Thursday, September 14, 2017

दैनिक समसामयिकी 14 Sep 2017(Thursday)

September 14, 2017 0
दैनिक समसामयिकी 

14 Sep 2017(Thursday)

1.डोकलाम में मुंह की खाने के बाद नेपाल में बढ़ाई चीन ने दिलचस्पी

• नेपाल का चीन की तरफ लगातार बढ़ रहा झु्काव आने वाला समय में भारत के लिए बड़ी चिंता का सबब बन सकता है। अपने देश में आधारभूत ढांचे के लिए नेपाल की चीन के प्रति बढ़ रही दिलचस्पी सामरिक तौर पर भारत के लिए एक बड़ा खतरा साबित हो सकती है।
• देखा जाए तो चालाक ड्रैगन पाक की तर्ज पर ही अपना नेटवर्क नेपाल में फैलाने की रणनीति पर चल रहा है। पिछले दिनों नेपाल के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री कृष्ण बहादुर महारा के चीन दौरे में पेइचिंग ने जो अति उत्साह दिखाया है वह न केवल भारत को चिढ़ाने के लिए है बल्कि चीन की उसी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह दक्षिण एशिया में भारत को चौतरफा घेरना चाहता है।
• उल्लेखनीय है कि वन वेल्ट वन रोड ( ओबीओआर) से नेपाल को जोड़कर चीन ने अपने इरादों का संकेत दे दिया है। नेपाल के विदेश मंत्री की इस यात्रा के दौराना दोनो देशों के बीच जो समझौते हुए हैं वह कूटनयिक दृष्टि से भारत के लिए शुभ संकेत नहीं हैं।
• आधारभूत ढांचे के विकास के नाम पर दोनो देशों के बीच बढ़ रही कनेक्टविटी चीन के इरादों का संकेत देने के लिए काफी है। नेपाल चीन की सहायता से अपने यहां इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना चाहता है। चीन सड़क, रेल और संचार के क्षेत्र में नेपाल की मदद करने को तैयार है। नेपाली विदेश मंत्री छह दिन तक वहीं रहेगें। दोनो देशों के बीच इसके अलावा ऊर्जा और पर्यटन के विकास के लिए भी समझौता हुआ है।
• विशेषज्ञों के अनुसार चीन सामरिक दृष्टि से ही नहीं अपितु आर्थिक निवेश के हिसाब से भी भारत का विकल्प खोज रहा है। उसकी नजर अपने बाजार की पूर्व में पैठ बढ़ाने की है।
• अभी डोकलाम विवाद खत्म हुये ज्यादा दिन नहीं हुये हैं ऐसे में नेपाल में बढ़ती चीन की दिलचस्पी ने भारतीय विशेषज्ञों के माथे पर चिंता की सलवटें डाल दी हैं।

2. बुलेट ट्रेन की तरफ बढ़ा देश :प्रधानमंत्री मोदी जापानी पीएम शिंजो आबे के साथ आज रखेंगे आधारशिला

• राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की कर्मस्थली साबरमती बृहस्पतिवार को एक बार फिर इतिहास बनने जा रही है। यही से देश को पहली बुलेट ट्रेन की सौगात मिलने वाली है। इस ऐतिहासिक क्षण को यादगार बनाने के लिए अहमदाबाद शहर को दुल्हन की तरह सजाया गया है।
• प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन परियोजना की आधारशिला रखकर दोस्ती की मिसाल कायम करेंगे। हालांकि बुलेट ट्रेन परियोजना के शिलान्यास कार्यक्रम को गुजरात विधानसभा चुनाव के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
• इसका लाभ चुनाव मिलने की उम्मीद की जा रही है।दरअसल देश में बुलेट ट्रेन को लाने के लिए पूरी तैयारी हो चुकी है। चाहे परियोजना की प्लानिंग हो या फाइनेंसिंग। बस इसे धरातल पर लाने का आगाज बाक़ी है। बुलेट ट्रेन परियोजना की आधारशिला रखे जाने के साथ ही निर्माण की शुरुआत हो जाएगी। इस परियोजना के लिए वित्तीय क़रार पहले ही हो चुका है।
• मुंबई-अहमदाबाद बुलेट रेल परियोजना एक लाख 8 हज़ार करोड़ रुपये की है। साबरमती रेलवे स्टेशन के स्टेडियम में होने कार्यक्रम के ऐतिहासिक मौक़े को मोदी अपने अंदाज में यादगार बनाने मे कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते है।
• जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आठ किलोमीटर का रोड शो चुनाव के लिए जनता के बीच मजबूत संदेश लेकर जाएगा। अवसर भले ही बुलेट का हो लेकिन यह बैलेट का काम करेगा।

3. ग्लोबल ह्यूमन कैपिटल इंडेक्स में भारत को 103वां स्थान

• वर्ल्ड  इकोनॉमिक फोरम के ग्लोबल ह्यूमन कैपिटल इंडेक्स (वैश्विक मानव पूंजी सूचकांक) में 130 देशों की लिस्ट में भारत 103वें स्थान पर है। नॉर्वे इस लिस्ट में टॉप पर मौजूद है। दक्षिण एशिया के देशों में भारत, श्रीलंका और नेपाल से भी पीछे है, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश से आगे है। इंडेक्स में भारत के पिछड़ने की वजहें बताई गई हैं।
• ये इंडेक्स इस बात का संकेत होता है कि कौन-सा देश अपने लोगों के डेवलपमेंट, उनकी टीचिंग-ट्रेनिंग और टैलेंट के इस्तेमाल में कितना आगे है। न्यूज एजेंसी के मुताबिक जेनेवा के डब्ल्यूईएफ (वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम) की रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि इम्प्लॉयमेंट में जेंडर गैप के मामले में भी भारत दुनिया में सबसे पीछे है।
• हालांकि फ्यूचर के लिए जरूरी स्किल्स के डेवलपमेंट के मामले में भारत की स्थिति बेहतर है और इस मामले में 130 देशों के बीच इसकी रैंक 65 है।
• फोरम ने पिछले साल की अपनी रिपोर्ट में भारत को 105वीं रैंक दी थी और कहा था कि यह देश अपनी ह्यूमन कैपिटल की संभावनाओं का सिर्फ 57 फीसद ही इस्तेमाल कर पा रहा है।
• उस लिस्ट में फिनलैंड टॉप पर था। ह्यूमन कैपिटल इंडेक्स में भारत के पिछड़ने की कई वजहें बताई गई हैं। मसलन शिक्षा के क्षेत्र में

पिछड़ा होना और ह्यूमन कैपिटल का कम फैलाव होना।
• वर्ल्ड  इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक, भारत के इस लिस्ट में पीछे होने का कारण यहां उपलब्ध कौशल का बेहतर इस्तेमाल न हो पाना है।

4. बिना मतदान के ही सिंगापुर को मिली पहली महिला राष्ट्रपति

• सिंगापुर में देश की पहली महिला राष्ट्रपति बुधवार को चुन ली गई है लेकिन बिना मतदान के हुए इस निर्वाचन को अलोकतांत्रिक बताकर लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं।मुस्लिम मलय अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाली हलीमा याकूब संसद की पूर्व अध्यक्ष हैं। राष्ट्रपति पद पर चुने जाने के लिए उन्हें वास्तविक रूप से इस महीने होने वाले चुनाव का सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि प्रशासन ने इस पद पर खड़े होने के लिए उनके विरोधियों को अयोग्य करार दिया था।
• यहां पहली बार ऐसा नहीं हो रहा है कि सरकार ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को आयोग्य करार दिया है जिसके बाद चुनाव अनावश्यक हो गया है। यहां दशकों से एक ही पार्टी सत्ता में है।
• देश में पहले से ही चुनाव की प्रक्रि या को लेकर अशांति थी क्योंकि ऐसा पहली बार हो रहा था जब खास जातीय समूह मलय समुदाय के लिए राष्ट्रपति पद आरक्षित कर दिया गया था लेकिन बिना वोट के ही हलीमा के हाथ में सत्ता सौंपने के फैसले ने लोगों को गुस्सा और बढ़ा दिया।
• औपचारिक रूप से राष्ट्रपति बनने की घोषणा होने के बाद हिजाब पहनने वाली 63 वर्षीय हलीमा की आलोचना सोशल मीडिया पर हो रही है। एक फेसबुक यूजर पेट इंग ने लिखा, बिना चुनाव के निर्वाचित, क्या मजाक है।
• राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनने से पहले हलीमा सत्तारूढ़ एक्शन पार्टी से पिछले दो दशक से संसद सदस्य थी। हलीमा ने कहा, मैं सभी लोगों की राष्ट्रपति हूं। हालांकि चुनाव नहीं हुआ लेकिन आपकी सेवा करने की मेरी प्रतिबद्धा पहले जैसी ही है।

5. विमान हादसों से संबंधित राहत और बचाव नियमों में संशोधन

• सरकार ने विमान दुर्घटना की स्थिति में विमान और यात्रियों की खोज तथा राहत एवं बचाव कार्यो से संबंधित नागरिक उड्डयन नियमों में संशोधन किया है। इसके तहत अब खोज, राहत और बचाव केंद्रों के लिए अपने तकनीकी कर्मचारियों की संख्या एवं प्रशिक्षण का रिकॉर्ड रखना जरूरी होगा।
• भारत में विमान दुर्घटना की स्थिति में राहत और बचाव कार्यो के समन्वय की जिम्मेदारी केंद्रीय स्तर पर दो संगठनों- एयरपोर्ट अथारिटी और कोस्ट गार्ड के पास है। इसके अलावा राज्य सरकारें अपनी आपदा राहत मशीनरी को मौके पर उतारती हैं।
• भारत ने रीजनल एयर नेवीगेशन प्लान, इंटनेशनल सिविल एविएशन आर्गनाइजेशन (आइसीएओ), ग्लोबल सिविल एविएशन रूल्स तथा इंटरनेशनल मेरीटाइम आर्गनाइजेशन (आइएमओ) द्वारा तय नियम-कायदों के अनुसार अपने यहां खोज, राहत एवं बचाव का तंत्र विकसित किया है।
• भारत के हवाई और समुद्री क्षेत्र के भीतर होने वाली किसी भी विमान (चाहे विमान और उसके यात्री किसी भी देश के हों) के दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में खोज, राहत और बचाव अभियान चलाने की जिम्मेदारी भारत सरकार की होती है।
• इसका नियंत्रण विमानन सचिव की अध्यक्षता वाली नेशनल एरोनॉटिकल सर्च एंड रेस्क्यू कोआर्डिनेशन कमेटी तथा इंडियन कोस्ट गार्ड के महानिदेशक की अध्यक्षता वाले नेशनल मेरीटाइम एसएआर बोर्ड के हाथ में होता है। पिछले कुछ वर्षों में विमानों के अचानक आसमान से गायब होने या दुर्घटना के बाद लापता होने के कई मामले सामने आएहैं।
• इनमें मलेशियन एयरलाइंस के गायब होने का मामला प्रमुख है। जिस तरह विमान यातायात बढ़ रहा है और आतंक का साया मंडरा रहा है, उसे देखते हुए सभी देश विमानन राहत एवं बचाव तंत्र को मजबूत बना रहे हैं।

6. जीएसटीएन का जायजा लेगा मंत्रिसमूह

• जीएसटी के आइटी नेटवर्क जीएसटीएन में आ रही तकनीकी खामियों को हल करने के लिए बने मंत्रिसमूह की पहली बैठक 16 सितंबर को बेंगलुरु में होगी। बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी की अध्यक्षता वाले इस मंत्रिसमूह की बैठक में जीएसटीएन के उच्च अधिकारी प्रजेंटेशन देंगे और तकनीकी मुद्दों के बारे में मंत्रिसमूह को जानकारी देंगे।
• मोदी ने बताया कि मंत्रिसमूह की पहली बैठक में राजस्व सचिव हसमुख अढिया, जीएसटीएन के अध्यक्ष और सीईओ सहित शीर्ष अधिकारी शामिल होंगे। इसके अलावा जीएसटीएन पोर्टल के आइटी तंत्र का काम संभालने वाली सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी इन्फोसिस के पदाधिकारी भी मंत्रिसमूह के समक्ष आकर प्रजेंटेशन देंगे।
• इसके अलावा जीएसटीएन के नवनियुक्त चेयरमैन ए. बी. पांडेय और सीईओ प्रकाश कुमार भी जीएसटी लागू होने से अब तक जीएसटीएन पोर्टल की प्रगति और प्रदर्शन का ब्यौरा देंगे।
• बेंगलुरु देश का आइटी हब है और यही वजह है कि मंत्रिसमूह ने जीएसटीएन से जुड़ी समस्याओं का हल निकालने के लिए पहली बैठक वहां करने का फैसला किया है। मोदी ने कहा कि मंत्रिसमूह जीएसटीएन पोर्टल पर असेसीज को आ रही दिक्कत के साथ-साथ तकनीकी पहलुओं पर भी विचार विमर्श करेगा

और अब तक की प्रगति और प्रदर्शन का जायजा लेगा।
• उल्लेखनीय है कि एक जुलाई से देश में जीएसटी लागू होने के बाद कारोबारियों को जीएसटीएन पोर्टल पर पंजीकरण से लेकर रिटर्न दाखिल करने तक कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। यही वजह है कि नौ सितंबर को हैदराबाद में हुई जीएसटी काउंसिल की 21वीं बैठक में राज्यों के वित्त मंत्रियों ने जीएसटीएन पोर्टल में खामियों का मुद्दा उठाया।
• इसके बाद ही काउंसिल ने जीएसटीएन से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने के लिए मंत्रिसमूह का गठन करने का फैसला किया। काउंसिल ने यह मंत्रिसमूह गठित करने के लिए केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को अधिकृत किया। जेटली ने 12 सितंबर को बिहार के उप मुख्यमंत्री मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिसमूह का गठन करने का निर्णय किया है।
• छत्तीसगढ़ के वित्त मंत्री अमर अग्रवाल, कर्नाटक के कृषि मंत्री कृष्ण बी गौड़ा, केरल के वित्त मंत्री टी. एम. थॉमस आइजैक और तेलंगाना के वित्त मंत्री ई राजेन्द्र इस मंत्रिसमूह में बतौर सदस्य शामिल हैं। यह मंत्रिसमूह जीएसटीएन के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी के साथ मिलकर काम करेगा।

7. बिटक्वॉइन को लेकर सहज नहीं रिजर्व बैंक

• रिजर्व बैंक (आरबीआइ) बिटक्वॉइन जैसी गैर-कानूनी डिजिटल करेंसी को लेकर सहज नहीं है। आरबीआइ का एक समूह इन क्रिप्टोकरेंसी की कानूनी वैधता का मामला देख रहा है। रिजर्व बैंक के कार्यकारी निदेशक सुदर्शन सेन ने बुधवार को यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में दुनियाभर के कई नियामकों ने बिटक्वॉइन जैसी कई डिजिटल करेंसी को लेकर जांच-पड़ताल तेज की है। लिहाजा केंद्रीय बैंक भी इन्हें संदेह की नजर से देखता है। सुदर्शन यहां इंडिया फिनटेक डे कांफ्रेंस में बोल रहे थे।
• सेन के मुताबिक फिएट क्रिप्टोकरेंसी यानी कानूनी डिजिटल करेंसी वही हो सकती है, जिसे रिजर्व बैंक जारी करे। इसको लेकर तभी कोई उम्मीद का सवाल पैदा होगा, जब केंद्रीय बैंक ऐसी डिजिटल करेंसी जारी करना शुरू करेगा, जिसे आप ऑनलाइन स्पेस में इस्तेमाल कर सकें। उन्होंने कहा, ‘जहां तक गैर-व्यवस्थित क्रिप्टोकरेंसी का सवाल है, मुङो लगता है कि हम इसको लेकर सहज नहीं हैं।
• बिटक्वॉइन एक निजी क्रिप्टोकरेंसी है। इसलिए मनमानी आधार पर इसके मूल्य तय किए जाते हैं।’ कुछ दिन पहले इस करेंसी की कीमत 4,000 डॉलर (करीब ढाई लाख रुपये) से भी ऊपर चली गई थी।1आरबीआइ ने एक विशेषज्ञ समूह बना रखा है, जो इस मामले को देख रहा है। केंद्रीय बैंक ने ऐसी क्रिप्टोकरेंसी को लेकर पहले भी अपनी कोई योजना नहीं बताई। सेन ने भी कोई विस्तृत जानकारी नहीं दी कि इस मामले में विचार-विमर्श फिलहाल किस स्तर पर है।
• अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि डिजिटल करेंसी को लेकर रिजर्व बैंक सरकार को किस तरह की सिफारिशें करने वाला है। अलबत्ता चीन ने इसको लेकर सख्ती बरतनी शुरू कर दी है। इसकी वजह से बिटक्वॉइन की कीमत में गिरावट आई है।

8. भारत पेट्रोलियम को मिला 'महारत्न' कंपनी का दर्जा

• केंद्र सरकार ने भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) को 'महारत्न' कंपनी का दर्जा दे दिया है। इसे मिलाकर देश में अब आठ 'महारत्न' कंपनियां हो गई हैं।
• बीपीसीएल के सीएमडी डी राजकुमार ने बुधवार को कंपनी की एजीएम के बाद यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इससे कंपनी को सस्ती दर पर धन जुटाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा उसे ज्यादा वित्तीय स्वतंत्रता भी मिलेगी।
• मसलन बीपीसीएल के बोर्ड को किसी एक प्रोजेक्ट में 5,000 करोड़ रुपए तक के निवेश को मंजूरी देने का अधिकार होगा। पहले मिनीरत्न होने के कारण कंपनी प्रबंधन सिर्फ 1,000 करोड़ रु. तक के निवेश को मंजूरी दे सकता था।
• राजकुमार ने बताया कि बीपीसीएल पांच साल में कैपिटल एक्सपेंडिचर के रूप में 1.08 लाख करोड़ रुपए खर्च करेगी। इसका इस्तेमाल वह रिफाइनरियों की क्षमता विस्तार के साथ मार्केटिंग और अपस्ट्रीम गतिविधियों में करेगी।
• फिलहाल ये हैं आठ महारत्न' कंपनियां  -
• ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ओएनजीसी)
• गैस अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (गेल)
• स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल)
• कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल)
• नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन (एनटीपीसी)
• भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (बीएचईएल)
• इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल)
• भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल)

9. चकमा, हाजोंग को नहीं मिलेगा मूल निवासियों जैसा अधिकार

• केंद्र सरकार सभी चकमा और हाजोंग शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करेगी। लेकिन उन्हें पूवरेत्तर के मूल निवासियों जैसा अधिकार नहीं दिया जाएगा। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने बुधवार को यह जानकारी दी। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए चकमा और हाजोंग शरणार्थी अरुणाचल प्रदेश में रह रहे हैं।
• चकमा-हाजोंग शरणार्थी मुद्दे पर एक उच्चस्तरीय बैठक में चर्चा हुई। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह की ओर से बुलाई गई बैठक में अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू, केंद्रीय गृह राज्यमंत्री रिजिजू और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल एवं अन्य ने हिस्सा लिया।1एक घंटे तक चली बैठक के बाद रिजिजू ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के 2015 के आदेश का पालन करने के लिए बीच का रास्ता अपनाया जाएगा।
• शीर्ष अदालत ने चकमा-हाजोंग को नागरिकता प्रदान करने का आदेश दिया था। नागरिकता देने में स्थानीय लोगों के अधिकारों का घालमेल नहीं किया जाएगा। चकमा-हाजोंग समुदाय के लोग 1964 से अरुणाचल प्रदेश में हैं। उन्हें एसटी का दर्जा नहीं दिया जाएगा और मूल निवासियों के अधिकारों का घालमेल नहीं होगा।
• अरुणाचल प्रदेश में कई संगठन और नागरिक संगठन चकमा और हाजोंग को नागरिकता देने का विरोध कर रहे हैं। संगठनों का कहना है कि इससे राज्य की जनसंख्या में बदलाव आ जाएगा। एक अधिकारी ने कहा कि केंद्र सरकार एक मान्य समाधान तलाशने का प्रयास कर रही है।
• शरणार्थियों को अरुणाचल प्रदेश में अनुसूचित जनजाति को दिया गया भूमि मालिकाना अधिकार नहीं दिया जाएगा। हालांकि उन्हें इनर लाइन परमिट दिया जाएगा। अरुणाचल प्रदेश में गैर स्थानीय लोगों को यात्र और काम करने के लिए यह परमिट जरूरी है।

आठवीं अनुसूची की भाषायी राजनीति

September 14, 2017 0
आठवीं अनुसूची की भाषायी राजनीति

आठवीं अनुसूची की भाषायी राजनीति

(बुद्धिनाथ मिश्र, वरिष्ठ साहित्यकार और राजभाषा विशेषज्ञ )

आज सरकारी लोगों के लिए राजभाषा दिवस है, क्योंकि सन 1949 में इसी तारीख को संविधान सभा ने ‘संघ की राजभाषा’ संबंधी अनुच्छेद पारित किए थे। धार्मिक क्षेत्र में आज पितृपक्ष की मातृनवमी का श्राद्ध है। पितृपक्ष में   लोग पितरों का तर्पण उनकी मृत्यु की तिथि के अनुसार करते हैं। संयोग से, कल जीमूतवाहन पर्व था, जब माताएं इंद्र को प्रसन्न करने के लिए निर्जल उपवास रखती हैं। जीमूत मेघ का नाम है। इंद्र का वाहन मेघ भी है, इसलिए अतिवृष्टि और अनावृष्टि, दोनों स्थितियों में लोग इंद्र को प्रसन्न करते हैं। देखें, तो राजभाषा दिवस भी एक प्रकार से जीमूतवाहन पर्व ही है, जब सरकारी कार्यालयों के इंद्रों को प्रसन्न करने के लिए राजभाषा सजाई जाती है। सरकारी मदों से करोड़ों रुपये बड़े पुरस्कारों, स्मृति-चिह्नों आदि पर बहाए जाते हैं।

सरकारी कार्यालयों में राजभाषा का काम एक ऐसा महाभारत है, जिसमें पांडवों को कौरवों से निहत्था लड़ना है। पिछली आजादी ‘बिना खड्ग-बिना ढाल’ भले जीत ली गई हो, मगर भाषा की आजादी की लड़ाई जीतना उतना आसान नहीं। हमारी प्रारंभिक से उच्च शिक्षा तक आज भी अंग्रेजी की मुहताज है या बना दी गई है। बल्कि धीरे-धीरे पूरी शिक्षा-पद्धति अंग्रेजी के मकड़जाल में और फंसती जा रही है। गांव-गांव में इंग्लिश मीडियम में बच्चों को  पढ़ाने का चलन बढ़ा है। ‘स्कूल’ नाम को कलंकित करने वाली सुविधाविहीन उन झोपड़पट्टियों में ‘ए माने सेब, बी माने बैल, सी माने बिल्ली और डी माने कुत्ता’ पढ़ते-पढ़ाते सुना गया है। यह हुआ अंग्रेजी का भारतीयकरण!

यह विडंबना ही है कि प्रधानमंत्री भले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी में अपनी बात रखने में देश की शान समझते हों, मगर डिजिटल इंडिया हो या स्टार्टअप इंडिया, सरकार की सारी योजनाएं अंग्रेजी की ओर ही जा रही हैं, क्योंकि बिना अंग्रेजी जाने आम आदमी के लिए यह सब दूर की कौड़ी है। ‘डिजिटल इंडिया’ के फेर में फिर सारे काम अंग्रेजी में होने लगे हैं। जब संघ की राजभाषा हिंदी ही उपेक्षित है, तो अन्य भारतीय भाषाओं की स्थिति क्या होगी!

भारत सरकार के कार्यालयों, अनुसूचित बैंकों और सार्वजनिक उपक्रमों में हिंदी के कार्यान्वयन का दायित्व जिस गृह मंत्रालय का है, उसके राजभाषा विभाग के सारे अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर आते हैं। समझा जा सकता है कि खुद तदर्थ पद पर आसीन अधिकारी क्या स्थाई नीति बनाएंगे? राजभाषा का काम विशेषज्ञता की अपेक्षा करता है, इसीलिए पहले रामधारी सिंह दिनकर जैसे साहित्यकारों को इसका प्रधान पद सौंपा गया था और इस विभाग में जो भी रचनात्मक कार्य हुए, वे उसी दौरान हुए। इसी को ध्यान में रखते हुए संसदीय राजभाषा समिति ने राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय के शीर्ष पद पर पुन: किसी वरिष्ठ साहित्यकार-सह-राजभाषाविद् को नियुक्त करने की संस्तुति की थी, पर चतुर अधिकारियों ने वह संस्तुति ही गायब करा दी। बाद में संसदीय समिति को भी अपनी ही वे महत्वपूर्ण संस्तुतियां याद नहीं रहीं।

संविधान के अनुच्छेद 343 (1) में प्रावधान किया गया था कि (15 वर्ष बाद) देवनागरी में लिखित हिंदी संघ की राजभाषा होगी और शासकीय प्रयोजनों के लिए ‘भारतीय अंकों के अंतरराष्ट्रीय रूप’ का प्रयोग होगा। इसे अंग्रेजीदां ‘अरबिक’ और अरब के लोग ‘हिंदस:’ यानी भारत से आई अंक विद्या कहते हैं। स्वाधीनता संग्राम की माध्यम भाषा के रूप में हिंदी 1949 तक सारे देश की केंद्रीय भाषा तो बन गई थी, मगर प्रशासन की भाषा के रूप में उसे और विकसित होना था। इसलिए, संविधान के अनुच्छेद 351 में केंद्र सरकार को यह निर्देश दिया गया कि वह हिंदी का विकास इस तरह करे कि वह भारत की ‘सामासिक संस्कृति’ (कंपोजिट कल्चर) की अभिव्यक्ति का माध्यम बने। इसके लिए वह मुख्यत: संस्कृत से और गौणत: ‘आठवीं अनुसूची’ में उल्लिखित ‘राष्ट्रीय भाषाओं’ से शब्द ग्रहण करे।

पूरे संविधान में ‘आठवीं अनुसूची’ का संदर्भ केवल दो बार आया है। एक अनुच्छेद 351 में, जहां उसमें सम्मिलित भाषाओं से आवश्यकतानुसार पदावली, शैली आदि ग्रहण करने का निर्देश है। दूसरा संदर्भ अनुच्छेद 344 का है, जिसमें संविधान लागू होने के तत्काल बाद राजभाषा आयोग गठित करते समय आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भाषाओं के प्रतिनिधियों को भी शामिल करने का प्रावधान है, ताकि हिंदीतरभाषियों की कठिनाइयों का ध्यान रखा जा सके। मेरी समझ से ‘आठवीं अनुसूची’ तात्कालिक जरूरत थी, जिससे अन्य प्रमुख क्षेत्रीय भाषाओं के प्रतिनिधियों को यह अनुभव हो कि उनकी मातृभाषा को भी उचित सम्मान दिया जा रहा है। 1950 में जब संविधान लागू हुआ, तब आठवीं अनुसूची में 14 भाषाएं थीं, जो आज बढ़कर 22 हो गई हैं।

राजनीतिक तुष्टीकरण के कारण इस अनुसूची में ऐसी भाषाएं भी शामिल की गईं, जिनकी आबादी कुछ लाख मात्र हैं। परिणाम यह हुआ कि सरकारी संरक्षण पाने

के लिए दर्जनों लोकभाषाएं, जिनका प्रशासनिक भाषा के रूप में अनुभव नहीं है, आठवीं अनुसूची में घुसने की कोशिशें करने लगी हैं। यदि ऐसा हुआ, जो वोट की राजनीति में असंभव नहीं, तो यह प्रशासनिक कामों में भाषिक अराजकता पैदा करने वाला होगा। इसका लाभ अंग्रेजी को मिलेगा और हानि सभी भारतीय भाषाओं की होगी।

भारतीय संविधान में वर्णित उपरोक्त दो प्रयोजनों पर गौर किया जाए, तो स्पष्ट हो जाएगा कि आज के भारत में इस ‘आठवीं अनुसूची’ की जरूरत नहीं है, बल्कि इसको हटाकर सभी भारतीय भाषाओं के विकास के लिए नए सिरे से विचार किया जाए और अनुसूचित राष्ट्रीय भाषाओं को अब तक मिली सुविधाएं जारी रखते हुए हर अल्प विकसित भाषा को अपने विकास का समुचित अवसर दिया जाए। इसके लिए राजभाषा विशेषज्ञों की एक समिति बने और उसके निर्णयों को बिना किसी हस्तक्षेप के कार्यान्वित किया जाए। 40 वर्षों की राजभाषा सेवा के बाद मेरा निष्कर्ष है कि जिस भाषा का समाज राजनीतिक-आर्थिक दृष्टि से सबल नहीं है, वह आठवीं अनुसूची में शामिल होकर भी उपेक्षित ही है।

इस संबंध में दस साल पहले मैंने मनाली की एक राजभाषा संगोष्ठी में विस्तार से अपना अध्ययन निष्कर्ष रखा था, जिसे वहां उपस्थित डॉ नामवर सिंह जैसे विद्वानों, राजनेताओं व राजभाषा विशेषज्ञों ने समर्थन किया था। जनबल के दबाव में विभिन्न लोक भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने से बेहतर होगा कि आठवीं अनुसूची ही हटा दी जाए। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो पूरे देश में भाषाई आंदोलन उग्र होगा और देश को कमजोर बनाने वाले तत्वों के हाथ अनायास एक और घातक अस्त्र लग जाएगा।(साभार हिंदुस्तान )
(ये लेखक के अपने विचार हैं)