष्ट्रपति हैं)

अति न्यायिक सक्रियता का उपचार (डॉ. एके वर्मा)

October 28, 2017 0
अति न्यायिक सक्रियता का उपचार

(डॉ. एके वर्मा)

अति न्यायिक सक्रियता का उपचार

(डॉ. एके वर्मा)

दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में दीपावली पर प्रदूषण रोकने के लिए पटाखों की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को लेकर तरह-तरह के तर्क-वितर्क हैं। लोकतंत्र में कोई अंतिम सत्य नहीं होता, फिर भी राजनीतिक फलक पर जनता का बहुमत और संवैधानिक फलक पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को स्वीकार करने की बाध्यता होती है। पटाखों की बिक्री पर रोक वाले फैसले के पीछे एक नेक इरादा खता है, लेकिन इसका एक आर्थिक पहलू भी है। दिल्ली-एनसीआर के जिन तमाम व्यापारियों ने एक माह पहले सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में संशोधन के बाद उन्हें खरीदा उनके नुकसान की भरपाई कौन करेगा? क्या दीपावली के बाद पटाखों की बिक्री में ढील देने से इस नुकसान की भरपाई हो जाएगी? ऐसा फैसला ल्ली-एनसीआर के लिए ही क्यों? पूरे देश में यह प्रतिबंध क्यों नहीं? क्या और शहरों में प्रदूषण की समस्या नहीं? एक सवाल यह भी है कि क्या सामाजिक सरोकारों और सामाजिक-समूहों के सरोकारों में कोई संतुलन नहीं हो सकता? सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने यह मूल सवाल भी खड़ा किया है कि क्या संविधान न्यायपालिका को अपनी शक्तियों का विस्तार करने की इजाजत देता है?

हमारे संविधान निर्माताओं ने अमेरिका की तरह न्यायिक-सर्वोच्चता और ब्रिटेन की तरह संसदीय-सर्वोच्चता का सिद्धांत स्वीकार नहीं किया था। उन्होंने व्यवस्थापिका और न्यायपालिका में संतुलन बनाया था, लेकिन काफी समय से सर्वोच्च न्यायालय ने इस संतुलन को दरकिनार कर न्यायिक सर्वोच्चता की स्थापना कर दी है। 1973 में केशवानंद भारती मुकदमे में शीर्ष न्यायालय ने संविधान के मूल-ढांचे का सिद्धांत प्रतिपात किया था। इसके अनुसार संसद या मंत्रिमंडल के किसी निर्णय को वह न केवल इस आधार पर निरस्त कर देगा कि वह संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध है, वरन इस आधार पर भी कि वह संविधान के मूल-ढांचे के अनुकूल नहीं है। यह ध्यान रहे कि सर्वोच्च न्यायालय ने मूल-ढांचे को परिभाषित नहीं किया है। यह एक ऐसी तलवार है जो अदृश्य है और जो संसद या सरकार के किसी भी निर्णय पर ‘न्यायिक ट्रंप कार्ड’ की भी तरह है। 1980 में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिला हिंगोरानी ने बिहार की जेलों में बंद असंख्य कैयों की रिहाई के लिए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।

हुसैनआरा खातून बनाम गृह सचिव बिहार नाम वाले इस मुकदमें में न्यायमूर्ति पीएन भगवती की खंडपीठ ने 40000 कैयों की रिहाई के आदेश ए। जस्टिस भगवती ने अनु 39अ के अंतर्गत मुफ्त न्यायिक मदद को सार्थक करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक ‘जनहित याचिका अनुभाग’ की स्थापना की। तबसे व्यक्तियों, गैर-सरकारी संस्थाओं और सामाजिक समूहों की ओर से जनहित याचिकाओं की बाढ़ सी आ गई है। बीते 37 वर्षो में कई ‘प्रोफेशनल जनहित याचिकावादी’ प्रकट हो गए हैं।

भारत जैसे बड़े देश में असंख्य समस्याएं हैं और विधानमंडलों एवं सरकारों की अकर्मण्यता तथा उपेक्षा के चलते नागरिकों की असंख्य गंभीर समस्याएं अनुत्तरित हैं। जनता को न्यायपालिका की सक्रियता अपनी समस्याओं का एकमात्र निदान लगती है। अनेक न्यायाधीश भी सामाजिक संवेदनशीलता के चलते जनहित याचिकाओं की उपेक्षा नहीं कर पाते, लेकिन इससे न्यायालय का मूल काम बाधित होता है। ऐसे में जरूरत इसकी है कि जनहित याचिकाओं से निपटने के लिए न्यायपालिका अमेरिकी पैटर्न पर किसी जूरी सिस्टम का सूत्रपात करे जिससे सामाजिक सरोकारों से जुड़े मसलों को जनता के सहयोग से निपटाया जा सके।

सर्वोच्च न्यायालय ने जब से मानव अधिकारों को भी मौलिक अधिकारों में शरीक करना शुरू किया है तबसे उसका कार्यक्षेत्र अत्यंत विस्तृत हो गया है, क्योंकि अनेक नए-नए अधिकार मौलिक अधिकारों की परिधि में आ गए हैं।
हर छोटे-बड़े मामले को सुलझाने की प्रवृत्ति से एक सवाल यह भी उठ रहा है कि संविधान ने सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए जो सीमांकन किया था क्या सर्वोच्च अदालत उसे समाप्त करना चाहती है? संविधान के अनु 32 में सर्वोच्च न्यायालय को केवल मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए ‘रिट’ (अनुदेश) जारी करने का अधिकार था।

अनु 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालयों को ‘रिट’ जारी करने का अधिकार न केवल मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए वरन ‘अन्य किसी भी उद्देश्य’ के लिए प्रदान किया गया था। उद्देश्य यह था कि सर्वोच्च न्यायालय काम के बोझ से बहुत दबा होगा, क्योंकि उस पर सभी राज्यों के उच्च न्यायालयों से आने वाली अपीलों और पूरे देश की जनता के मौलिक अधिकारों को लागू कराने का दायित्व होगा। इसके अलावा केंद्र-राज्य या दो राज्यों के बीच विवाद वाले कुछ ऐसे मुकदमे होंगे जो केवल सर्वोच्च न्यायालय में ही लाए जा सकते हैं।

उच्च न्यायालयों में अनु 226 के अंतर्गत जनहित याचिकाओं का निस्तारण तो उचित है पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी उन सभी मुकदमों की सुनवाई करना जो ‘अन्य किसी भी उद्देश्य’ के अंतर्गत आते हैं कितना उचित और संवैधानिक है? अमेरिकी संविधान में ‘कानून की उचित प्रक्रिया’ द्वारा वहां का सर्वोच्च न्यायालय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है, जबकि भारत में अनु 21 द्वारा न्यायालय ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के अनुरूप ही ऐसा कर सकता है।

अमेरिकी न्यायालय किसी कानून या आदेश को न केवल संविधान के प्रावधानों के आधार पर जांचता है वरन अच्छे-बुरे होने का भी निर्णय लेता है जबकि भारतीय न्यायपालिका संविधान के प्रावधानों के अनुसार ही निर्णय देने का अधिकारी था, लेकिन उसने इसे विस्तार दे या है। वह ‘संविधान के मूल ढांचे’ के आधार पर किसी भी कानून या आदेश को निरस्त कर सकता है। यह न्यायालय द्वारा स्वयं को ‘न्यायिक वीटो’ देने जैसा है जिसकी कल्पना संविधान बनाने वालों ने कभी नहीं की थी।

सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक नियुक्तियों का भी अधिकार कार्यपालिका से लगभग छीन सा लिया है। यह कहने में हर्ज नहीं कि शीर्ष न्यायपालिका द्वारा अपने संवैधानिक अधिकारों का विस्तार कर काम के बोझ को बढ़ा लिया गया है। अमेरिका में भी 1803 में मारबरी बनाम मेडिसन मुकदमें में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अधिकारों को बढ़ा लिया था। अन्य देशों में भी यही प्रवृत्ति है। 2007 में न्यायमूर्ति मर्केंडेय  काटजू ने हुए कहा था, न्यायाधीशों को अपनी लक्ष्मण रेखा खींचनी चाहिए और सरकार चलाने का प्रयास नहीं करना चाहिए..। पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आनंद भी यह कह चुके हैं कि न्यायाधीशों को न्यायिक दुस्साहस से बचना चाहिए और कानून की सीमाओं की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय को सुनिश्चितत करना होगा कि कैसे जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग को रोका जाए, कैसे अपने बोझ को कम किया जाए और कैसे उन मुकदमों पर ज्यादा ध्यान या जाए जो वास्तव में काबिले गौर हैं। इसके साथ ही उसे कुछ ऐसा भी करना होगा कि सरकार के तीनों अंगों में पारस्परिक सम्मान बना रहे।(DJ)
(लेखक सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ सोसायटी फॉर पॉलिटिक्स के निदेशक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)