Tuesday, September 5, 2017

अरुणाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं

September 05, 2017 0
अरुणाचल प्रदेश एवं  जम्मू-कश्मीर सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं

अरुणाचल प्रदेश एवं  जम्मू-कश्मीर सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं

     केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा प्रकाशित मूल वर्ष 2011-12 के साथ सकल राज्य घरेलू उत्पाद आंकड़ें की एक नई श्रृंखला के मुताबिक, 2015-16 में जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश सबसे तेजी से उभरने वाली राज्य अर्थव्यवस्था थी।
      दोनों राज्यों ने एक ही वर्ष में प्रति व्यक्ति आय में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की।
     अरुणाचल प्रदेश के सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) ने 16.5 प्रतिशत और जम्मू-कश्मीर के सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) ने निरंतर 2011-12 के मूल्यों में 14.7 प्रतिशत की वृद्धि की।
      महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी राज्य अर्थव्यवस्था बनी हुई है, ₹ 16,59,776.05 करोड़ (₹ 16.6 लाख करोड़) के निरंतर 2011-12 के मूल्यों के साथ अनुमान लगाया गया है।
     दूसरी सबसे बड़ी राज्य अर्थव्यवस्था तमिलनाडु की है, जिसका अनुमान 9,48,673.85 करोड़ है।
     गुजरात ने उत्तर प्रदेश को पीछे करते हुए तीसरा स्थान हासिल किया, लेकिन दोनों के बीच का अंतर संकीर्ण था।

स्रोत- द हिन्दू बिजनेस लाइन

ट्रापीस्ट-1 ग्रहों पर पानी होने की संभावना है

September 05, 2017 0
ट्रापीस्ट-1 ग्रहों पर पानी होने की संभावना है

ट्रापीस्ट-1 ग्रहों पर पानी होने की संभावना है

    वैज्ञानिकों का कहना है कि अल्ट्राकोल ट्रैपर-1 डवार्फ सितारे की परिक्रमा करने वाले 40 प्रकाश-वर्ष की दूरी पर स्थित पृथ्वी के आकार के ग्रहों में पर्याप्त मात्रा में पानी हो सकता है और यह रहने योग्य हो सकते हैं।
     खगोलविदों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने नासा /ईएसए हबल स्पेस टेलीस्कॉप का अनुमान लगाया है कि ट्रैपिस्ट -1 ग्रहों की परिक्रमा करने वाले सात ग्रहों पर पानी हो सकता है या नहीं।
    परिणाम बताते हैं कि तंत्र के बाहरी ग्रह अभी भी पर्याप्त मात्रा में पानी प्रदान कर सकते हैं।
    फरवरी 2017 में, खगोलविदों ने पृथ्वी के आकार के सात ग्रहों की खोज की घोषणा की, जो अल्ट्राकोल डवार्फ स्टार ट्रैपस्ट -1 से 40 प्रकाश वर्ष की दूरी पर है।

स्रोत- द हिंदू

अंतरिक्ष यात्री पैगी व्हिटसन अंतरिक्ष में 665 दिन बिताने के बाद पृथ्वी पर लौट आई हैं

September 05, 2017 0
अंतरिक्ष यात्री पैगी व्हिटसन अंतरिक्ष में 665 दिन बिताने के बाद पृथ्वी पर लौट आई हैं

अंतरिक्ष यात्री पैगी व्हिटसन अंतरिक्ष में 665 दिन बिताने के बाद पृथ्वी पर लौट आई हैं

      अंतरिक्ष यात्री पेगी व्हिट्सन एक रिकॉर्ड-ब्रेकिंग फ्लाइट के साथ धरती पर लौट आई हैं, जिसने उन्हें यू.एस. अंतरिक्ष सहनशीलता के लिए सबसे पहला स्थान दिलाया।
     व्हिटसन का मिशन ग्रह पर 288 दिन का था। उन्होंने कुल 665 दिन अकेले ही दुनिया भर में किसी अन्य अमेरिकी एवं किसी और महिला की तुलना में अधिक दिन बिताए हैं।
      व्हाट्सन ने ऑर्बिट के दौरान कई अन्य रिकॉर्ड बनाए - 57 वर्ष की आयु में दुनिया की सबसे उम्रदराज अंतरिक्ष यात्री, और 10 के साथ सबसे अनुभवी महिला अंतरिक्ष यात्री।
    वह दो बार अंतरिक्ष स्टेशन को कमांड करने वाली पहली महिला भी बनीं।
    रूस के गेंनेडी पडल्का पांच उड़ानों के साथ पर अंतरिक्ष में 879 दिन बिताकर शीर्ष स्थान पर हैं।

स्रोत- द हिंदू

हमारे जीवन के 12 अज्ञात शिक्षक, जो हर पल हमें शिक्षा देते हैं

September 05, 2017 0
हमारे जीवन के 12 अज्ञात शिक्षक, जो हर पल हमें शिक्षा देते हैं

ये हैं हमारे जीवन के 12 अज्ञात शिक्षक, जो हर पल हमें शिक्षा देते हैं

मनुष्य चाहे तो अपने जीवन, रिश्तों, आस-पास हो रही घटनाओं, अनुभवों, पशु-पक्षियों किसी को भी शिक्षक मानकर उनसे हर पल कुछ कुछ शिक्षा ग्रहण कर सकता है। दैनिक भास्कर की नजर में हर मनुष्य के जीवन में ये 12 शिक्षक होते ही हैं, जिनसे वह कुछ कुछ सीखता है, लेकिन इस दृष्टि से कभी उसने इन्हें शिक्षक के रूप में देखा नहीं...

सबसे अचंभित करने वाला शिक्षक
समय: क्योंकि समय सबकुछ सिखा देता है।

अनंत शिक्षक
घटनाएं: क्योंकि ये अचानक ही आती हैं और जब भी आती हैं एक शिक्षा दे जाती हैं।

सबसे महंगा शिक्षक
संकट: क्योंकि यह महान शिक्षक है, किन्तु इसकी कीमत चुकाने के बाद फायदा बाद में मिलता है।

सबसे कठोर शिक्षक
अनुभव: क्योंकि पाठ पढ़ाने से पहले ही यह परिणाम दे देता है।

सबसे कोमल शिक्षक
बच्चा: क्योंकि जब आप उसके साथ रहते हैं तो आप उसकी तरह बोलने, सोचने व्यवहार करने लगते हैं।

सबसे धैर्यवान शिक्षक
किताबें: क्योंकि हम उन्हें कभी पूरा तो कभी अधूरा पढ़ते हैं, किन्तु उसमें सीख बनी रहती है।

सबसेआक्रामक शिक्षक
शत्रु:क्योंकि उसे मात देने के लिए आप हर तरीके से कड़े संघर्ष से खुद को तैयार करते हैं।

हमारे प्रथम शिक्षक
माता-पिता: क्योंकि जीवन में सीखने की शुरुआत हमें वही तो कराते हैं।

सबसेपरिवर्तनशील शिक्षक
अखबार:क्योंकि हर दिन अखबार में घटनाएं बदलती रहती हैं किन्तु सभी हमें प्रभावित करती हैं।

सबसे जटिल शिक्षक
विद्यार्थी:क्योंकिविद्यार्थियों को सिखाने के लिए शिक्षक को बहुत सीखना पड़ता है।
सबसेभोला शिक्षक
प्रियपशु: क्योंकिबुरा व्यवहार सहने के बाद भी प्रेम से बुलाने पर वह सब भूल दुलार करने लगता है।

...और सबसे ऊपर'

सबसे गहरा शिक्षक
मन: क्योंकि जब भी आप दुविधा में होते हैं तो सबसे पहले यही आपको अच्छे और बुरे की पहचान कराता है।

05 September 2017(Tuesday)

September 05, 2017 0
05 September 2017(Tuesday)

दैनिक समसामयिकी

1.ब्रिक्स सम्मलेन में भारतीय कूटनीति की जीत : ब्रिक्स  घोषणा पत्र में पहली बार शामिल हुआ पाक के आतंकी गुटों का मुद्दा

• प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सोमवार को ब्रिक्स सम्मेलन में बेहद अहम कूटनीतिक कामयाबी हासिल हुई। चीन नहीं चाहता था, इसके बावजूद संयुक्त घोषणापत्र में पाकिस्तानी आतंकवादी संगठनों के नाम बाकायदा शामिल किए गए। जैश-ए-मोहम्मद की अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई बार हिमायत कर चुके चीन को इस मामले में झुकना पड़ा।
• संयुक्त घोषणापत्र में एशिया में आतंकवाद एवं ¨हसा पर गहरी चिंता व्यक्त की गई। ब्रिक्स देशों ने आतंकवाद फैलाने को लेकर पहली बार अपने घोषणपत्र में लश्कर-ए-तय्यबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठनों के नाम लिए और इस बात पर जोर दिया कि आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने, साजिश रचने और सहयोग करने वालों को जवाबदेह ठहराना चाहिए।
• भारत के लिए बड़ी राजनयिक जीत के घटनाक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ब्राजील के राष्ट्रपति माइकल टेमर और दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति जैकब जुमा ने इन संगठनों की आतंकी गतिविधियों की कड़ी निंदा की और इस समस्या से मिलकर लड़ने की प्रतिबद्धता जताई।
• ब्रिक्स नेताओं की बैठक के बाद जारी 43 पृष्ठों के श्यामन घोषणापत्र को पारित किया गया जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि अफगानिस्तान में हिंसा पर तत्काल विराम लगाने की जरूरत है।
• अल कायदा के सहयोगियों में ईस्टर्न तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट, इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उजबेकिस्तान, हक्कानी नेटवर्क, लश्कर-ए-तय्यबा, जैश-ए-मुहम्मद, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और हिज्ब उत-तहरीर शामिल हैं।
• आतंकवाद रोधी गठबंधन की मांग : ब्रिक्स सम्मेलन के अंत में जारी की गई श्यामन घोषणापत्र में अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मांग की गई कि वह एक विस्तृत अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद रोधी गठबंधन की स्थापना करे। ब्रिक्स समूह में शामिल देश हैं- ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका।
• मोदी ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में आतंकवाद का मुद्दा जोरदार ढंग से उठाया और दूसरे नेताओं ने भी उनका समर्थन किया और इस समस्या से लड़ने की इच्छा प्रकट की।
• ब्रिक्स देशों ने सोमवार को लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मुहम्मद जैसे पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठनों के साथ-साथ तालिबान, आईएस और अलकायदा के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करने की मांग की।
• घोषणापत्र से चीन-पाक रिश्तों में आ सकता है तनाव:- एक चीनी विद्वान ने अपनी सरकार की आलोचना करते हुए कहा है कि ब्रिक्स घोषणापत्र में पाकिस्तान स्थित कुछ आतंकी समूहों के नाम शामिल करने से पाकिस्तान नाराज हो सकता है।
• इस कदम से पाकिस्तान के साथ चीन के रिश्तों में तनाव भी आ सकता है। यह भारत के लिए ही जीत हो सकती है जिसने इसके लिए बहुत काम किया है।
• सरकारी ‘चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ कन्टेम्परेरी इंटरनेशनल रिलेशंस’ के निदेशक हू शीशेंग ने कहा कि आगामी महीनों में चीनी राजनयिकों को पाकिस्तान के सामने बहुत सारे स्पष्टीकरण देने पड़ेंगे। उन्होंने कहा कि दस्तावेज में हक्कानी नेटवर्क का नाम शामिल करना ‘मेरी समझ से परे है।’
• हू शीशेंग ने कहा, ‘इस समूह का प्रमुख अफगानिस्तान तालिबान का वास्तविक मुखिया है। इससे अफगानिस्तान की राजनीतिक समझौता प्रक्रिया में चीन की भूमिका और मुश्किल हो जाएगी या यूं कहें कि भविष्य में कोई भूमिका ही नहीं होगी।’ हू शीशेंग ने कहा, ‘यह मेरी समझ से परे है कि चीन इसके लिए राजी कैसे हो गया। मुङो नहीं लगता कि यह एक अच्छा विचार है। इस घोषणापत्र को तैयार करने वाले लोग गुमराह हो गए थे।

2. ब्रिक्स की रेटिंग एजेंसी का जल्द गठन चाहता है भारत

• क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के मामले में भारत पश्चिमी देशों का एकाधिकार खत्म करना चाहता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘ब्रिक्स क्रेडिट रेटिंग एजेंसी’ बनाने की वकालत की है। मोदी ने कहा, अलग रेटिंग एजेंसी ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) देशों की अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ अन्य देशों की भी मदद करेगी।
• पश्चिमी देशों की तीन रेटिंग एजेंसियों फिच, मूडीज और स्टैंडर्ड एंड पुअर्स का बाजार में 90 फीसद हिस्से पर कब्जा है। पिछले साल गोवा में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में भारत ने ब्रिक्स रेटिंग एजेंसी बनाने की जरूरत पर बल दिया था।
• अपने संबोधन में मोदी ने कहा, ‘पिछले साल हमने ब्रिक्स रेटिंग एजेंसी बनाने के प्रयासों पर चर्चा की थी। तब से एक विशेषज्ञ समूह ऐसी एजेंसी की व्यवहार्यता पर अध्ययन कर रहा है। मैं चाहता हूं कि इसका रोडमैप बनाने का काम जल्द से जल्द हो।’
•  मोदी ने वित्तीय क्षेत्र में ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि गरीबी और भ्रष्टाचार से लड़ने की दिशा में तकनीक और डिजिटाइजेशन अहम हथियार हैं।भारत सरकार काला धन और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कदम भी उठा रही है।
• मोदी ने कहा कि इनोवेशन और डिजिटल अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में ब्रिक्स देशों की मजबूत भागीदारी विकास को गति देने, पारदर्शिता बढ़ाने और सतत विकास के लक्ष्य को हासिल करने में सहायक होगी। 1ब्रिक्स देशों ने खुली व समावेशी अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था प्रतिबद्धता जताई है।
• सभी सदस्य देशों ने एक सुर में संरक्षणवाद का विरोध किया। बैठक में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) में लंबित कोटा सुधारों को 2019 तक अमली जामा पहनाने की मांग भी उठी।

3. मोदी-पुतिन में द्विपक्षीय मसलों और अफगानिस्तान के हालात पर चर्चा

• प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ द्विपक्षीय व्यापार और निवेश बढ़ाने के उपायों पर चर्चा की। दोनों नेताओं ने अफगानिस्तान की सुरक्षा स्थिति पर भी विचार-विमर्श किया। बाद में प्रधानमंत्री ने ब्राजील के राष्ट्रपति माइकल टेमेर से भी मुलाकात की।
• मोदी और पुतिन ने दक्षिण-पूर्व चीन के इस शहर में ब्रिक्स सम्मेलन से इतर भेंट की। विदेश मंत्रलय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने पत्रकारों को बताया, ‘दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय रिश्तों से जुड़े कई पहलुओं पर चर्चा की। राष्ट्रपति पुतिन ने इस साल की शुरुआत में की गई प्रधानमंत्री की रूस यात्र को याद किया।
• उन्होंने पूर्वी आर्थिक मंच पर भारत की उच्चस्तरीय भागीदारी के लिए प्रधानमंत्री को धन्यवाद भी दिया।’ जब उनसे पूछा गया कि क्या दोनों नेताओं ने अफगानिस्तान पर भी चर्चा की, इस पर रवीश कुमार ने बताया कि दोनों नेताओं ने अफगानिस्तान समेत कई क्षेत्रीय मसलों पर विचार-विमर्श किया।
•  हालांकि इस बारे में उन्होंने और ज्यादा जानकारी देने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि मोदी-पुतिन के बीच तेल और प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में सहयोग पर भी चर्चा हुई। इसके अलावा राष्ट्रपति पुतिन ने ‘फेस्टिवल ऑफ इंडिया’ का भी जिक्र किया जिसका आयोजन इसी साल की शुरुआत में रूस में किया गया था।
•  दोनों देशों के बीच पर्यटन बढ़ाने और छात्रों के आवागमन को लेकर भी चर्चा हुई।’ द्विपक्षीय मुलाकातों के क्रम में मंगलवार को म्यांमार रवाना से पूर्व प्रधानमंत्री मोदी की चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से भी वार्ता की संभावना है।

4. उ. कोरिया मामले में सुरक्षा परिषद की आपात बैठक

• उत्तर कोरिया के छठे परमाणु परीक्षण के बाद संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सोमवार को आपात बैठक हुई। अमेरिका और जापान ने सुरक्षा परिषद से उत्तर कोरिया के खिलाफ और सख्त कदम उठाने की मांग की।
• संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की राजदूत निक्की हेली ने कहा कि अब बहुत हो चुका। समय आ गया है कि सुरक्षा परिषद उत्तर कोरिया के खिलाफ कठोरतम कदम उठाए। उसके खिलाफ 2006 से लगाए गए प्रतिबंधों ने काम नहीं किया। हमारे प्रयासों के बावजूद उसका परमाणु कार्यक्रम बढ़ता जा रहा है।
• उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग उन युद्ध पर आमादा है। संयुक्त राष्ट्र कभी युद्ध नहीं चाहता। अभी हम भी नहीं चाहते लेकिन हमारे देश के धैर्य की एक सीमा है। जापान के राजदूत कोरो बेस्शो ने कहा कि इस मामले में हम ज्यादा समय बर्बाद नहीं कर सकते। हम उत्तर कोरिया को दबाव महसूस कराना चाहते हैं।
• उन्होंने उम्मीद जताई कि उसके खिलाफ नए प्रस्ताव पर विचार होगा। ब्रिटेन ने कहा कि नए प्रतिबंध प्रस्ताव में काम के लिए चीन और रूस जाने वाले उत्तर कोरियाई नागरिकों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए। रूसी राजदूत वैसिली नेबेनजिया ने ठंडे दिमाग से काम लेने की वकालत की और तनाव बढ़ाने वाली कार्रवाई से बचने को कहा।
• अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और दक्षिण कोरिया ने सुरक्षा परिषद की आपात बैठक बुलाने की मांग की थी। गौरतलब है कि उत्तर कोरिया ने रविवार को बड़ा परमाणु परीक्षण किया। इससे पहले उसने 29 अगस्त को अंतर महाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइल का परीक्षण किया था।
• स्विट्जरलैंड की मध्यस्थता की पेशकश : तटस्थ समझे  जाने वाले स्विट्जरलैंड ने कोरियाई प्रायद्वीप विवाद में मध्यस्थता की पेशकश की है। राष्ट्रपति डोरिस लुथर्ड ने कहा है कि जरूरत पड़ने पर उनका देश उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया की सीमा पर अपनी सेना भी तैनात कर सकता है।

5. ट्रंप ‘ड्रीमर’ योजना खत्म करने की तैयारी में, भारतीय होंगे प्रभावित

• राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने चुनावी वादे के अनुसार डेफर्ड एक्शन फॉर चिल्ड्रन अराइवल (डीएसीए) योजना को समाप्त करने की तैयारी में हैं। वह मंगलवार को इससे जुड़ी घोषणा कर सकते हैं। इस योजना को ड्रीमर के नाम से भी जाना जाता है। डीएसीए को खत्म करने से भारतीय मूल के सात हजार अमेरिकी नागरिक भी प्रभावित होंगे।
• पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा बचपन में ही अवैध रूप से अमेरिका में दाखिल हुए बच्चों को प्रत्यर्पण से बचाने के लिए यह योजना लाए थे। अमेरिकी पत्रिका ‘पॉलिटिको’ की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप योजना को रद कर चुके हैं। वहीं, ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ का कहना है कि प्रवासी कार्यक्रम को खत्म करने से पहले राष्ट्रपति ने कांग्रेस (अमेरिकी संसद) को छह महीने का वक्त दिया है, ताकि इसको लेकर नए सिरे से नियम-कायदे तय किए जा सकें।
• डीएसीए के तहत तकरीबन आठ लाख लोगों को प्रत्यर्पण से सुरक्षा प्राप्त है। प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष और सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी के वरिष्ठ नेता पॉल रेयॉन ने एक साक्षात्कार में कहा, ‘ट्रंप को डीएसीए को निरस्त नहीं करना चाहिए क्योंकि ये बच्चे अमेरिका छोड़ किसी और देश को नहीं जानते।
• मेरी समझ में वह ऐसा नहीं करेंगे। यह ऐसा मसला है जिसे कांग्रेस को तय करना चाहिए।’ डेमोक्रेटिक पार्टी की नैंसी पेलोसी ने ट्रंप की योजना की आलोचना करते हुए कहा कि देशभक्त और साहसी युवाओं को प्रत्यर्पित करना देश और अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी होगा।

6. सरकार ने कालेधन पर तीन साल बाद सौंपी रिपोर्ट

• देश और विदेश में भारतीयों द्वारा रखे गए कालेधन पर तैयार की गई तीन अध्ययन रपटें सरकार ने तीन साल बाद वित्त पर संसद की स्थायी समिति को भेज दी हैं। वित्त मंत्रालय ने यह रपटें भेजी हैं।
• इस बारे में शीर्ष अधिकारियों ने बताया कि यह अध्ययन पिछली संप्रग सरकार के कार्यकाल में शुरू हुए थे। इन्हें दिल्ली आधारित राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान (एनआईपीएफपी), राष्ट्रीय एप्लाइड आर्थिक अनुसंधान परिषद (एनसीएईआर) और राष्ट्रीय राजधानी के फरीदाबाद स्थित राष्ट्रीय वित्तीय प्रबंधन संस्थान (एनआईएफएम) ने किया था।
• एनआईपीएफपी ने सरकार को अपनी रपट 30 दिसम्बर 2013, एनसीएईआर ने 18 जुलाई 2014 और एनआईएफएम ने 21 अगस्त 2014 को जमा की थी।
• अधिकारियों ने कहा कि एक बार समिति से मंजूरी मिल जाने के बाद इन रपटों को संसद में पेश किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि फिलहाल भारत और विदेश में कितना कालाधन मौजूदा है इसे लेकर कोई आधिकारिक आकलन नहीं हैं।

7. उत्तराखंड में पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण का होगा गठन
• 140 हेक्टेयर से अधिक भूमि में होने वाले निर्माण, खनन समेत अन्य प्रोजेक्ट के पर्यावरणीय प्रभाव आंकलन के लिए अब केंद्रीय पर्यावरण मंत्रलय के चक्कर काटने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
• इस कड़ी में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने प्रदेश के लिए बेहद महत्वपूर्ण राज्य स्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण के गठन को हरी झंडी दे दी है। पिछले दो वर्ष से इसका गठन लटका हुआ था।
• वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत के मुताबिक इसी माह से प्रक्रिया शुरू कर अक्टूबर तक यह प्राधिकरण अस्तित्व में आ जाएगा।171 फीसद वन भूभाग वाले उत्तराखंड में 40 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में लगने वाले उद्योग, सड़क अथवा किसी प्रकार के निर्माण कार्य और नदियों में 50 हेक्टेयर या इससे अधिक क्षेत्र में उपखनिज चुगान संबंधी कार्यों में पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआइए) कराना अनिवार्य है।
• यह केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रलय की गाइडलाइन का हिस्सा है। ईआइए का परीक्षण कराने के बाद राज्यस्तरीय पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण प्रोजेक्ट पर कार्य शुरू करने की अनुमति जारी करता है।
• राज्य में प्राधिकरण की अंतिम बैठक 29 जुलाई 2015 को हुई थी और इसके बाद इसका कार्यकाल खत्म हो गया। उस वक्त प्राधिकरण में 139 प्रोजेक्ट लंबित थे। तब से इनकी संख्या में और इजाफा हो गया है।

हाइड्रोजन बम :उलझ पड़ीं महाशक्तियां (डॉ. रहीस सिंह)

September 05, 2017 0
हाइड्रोजन बम :उलझ पड़ीं महाशक्तियां

(डॉ. रहीस सिंह)

हाइड्रोजन बम :उलझ पड़ीं महाशक्तियां

(डॉ. रहीस सिंह)

एशिया-प्रशांत क्षेत्र, कुछ विस्थापनों के साथ लम्बे समय से नियंतण्र हलचल का एपीसेंटर बना हुआ है। ऐसे में पहला प्रश्न यह उठता है कि क्या यह हलचल 21वीं सदी का कोई नया इतिहास लिखने जा रही है? क्या प्योंगयांग स्वयं इस ‘‘मसल गेम’ का नायक है अथवा एक प्यादा भर? यदि वह प्यादा है तो नायक अथवा खलनायक कौन है-बीजिंग, मॉस्को, इस्लामाबाद या स्वयं वाशिंगटन? समाचार एजेंसियों के अनुसार उत्तर कोरिया ने रविवार को हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया, जो परमाणु बम से 9.8 गुना ताकतवर है। प्योंगयांग द्वारा अब तक परीक्षण किए गए हथियारों में यह सबसे अधिक शक्तिशाली है। यह बम उत्तर कोरिया की लंबी दूरी की मिसाइलों से भी दागा जा सकता है। हालांकि अमेरिकी जियोलॉजिकल सव्रे ने 6.3 तीव्रता का झटका दर्ज किया है। इस दृष्टि से उत्तर कोरियाई द्वारा किए गए विस्फोट पर यह शंका हो सकती है कि वह उतना ताकतवर नहीं है जितना प्योंगयांग दावा कर रहा है लेकिन इतना तो तय है कि उत्तर कोरिया ने वैश्विक ताकतों की धमकी और प्रतिबंधों के भय को दरकिनार करते हुए विस्फोट किया है। हालांकि इसके बाद दक्षिण कोरिया, जापान, अमेरिका और यहां तक कि चीन की तरफ से अपनी-अपनी तरह से गुस्से का इजहार किया गया। लेकिन क्या यह गुस्सा सिर्फ नुमाइशी है या फिर इसका कोई असर भी पड़ने वाला है?

उत्तर कोरिया ने अपनी नाभिकीय शक्ति का इतिहास लिखना वर्ष 2006 से शुरू किया था। यहां से लेकर अब की यात्रा में उत्तर कोरिया न ही किसी से डरा और न रुका। उल्लेखनीय है कि उत्तर कोरिया बहुत दिनों से हाइड्रोजन बम बनाने की कोशिश में है और इस दिशा में अब तक रिपोर्टे लगातार बताती रहीं कि उत्तर कोरिया एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन (बैलेंस ऑफ पावर) बनाने कोशिश में है, लेकिन इसके बावजूद कुछ देश इसे उसका ‘‘बम प्रोपोगैंडा’ समझते रहे या यह कहकर उसे बचाते रहे। इस बीच पश्चिमी विशेषज्ञ यह मानते रहे कि प्योंगयांग एक थर्मोन्यूक्लियर विस्फोट विकसित करने से वर्षो दूर है क्योंकि किसी हाइड्रोजन या थर्मोन्यूक्लियर उपकरण श्रृंखला अभिक्रिया में संलयन (फ्यूजन) का प्रयोग होता है, जिससे अकेले प्लूटोनियम या यूरेनियम से होने वाले विखंडन विस्फोट की तुलना में कहीं अधिक शक्तिशाली विस्फोट होता है। उनका तर्क यह था कि उत्तर कोरिया प्रौद्योगिकीय स्तर पर इतना एडवांस नहीं है कि अकेले फ्यूजन डिवाइस विकसित करने में सफल हो पाएगा। ऐसे में यह प्रश्न जरूर होना चाहिए कि फिर उसे इस स्थिति तक किसने पहुंचाया? स्वाभाविक रूप से बीजिंग या मॉस्को ने। फिर बीजिंग किस बात से गुस्सा हो रहा है ? दरअसल, उत्तर कोरिया इस बम के जरिए दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराना चाहता है। ‘‘

दबाव के लिए परमाणु ताकत’ की नीति बेहद घातक हो सकती है क्योंकि इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए उत्तर कोरिया फिजिकल रेस्पांस यानी परमाणु हमले की जद तक भी जा सकता है। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने वर्ष 2014 में दक्षिण कोरिया की अपनी यात्रा के दौरान उत्तर कोरिया को ‘‘अछूत दश’ करार दिया था। साथ ही संकल्प लिया था कि यदि प्योंगयांग और परीक्षण करता है तो उसके खिलाफ और कड़े कदम उठाए जाएंगे। लेकिन प्योंगयांग नहीं रुका। अब ट्रंप क्या करेंगे? गौर से देखें तो कोरिया ने कुछ भी ऐसा नया नहीं किया है, जिसकी कोई संभावना ही न रही हो। यह अफवाह तो 2002 में ही उड़ गई थी कि वह यूरेनियम और प्लूटोनियम, दोनों को ही रिप्रॉसेस करने वाली टेक्नोलॉजी विकसित कर रहा है। इसमें मूल भूमिका पाकिस्तानी मेटलरजिस्ट अब्दुल कादिर खान की थी, जिन्होंने 2004 में यह स्वीकार भी कर लिया था कि उसने 1991-97 के बीच में उत्तर कोरिया को यूरेनियम की टेक्नोलॉजी बेची थी।

कोरियाई प्रायद्वीप का यह संघर्ष अमेरिका, रूस और चीन की देन है। मुख्य रूप से दो देश इस बीमारी को ठीक करने के बहाने संघर्ष को भड़काने का काम कर रहे हैं, जिससे वे अपनी ताकत को प्रशांत क्षेत्र में टेस्ट कर सकें। ध्यान रहे कि दोनों देशों के बीच मौजूदा तनाव वैसे तो शीतयुद्ध के काल से ही चला आ रहा है लेकिन सोवियत संघ के विघटन और पूंजीवाद के नाम पर स्थापित हो रहे नव साम्राज्यवाद की विजय के बाद से इसमें नये आयाम भी जुड़ गए, जिन्होंने इसे और अधिक भड़काया, कम नहीं किया। यही वजह है कि प्योंगयांग नियंतण्रसे बाहर चला गया। तो क्या ट्रंप अब इसे रोक पाएंगे?

अमेरिका यह भली-भांति जानता है कि उत्तर कोरिया 1960 के दशक से परमाणु हथियारों के अधिग्रहण की इच्छा रखता है और यह उसकी राजनीतिक स्वायत्तता, राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और सैन्य शक्ति की इच्छा में निहित है। इसके साथ ही किम जोंग-उन अमेरिका की ओर से किसी संभावित हमले से निपटने के लिए पहले ही बचाव के उपाय तैयार कर लिए हैं। रही बात ट्रंप या उनके सहयोगियों अथवा वैश्विक  ताकतों की, तो उन्हें अब यह मान लेना चाहिए कि आर्थिक प्रतिबंध उत्तर कोरिया को नहीं रोक सकते। सैन्य कार्रवाई ही अब मात्र विकल्प है। लेकिन अब यह सम्भव नहीं लगता। यह बात लगभग सभी मान सकते हैं कि अमेरिका के साथ उत्तर कोरिया का युद्ध उसके लिए आत्महत्या जैसा कदम साबित हो सकता है। लेकिन यदि अमेरिका उत्तर कोरिया के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करता है तो टोक्यो और सियोल को परमाणु बम का हमला भी झेलना पड़ सकता है। यही नहीं दक्षिण कोरिया में मौजूद 28,500 अमेरिकी सैनिकों का जीवन भी खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए राष्ट्रपति ट्रंप युद्ध की चेतावनी दे सकते हैं लेकिन युद्ध के विकल्प का चुनाव नहीं कर सकते। इस दिशा में संयुक्त राष्ट्र संघ कोई समाधान खोज सकता था लेकिन इन दिनों उसकी हालत ‘‘लीग ऑफ नेशंस’ की तरह है, जो छोटे-मोटे झगड़े सुलझाने में सफलता प्राप्त कर गयी लेकिन बड़े झगड़ों को नहीं रोक पाई, जिसके कारण ही दूसरा विश्वयुद्ध दुनिया को झेलना पड़ा था। फिलहाल अभी समाधान खुर्दबीन से देखने पर भी नजर नहीं आ रहा। (RS)