सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में निचली अदालतों की कार्यवाही के वीडियो और ऑडियो रिकॉर्डिग के लिए सहमति दी है। यह न्यायालय के इसी साल मार्च में दिए गए अपने एक फैसले का विस्तार है, जिसमें उसने हरेक राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के दो-दो जिला न्यायालयों में प्रायोगिक तौर पर केवल वीडियो रिकॉर्डिग के लिए कहा था। हालांकि अभी यह फैसला केवल निचली अदालतों के लिए है, इस संबंध में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के लिए स्थिति स्पष्ट नहीं है।
उच्चतम न्यायालय के मौजूदा आदेश को ऑडियो-वीडियो रिकार्डिग की अनिवार्य व्यवस्था की दिशा में एक शुरुआत मान सकते हैं। हो सकता है आने वाले समय का भारत न्यायिक प्रक्रिया के ऑडियो-वीडियो रिकार्डिग की व्यवस्था के जरिये पारदर्शी और उत्तरदायी न्याय की नई इबारत लिखे। इससे भारतीय न्याय प्रणाली पर लगे भ्रष्टाचार के लांछनों को निश्चित रूप से कम करने में मदद मिलेगी। ऐसे उपाय केवल भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिए ही नहीं बल्कि निचली अदालतों में बहुत से अनुचित तरीके से दर्ज कराए जाने वाले मुकदमों पर भी रोक लग सकेगी। ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि वकील सांठगांठ करके अदालतों में न केवल शिकायत याचिका दर्ज करवाते हैं बल्कि जज भी बिना पूरी प्रक्रिया के केस को दाखिल करके समन या वारंट जारी कर देते हैं। इसी तरह कई बार ट्रायल के दौरान बयानों और सबूतों से भी छेड़छाड़ के आरोप लगते रहे हैं। यही नहीं ऊपरी अदालतों में अपील के दौरान जज वही व्यू देख पाते हैं जो निचली अदालत के जज ने दिखाया होता है, लेकिन ऑडियो-वीडियो रिकार्डिग प्रणाली लागू होने के बाद ऊपरी अदालत के जज निचली अदालत की पूरी कार्यवाही को देख और सुन सकेंगे, इससे उन्हें पूरे ट्रायल को समझने में आसानी होगी। इसे न्याय के क्षेत्र में क्रांति की शुरुआत के रूप में देखना चाहिए।
एक आकलन के अनुसार देश के करीब 45 प्रतिशत लोग मानते हैं कि न्यायपालिका भ्रष्ट है। 2017 के एक सर्वे के मुताबिक करीब 60 फीसद ने वकील को, करीब पांच फीसद ने जज को और करीब 30 प्रतिशत ने कोर्ट के अधिकारियों और कर्मचारियों को अपने पक्ष में निर्णय देने के लिए रिश्वत देने की बात स्वीकार की है। देश के पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने 2010 में सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया था कि देश के पिछले 16 मुख्य न्यायाधीशों में से आधे भ्रष्ट रहे हैं। इसी तरह से अपने विवादित बयानों के लिए सुर्खियों में रहने वाले सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू ने उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय पर कई बार भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगा चुके हैं। निश्चित रूप से न्यायालय के भ्रष्टाचार पर सार्वजनिक रूप से बात करने के लिए बड़ी हिम्मत चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के अवमानना के केस में सजा काट रहे कोलकाता हाईकोर्ट के न्यायाधीश सी.एस. कर्णन का भी आरोप है कि उन्होंने न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई है, इसलिए उन पर निशाना साधा गया।
न्यायाधीश कर्णन ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों और मद्रास हाईकोर्ट के मौजूदा न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगाए थे। अब ये आरोप कितने सही हैं और कितने गलत, यह निश्चित रूप से जांच का विषय है, लेकिन इससे न्यायालय की भूमिका पर सवाल तो खड़े ही होते हैं। सर्वोच्च न्यायालय से लेकर विभिन्न उच्च न्यायालय समय-समय पर सरकार को पारदर्शी प्रशासन और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्यस्थलों से लेकर सार्वजनिक स्थानों तक पर सीसीटीवी लगाए जाने का निर्देश देते रहे हैं, लेकिन न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता को लेकर इस तरह की व्यवस्था को टालते रहे। उल्लेखनीय है कि अगस्त 2014 में विधि मंत्रलय की सलाहकार समिति, विधि आयोग और सर्वोच्च न्यायालय की शीर्ष ई-कमिटी की बैठक के दौरान केंद्र सरकार ने प्रस्ताव दिया था कि निचली अदालतों की सभी न्यायिक कार्यवाहियों की ऑडियो-वीडियो रिकार्डिग की शुरुआत की जाए और फिर इसे उच्च और उच्चतम न्यायालय में लागू किया जाए। इस प्रस्ताव को नवंबर 2014 में सर्वोच्च न्यायालय की शीर्ष ई-कमिटी ने कथित रूप से मानने से इन्कार कर दिया था। इसी तरह से जुलाई 2015 में ‘नेशनल मिशन फॉर जस्टिस डिलिवरी एंड लीगल रिफॉर्म’ की सलाहकार समिति की बैठक के दौरान विधि आयोग के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस ए.पी. शाह ने इस मसले को उठाते हुए कहा कि न्यायिक कार्यवाहियों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिग के विरोध का एक भी उचित कारण नहीं है क्योंकि यह हर हाल में न्यायिक उत्तरदायित्व में इजाफा ही करेगा। हालांकि जनवरी 2015 में सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एच.एल. दत्तू ने सर्वोच्च न्यायालय में कैमरा लगाने की जनहित याचिका को खारिज करके संकेत दे दिया था कि शीर्ष कोर्ट की इस मसले पर मंशा क्या है? यह ऐसी अकेली याचिका नहीं थी जिसे खारिज किया गया, विभिन्न उच्च न्यायालयों से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक में न्यायिक पारदर्शिता को लेकर ऑडियो-वीडियो रिकार्डिग की मांग के संदर्भ में लगाई गई अनेक याचिकाओं को खारिज कर दिया गया।
उल्लेखनीय है कि अमेरिका में 1955 से ही मौखिक बहस की न केवल ऑडियो रिकार्डिग होती है बल्कि यह कोर्ट की वेबसाइट पर डाउनलोड करने या सीधे सुनने के लिए उपलब्ध होती है। इन रिकार्डिग्स की देखरेख का जिम्मा वहां की नेशनल आर्काइव और रिकार्ड्स एडमिनिस्ट्रेशन के पास होता है। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया सुप्रीम कोर्ट के कुछ निर्णय और आदेश वेब पर प्रसारित किए जाते हैं। ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई को टेलीविजन से प्रसारित किया जाता है।
भारत में भी 2015 में तत्कालीन कानून मंत्री वी सदानंद गौड़ा ने सभी न्यायालयों की कानूनी कार्यवाही को प्रसारित करने पर जोर दिया था। भारत में पहली बार मद्रास हाईकोर्ट ने कोर्ट रूम के बाहर एलक्ष्डी टीवी लगाकर न्यायिक कार्यवाही को प्रसारित किया था, जिससे मामले से जुड़े अन्य पक्षकार और वकील सुनवाई को देख सकें। इसी तरह से जुलाई 2015 में कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने एक खास मामले में वीडियो और ऑडियो रिकाडिर्ंग के आदेश दिए थे, हालांकि उनका यह आदेश केवल कोर्ट की सहायता के लिए ही था, इसके किसी भी तरह के सार्वजनिक उपयोग पर उनकी अनुमति के बिना निषेध था। ऐसे में देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालतों में न्यायिक परीक्षण की वीडियो रिकार्डिग का आदेश जारी करना सकारात्मक बदलाव की ओर संकेत करता है।(DJ)
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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