Saturday, October 28, 2017

स्वच्छ भारत में निहित है स्वस्थ भारत

स्वच्छ भारत में निहित है स्वस्थ भारत

(डॉ. यास्मीन अली हक)

खुले में शौच भारत की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है। आज भी लाखों भारतीय खुले में शौच करते हैं। यह समस्या बच्चों के जीवित रहने और विकसित होने के अधिकार को बाधित करती है। इसका बुरा असर देश के जीडीपी में पड़ता है। खुले में शौच कई बीमारियों का कारण बनती है। इनमें डायरिया प्रमुख है। यह खुले में शौच के कारण ही फैलता है और एक अनुमान के अनुसार वह भारत में हर घंटे में पांच वर्ष से कम उम्र के कम से कम 13 बच्चों की जान ले लेता है। खुले में शौच के कारण होने वाले नुकसान को देखते हुए 2014 में केंद्र की सत्ता में आने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2019 तक देश को खुले में शौच से मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया। शायद ही कोई मंच होगा जहां से उन्होंने देश के लोगों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने के लिए दो शब्द नहीं बोले होंगे। अपनी इस मुहिम में उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों की कई हस्तियों को जोड़ा है। एक आवश्यक लक्ष्य निर्धारित कर जनता और निजी क्षेत्र के सहयोग से स्वच्छ भारत मिशन एक जन आंदोलन का रूप लेता दिख रहा है। जैसे-जैसे समय बीत रहा है, लोग इस आंदोलन से आपने आप जुड़ते चले जा रहे हैं। यह कहने में कोई ङिाझक नहीं कि तीन साल पहले तक देश में स्वच्छता के प्रति ऐसा माहौल नहीं दिखाई पड़ता था जैसा आज दिखने लगा है। कई सर्वे में यह बात सामने आ चुकी है कि अब आम जनता भी यह मानने लगी है कि स्वच्छ भारत अभियान के बाद उनके आप-पास अब ज्यादा साफ-सफाई नजर आने लगी है। खुले में शौच जैसी समस्या के निवावरण के लिए जरूरी जन जागरण में पारंपरिक और धार्मिक नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे नेतृत्व की सक्रिय होने से आम लोगों के मन मस्तिष्क पर खासा प्रभाव पड़ता है। शायद इसी का नतीजा है कि हाल के वर्षो में भारत ने खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) गांवों के निर्माण में पहले से कहीं ज्यादा बढ़ोतरी दर्ज की है। वर्तमान में छह लाख 30 हजार गांवों में से 39 प्रतिशत गांव खुले में शौच से मुक्त घोषित हो चुके हैं।1भारत के बच्चों के लिए स्वस्थ और स्वच्छ वातावरण बनाने के लिए यूनिसेफ और बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन, टाटा ट्रस्ट, यूएसएड, वाटरएड, वल्र्ड बैंक, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज सहित कई अन्य संस्थाएं स्वच्छ भारत अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। हालांकि बावजूद इसके अभी भी एक बड़ी चुनौती कायम है। यूनिसेफ के नजरिये से हमें बच्चों के लिए टिकाऊ परिणामों पर ध्यान देने की जरूरत है। विशेष रूप से बेहतर स्वच्छता प्रथाएं, शौचालयों का उपयोग और साबुन से हाथ धोने जैसे पहलू। यह भारत जैसे देश के लिए एक जटिल मुद्दा है, क्योंकि यहां खुले में शौच की आदत कई लोगों में गहरे जड़ें जमा चुकी हैं। एक तरह से यह उनके मूल स्वभाव का हिस्सा बन गई है। इसलिए हमें शौचालय का इस्तेमाल करने की आदत अपनाने के लिए लोगों से संवाद करने और उन्हें इसके लिए तैयार करने के लिए नए तौर-तरीकों पर ध्यान देना चाहिए।1आम लोगों को खुले में शौच से होने वाले नुकसान से परिचित कराकर और इससे संबंधित सामाजिक आंदोलन को बढ़ावा देकर वांछित लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति में प्रत्येक घर में शौचालय के निर्माण के साथ-साथ लोगों को उनके इस्तेमाल के प्रति भी जागरूक करना होगा, क्योंकि यह देखने में आ रहा है कि कुछ जगहों पर शौचालयों का निर्माण हो गया है, लेकिन उनका इस्तेमाल नहीं हो रहा है। इस लक्ष्य को पाने के लिए परिवर्तन कारकों के रूप में बच्चों की भूमिका महत्वपूर्ण है। बच्चे किसी भी देश का भविष्य होते हैं और इसीलिए वे देश की भावी पीढ़ी माने जाते हैं। यदि बचपन में ही उनमें स्वच्छता के प्रति आग्रह के भाव पैदा कर दिए जाएं तो बड़े होने पर वे एक सजग नागरिक की भूमिका बखूबी अदा कर सकते हैं। वैसे भी मनोवैज्ञानिक रूप से बच्चों के दिमाग में कोई बात बैठाना वयस्कों और बुजुर्गो के मुकाबले कहीं अधिक आसान होता है। बच्चे स्वच्छ भारत अभियान के जरिये परिवर्तन के दूत बन सकते हैं।1भारत में अभी भी कुछ राज्य ऐसे हैं जहां खुले में शौच की समस्या काफी गंभीर है। सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण स्थितियों वाले 15 राज्यों और उनके करीब 150 जिलों पर ध्यान केंद्रित करने की अपनी वर्तमान प्रतिबद्धता को यूनिसेफ ने बढ़ाने का फैसला किया है। यूनिसेफ सरकारी नीतियों और मानव व्यवहार, दोनों की सूचना जुटाने और उनका विश्लेषण करने के लिए उपयोगी अनुसंधान कार्य कर रहा है। 1हाल में यूनिसेफ के एक अध्ययन में पाया गया कि खुले में शौच से मुक्त वातावरण में आर्थिक लाभ भी निहित है। खुले में शौच का चलन समाप्त होने वाले इलाकों में बीमारियों का प्रकोप कम होता है। इसके कारण लोग बीमारिरयों की चपेट में आने से बचते हैं और इस तरह उस पैसे की बचत करने में सक्षम होते हैं जो उन्हें बीमारियों के इलाज में करनी पड़ती है। आने वाले समय में हमारा ध्यान मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों के साथ-साथ शहरी झुग्गियों, सूखा और बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में रहने वालों सहित वंचित परिवारों और उनके बच्चों पर होगा। हमारा मानना है कि यह एक न्यायसंगत और कारगर तरीका है। आबादी के सबसे गरीब वर्ग के साथ कार्य करने से पूरे समाज को लाभ मिलता है। यह महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा में सुधार भी करता है जो कि किसी भी देश के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए जरूरी है।1प्रत्येक बच्चे यानी हर लड़की और हर लड़के को, विशेष रूप से सबसे अधिक वंचित क्षेत्रों के, जीवन जीने का उचित मौका देने की प्रतिबद्धता इस दृढ़ विश्वास पर निर्मित हुई है कि यह सिद्धांत के साथ-साथ व्यवहार में भी सही है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि स्वच्छ भारत आंदोलन में समानता भी निहित है। खुले में शौच से मुक्ति का अभियान स्वस्थ भारत के निर्माण में सतत योगदान देने वाला भी है।(DJ)
(लेखक भारत में यूनिसेफ की प्रतिनिधि हैं)

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