Sunday, September 10, 2017

Gmail keyboard shortcuts

September 10, 2017 0
Gmail keyboard shortcuts

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10 September 2017(Sunday)

September 10, 2017 0
10 September 2017(Sunday)

दैनिक समसामयिकी

1.आम लोगों के लिए राहत अमीरों पर बढ़ा बोझ

• वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद विभिन्न वस्तुओं पर जीएसटी की दरों में विसंगतियों को दूर करते हुए जीएसटी काउंसिल ने अमीरों की कारों पर सेस की दर बढ़ाने और आम लोगों के इस्तेमाल की करीब ढाई दर्जन चीजों पर टैक्स में कमी करने का फैसला किया है।
• काउंसिल के इस कदम के बाद अब मझोली, बड़ी और एसयूवी कारें महंगी हो जाएंगी। वहीं साड़ियों के फॉल, मिट्टी की मूर्तियां, झाड़ू, प्लास्टिक के रेनकोट, रबर बैंड और धूपबत्ती जैसी कई वस्तुएं सस्ती हो जाएंगी। काउंसिल ने केंद्रीय खादी ग्रामोद्योग आयोग (केवीआइसी) द्वारा बेचे जाने वाले खादी उत्पादों पर जीएसटी से रियायत दे दी है। हालांकि दूसरे दुकानदारों पर बिकने वाले खादी उत्पादों पर पूर्ववत पांच फीसद टैक्स लगेगा।
• जीएसटी काउंसिल ने 20 इंच वाले कंप्यूटर मॉनिटर पर भी जीएसटी की दर घटाने का फैसला किया। इससे कंप्यूटर सस्ते होंगे। काउंसिल ने कंबल और किचन गैस लाइटर जैसे उत्पादों पर भी जीएसटी की दर घटाई। हाथ से बने देशी म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट्स पर जीएसटी निल होगा।
• वस्तु एवं सेवा कर लागू करने के लिए इस्तेमाल हो रहे सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र जीएसटी नेटवर्क में खामियों को देखते हुए काउंसिल ने जीएसटी रिटर्न दाखिल करने की समय सीमा में ढील देने का भी फैसला किया है। कारोबारी अब जुलाई का रिटर्न (जीएसटीआर-1) दस अक्टूबर तक दाखिल कर सकेंगे।
• केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में यहां हुई काउंसिल की 21वीं बैठक में ये अहम निर्णय लिए गए।
• बैठक में शामिल राज्यों के वित्त मंत्रियों ने जीएसटी नेटवर्क के पोर्टल में तकनीकी खामियों के चलते कारोबारियों को हो रही परेशानी का मुद्दा भी उठाया जिसके बाद काउंसिल ने इस मुद्दे के हल के लिए मंत्रियों का एक समूह बनाने का फैसला किया। जेटली का कहना है कि यह मंत्रिसमूह नियमित रूप से जीएसटीएन के साथ संपर्क में रहेगा और अगले दो-तीन दिनों में समूह का गठन कर दिया जाएगा।
• काउंसिल ने सबसे अहम निर्णय लक्जरी कारों पर सेस की दर बढ़ाने का लिया है। मिड सेगमेंट की कारों पर सेस की दर में 2 प्रतिशत, लार्ज कारों पर सेस में 5 प्रतिशत और एसयूवी पर सेस में 7 प्रतिशत की वृद्धि करने का निर्णय किया है। इन कारों पर 28 फीसद जीएसटी के साथ 15 फीसद सेस पहले से ही लगता है।
• काउंसिल के इस फैसले के बाद मिड सेगमेंट की कारों पर अब जीएसटी व सेस मिलाकर 45 प्रतिशत, बड़ी कारों पर 48 प्रतिशत और एसयूवी पर 50 प्रतिशत हो जाएगा। हालांकि आम लोगों के इस्तेमाल वाली छोटी कारों (पेट्रोल की 1200 सीसी और डीजल की 1500 सीसी) पर सेस की दर में कोई बदलाव नहीं किया गया है।
•  इसी तरह 13 सीटर वाहनों और हाइब्रिड कारों पर भी जीएसटी व सेस की वर्तमान दर ही बरकरार रखी है। दरअसल सरकार को अमीरों की कारों पर टैक्स का बोझ बढ़ाने की जरूरत इसलिए पड़ी है क्योंकि जीएसटी लागू होने के बाद इन कारों के दाम दो लाख रुपये तक कम हो गए थे।
• सरकार ने 30 अगस्त को जीएसटी क्षतिपूर्ति कानून में संशोधन के लिए एक अध्यादेश के मसौदे को मंजूरी देकर सेस की अधिकतम दर 15 से बढ़ाकर 25 प्रतिशत करने का निर्णय किया।
• काउंसिल ने जीएसटी नेटवर्क में तकनीकी खामियों को देखते हुए रिटर्न दाखिल करने की समय सीमा बढ़ाने का भी फैसला किया है।

2. भारत-चीन बनाएंगे विशेष कार्य समूह
• भारत और चीन निर्यात बढ़ाने के लिए उद्योग आधारित विशेष कार्य समूह बनाने पर सहमत हुए हैं। वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु ने शनिवार को इसकी जानकारी दी। दोनों देशों के बीच इस पहल को चीन के साथ भारत के व्यापार घाटे को कम करने की पहल के तौर पर देखा जा रहा है। 
• प्रभु अभी पांचवें पूर्वी एशिया सम्मेलन में आर्थिक मंत्रियों की बैठक में भाग लेने फिलीपींस गए हुए हैं। वह क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसीईपी) के 16 सदस्य देशों के व्यापार मंत्रियों की बैठक में भी भाग लेंगे। सम्मेलन से इतर प्रभु ने अपने चीनी समकक्ष झोंग शान से मुलाकात की और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की।
• हाल ही में वाणिज्य मंत्रलय संभालने वाले प्रभु ने इस मौके पर जापान के अर्थव्यवस्था, व्यापार एवं उद्योग मंत्री हिरोशिगे सेको और दक्षिण कोरिया के व्यापार मंत्री ह्युन चोंग किम से भी मुलाकात की। इस बीच, वाणिज्य मंत्रलय ने एक के बाद एक ट्वीट कर यह जानकारी दी कि सुरेश प्रभु ने चीन के उद्यमियों और उद्योगों को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित किया और उन्हें विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) में निवेश के लिए सुविधा देने की पेशकश की है।
• बता दें कि चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा वित्त वर्ष 2015-16 के 52.69 अरब डॉलर (करीब 3,369 अरब रुपये) से मामूली कम होकर वित्त वर्ष 2016-17 में 51.08 अरब डॉलर (करीब 3,266 अरब रुपये) रहा है। भारत आइटी और फार्मा उत्पादों से जुड़े वस्तु एवं सेवा क्षेत्र में चीनी बाजार में बड़ी दखल चाहता है। भारत ने चीन से निवेश बढ़ाने पर भी जोर दिया है।

3. चीन ने थपथपाई पाक की पीठ, बढ़ाएगा सहयोग

• चीन और पाकिस्तान 50 अरब अमेरिकी डॉलर (3.18 लाख करोड़ रुपये) वाले आर्थिक गलियारे को लेकर सुरक्षा और आतंकरोधी सहयोग बढ़ाने पर सहमत हो गए हैं। इस गलियारे से दोनों ही देशों के अशांत क्षेत्र रेल और सड़क परियोजनाओं के नेटवर्क से जुड़ते हैं।
• चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) चीन के उत्तर पश्चिम में शिनजियांग प्रांत और पाकिस्तान के दक्षिण पश्चिम में ग्वादर बंदरगाह को जोड़ता है। इस क्षेत्र को आतंकियों से चुनौती मिलती रही है। मालूम हो कि यह इलाका पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से होकर गुजरता है। इसलिए भारत की इस परियोजना पर हमेशा से आपत्ति रही है।
• सीपीईसी की सुरक्षा को लेकर सहमति चीनी कम्युनिस्ट पार्टी सेंट्रल कमेटी के कमीशन फॉर पॉलिटिकल एंड लीगल अफेयर्स के प्रमुख मेंग जियांझु, पाकिस्तानी विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार नासिर खान की मुलाकात के बाद बनी।
• पाकिस्तान ने सीपीईसी से जुड़ी परियोजनाओं पर काम कर रहे चीनी नागरिकों की सुरक्षा के लिए सेना व अर्धसैनिक बलों के 15 हजार जवान तैनात किए हैं। बीते वर्ष चीन से करीब 71 हजार लोग पाकिस्तान गए थे। मेंग ने पाकिस्तान को अच्छा मित्र बताया और आतंकवाद से लड़ने के लिए पाकिस्तान के प्रयासों की तारीफ की।
• पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने कहा कि चीन के साथ अच्छे संबंध पाकिस्तानी विदेश नीति की नींव है। वहीं चीन के स्टेट काउंसलर यांग जीची ने भी पाकिस्तान की पीठ ठोंकी और कहा कि दोनों देशों के बीच की सदाबहार रणनीतिक साझेदारी बढ़ती रहेगी।

एक गंभीर समस्या की अनदेखी (राजकिशोर)

September 10, 2017 0
एक गंभीर समस्या की अनदेखी

(राजकिशोर)

इस समय चीन की जनसंख्या एक अरब 66 करोड़ है और भारत की जनसंख्या है एक अरब 36 करोड़। अनुमान किया जाता है कि 2050 तक भारत की जनसंख्या चीन से ज्यादा हो जाएगी। उस समय तक भारत में 1.66 अरब लोग रह रहे होंगे और चीन में 1.33 अरब। जाहिर है, अब इस अनुमान में कुछ फर्क आ जाएगा, क्योंकि चीन ने एक संतान की नीति को छोड़ देने का फैसला किया है। चीन की सरकार का कहना है कि एक संतान नीति से चीन में अधेड़ लोगों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी थी, जबकि हमें युवा लोगों की ज्यादा जरूरत है। कहने की जरूरत नहीं कि चीन की जनसंख्या नीति में इस करवट से चीन की आबादी में बढ़ोतरी की रफ्तार को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन उसे विश्वास है कि युवा जनसंख्या में वृद्धि से इतनी भरपाई हो जाएगी कि चीन की जनता का जीवन स्तर न गिरे।

भारत की जनसंख्या वृद्धि की दर में क्रमश: कमी आ रही है। इसके वावजूद, मैं नहीं समझता कि 2050 में भारत की जनसंख्या चीन से कम होने वाली है। क्योंकि चीन के पास एक जनसंख्या नीति है और हमारे पास कोई जनसंख्या नीति नहीं है। हमारे पास जनसंख्या नीति क्यों नहीं है? क्योंकि हम अपनी प्राय: सभी नीतियों में पश्चिम यूरोप और अमेरिका की नीतियों का अनुकरण करते हैं। इन अंचलों में जनसंख्या नीति की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि वहां की आबादी न बढ़ रही है और न घट रही है। बल्कि घट ही रही है, जिसकी क्षति पूर्ति एशिया और अफ्रीका से आव्रजन से हो जा रही है। वहां की समस्या यह होने वाली है कि उनकी जनसंख्या का सांस्कृतिक स्वरूप बदल रहा है और एक दिन ऐसा आ सकता है जब जर्मनी में गैर-जर्मन और फ्रांस में गैर-फ्रेंच लोगी की संख्या बढ़ जाए।

भारत में कुछ लोगों का ख्याल है कि वह समय बहुत दूर नहीं है जब मुसलमानों की आबादी हिंदुओं से ज्यादा हो जाएगी। इसी अंदेशे से कई बार हिंदुओं को प्रेरणा दी जाती है कि वे ज्यादा बच्चे पैदा करें, लेकिन अभी तक इस अंदेशे का कोई तार्किक आधार सामने नहीं आया है। प्रमाण बल्कि उलटे हैं। मगर पश्चिमी देशों के लिए यह समस्या वास्तविक है, क्योंकि वहां स्थानीय आबादी स्थिर है या कम हो रही है तथा बाहर से आने वालों की संख्या बढ़ रही है। स्पष्टत: जनसंख्या का मामला व्यक्तिगत नहीं है कि कौन कितने बच्चे पैदा करना चाहता है। इसका संबंध राष्ट्रीय संसाधनों से भी है। दूसरे महायुद्ध के बाद सोवियत संघ में ज्यादा बच्चे पैदा करो का अभियान चलाया गया था और जो स्त्री जितने ज्यादा बच्चे पैदा करती थी, उसका उतना ही सम्मान किया जाता है। ऐसी माताओं को पुरस्कृत भी किया जाता था, ताकि संतान वृद्धि की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिल सके। अब इस क्षेत्र से सरकार ने अपने आप को वापस कर लिया है, क्योंकि जनसंख्या में एक संतुलन आ गया है, लेकिन चीन को लग रहा है कि एक संतान की नीति के कारण वहां की जनसंख्या में उम्रगत असंतुलन आ गया है, इसलिए अभी भी उसकी एक जनसंख्या नीति है।

मगर भारत? भारत ने जनसंख्या समस्या के बारे में यह नीति बना रखी है कि इस बारे में न कुछ सोचना है न कुछ करना है। 60 और 70 के दशक में परिवार नियोजन एक राष्ट्रीय नारा था। सरकारी कर्मचारी कोशिश करते थे कि लोग कम बच्चे पैदा करें। इन कोशिशों में स्त्रियों की नसबंदी का कार्यक्रम अब भी चल रहा है, लेकिन परिवार नियोजन का कार्यक्रम फेल हो जाने के बाद सरकार ने जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर विचार नहीं किया है, जबकि हम देख रहे हैं कि जनसंख्या के दबाव से हमारी समस्त सार्वजनिक सेवाएं चरमरा रही है। अन्न, पानी, बिजली, शिक्षा, निवास, चिकित्सा कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं है जहां जनसंख्या का दबाव महसूस न किया जा रहा हो।

यह बात हम सभी अनुभव करते हैं और आपसी बातचीत में इसकी चर्चा भी करते हैं। फिर भी, राजनीतिक दलों में इस भयंकर समस्या की कोई चेतना नहीं है। प्रधानमंत्री तक इस मामले में कोई चिंता व्यक्त नहीं करते। इसका क्या कारण हो सकता है? बल्कि कुछ दिनों में उलटी प्रवृत्ति दिखाई पड़ सकती है। यादव नेता चिंता करेंगे कि यादवों की आबादी कम न हो जाए, कुर्मी या दलित नेता अपने-अपने जनाधार को, अपने जाति-समुदाय की संख्या के बल पर, बढ़ाने की जरूरत समङोंगे। लाभ में रहेंगी कथित उच्च जातियां, जिन्होंने समय के तकाजे को समझा है और एक या दो संतान तक अपने को सीमित कर रखा है। भारत की आबादी 1947 में 30 करोड़ के आसपास थी। अगर हमने उसी बिंदु पर आबादी को नियंत्रित करने का सोचा होता, तो आज देश में दुख-दारिद्रय कहीं देखने को भी नहीं मिलता।

यह सवाल वाजिब है कि भारत का राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग टिक-टिक कर रहे जनसंख्या बम की ओर से इतना उदासीन क्यों है। कारण उसकी आर्थिक नीतियों में छिपा हुआ है। सिर्फ बोर्ड लगाने या प्रचार करने से जनसंख्या कम नहीं हो सकती। जनसंख्या कम करने के दो ही तरीके हो सकते हैं या तो तानाशाही, जिसमें व्यक्तिगत विकल्प नहीं रह जाते या संपूर्ण लोकतंत्र, जिसका मतलब है विकास में सब की भागीदारी। चीन ने पहला रास्ता चुना, क्योंकि उसके पास समय कम था। पश्चिमी देशों में जनसंख्या का नियंत्रण आर्थिक विकास और उसमें सामान्य जन की भागीदारी से हुआ। जैसे-जैसे आम जनता का मध्यवर्गीकरण होता गया, लोग स्वभावत: कम बच्चे पैदा करने लगे। नई प्रवृत्ति बच्चे न पैदा करने की है, जिसे हम उपभोक्तावाद की इंतिहा कह सकते हैं। एकल अभिभावकों के कारण भी जनसंख्या घटेगी, लेकिन हम न तो अच्छे तानाशाह हैं न अच्छे लोकतांत्रिक।

चीन की तरह तानाशाही के रास्ते से हम भी जनसंख्या की समस्या को सुलझा सकते थे। पर तानाशाही हमें गवारा नहीं है। यह बहुत अच्छा है, क्योंकि चीन की तरह बनना भारत का लक्ष्य नहीं हो सकता। पर लोकतंत्र भी हमें गवारा नहीं है, हम नहीं चाहते कि विकास का फायदा सभी को हो। मध्यवर्गीकरण की विफलता ही हमारा वास्तविक विफलता है जिसे गरीबी की समस्या के रूप में पेश किया जाता है। शायद अभी भी समय है। अगर हम अपनी आर्थिक नीतियों में रेडिकल परिवर्तन के लिए तैयार हो जाएं तो जनसंख्या की वृद्धि रुक सकती है, जिसका नतीजा होगा और तेजी से आर्थिक विकास, लेकिन भारत के मध्य वर्ग को भय है कि साधारण लोग उनकी पांत में बड़ी संख्या में घुस न आएं। क्या यह जाति प्रथा का असर है?(DJ)
(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)