गोरखपुर त्रासदी ने सरकारी अस्पतालों में व्याप्त भ्रष्टाचार और र्दुव्यवस्था की पोल खोल दी है। सरकारी अस्पतालों की यह स्थिति सर्वव्यापी है। इंग्लैंड के सरकारी अस्पतालों को दूसरे विकसित देशों की तुलना में श्रेष्ठ समझा जाता है, परंतु वहां भी र्दुव्यवस्था है। इंग्लैंड के बाशिंदे अक्सर दूसरे देशों में उपचार के लिए जाते हैं, क्योंकि उन्हें अपने अस्पतालों में संक्रमण का भय सताता है। नब्बे के दशक में इंग्लैंड के एल्डर हे अस्पताल के बाल रोग विभाग में पोस्टमार्टम के समय मृत बच्चों के अंगों को गैरकानूनी ढंग से निकाल लिया जाता था। स्टैफर्ड अस्पताल में काफी तादाद में मरीजों की मौत हो रही थी। जांच में पाया गया कि अस्पताल में मरीजों की उपेक्षा की जाती थी और उनके साथ र्दुव्यवहार होता था। सरकारी अस्पतालों की यह दुर्गति सभी सरकारी अमलों और कामकाज में देखी जाती है। मसलन सरकारी बैंक, सार्वजनिक इकाइयां, बिजली विभाग इत्यादि इसकी मिसाल हैं। गोरखपुर जैसे सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की खस्ता हालत इसी व्यापक सरकारी र्दुव्यवस्था का हिस्सा है।
तात्पर्य यह है कि सरकार के माध्यम से अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना लोहे के चने चबाना जैसा है।1कुछ समय पहले मुङो वॉलंटरी हेल्थ एसोसिएशन नाम के एनजीओ के लिए भारत की स्वास्थ्य सेवाओं के आर्थिक मूल्यांकन का अवसर मिला था। मैंने देखा कि सरकारी अस्पतालों में प्रत्यक्ष शुल्क कम अवश्य लिए जाते है, परंतु मरीज द्वारा वहन किया जाने वाला खर्च किसी लिहाज से कम नहीं होता है। सरकारी अस्पतालों में मरीज के उपचार में समय अधिक लगता है। जैसे टाइफायड के मरीज का उपचार निजी अस्पताल में औसतन पांच दिन में हो जाता है तो सरकारी अस्पताल में इसके लिए औसतन आठ दिन लगते हैं। इन तीन अतिरिक्त दिनों में परिजनों और तीमारदारों आदि के खर्च को जोड़ लिया जाए तो कुल मिलाकर निजी और सरकारी अस्पतालों में मरीज द्वारा वहन किया गया खर्च बराबर हो जाता है। यानी सरकार द्वारा सरकारी अस्पतालों को दी जा रही भारी भरकम रकम डॉक्टरों के वेतन और अक्षमता को पोस रही है। मरीज को कम ही फायदा मिल रहा है।
अत: सभी सरकारी अस्पतालों का निजीकरण कर देना चाहिए। इन पर वर्तमान में किए जा रहे खर्च को सीधे जनता को हस्तांतरित कर देना चाहिए। केंद्र सरकार द्वारा प्रकाशित भारतीय लोक वित्त सांख्यिकी के अनुसार वर्ष 2015-16 में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं पर 1,73,924 करोड़ रुपये खर्च किए गए। चालू वित्त वर्ष में यह रकम लगभग 2,00,000 करोड़ रुपये बैठेगी। इसे देश के 130 करोड़ नागरिकों में वितरित कर दिया जाए तो प्रत्येक व्यक्ति को लगभग 1,500 रुपये प्रतिवर्ष अथवा प्रत्येक परिवार को लगभग 6,000 रुपये प्रतिवर्ष दिए जा सकते है। इससे लोग निजी डॉक्टरों की स्वास्थ्य सेवाएं या बीमा पॉलिसी ले सकते हैं।
निजी स्वास्थ्य सेवाएं अपनाने के विरोध में अमेरिका का उदाहरण सामने आता है। अमेरिका में सरकारी अस्पताल नगण्य हैं। सरकार द्वारा कमजोर तबकों को बाउचर दिए जाते हैं जिनसे वे निजी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाते हैं, पर वहां भी निजी डॉक्टरों की धांधली का जोर है। अध्ययनों में पाया गया कि दूसरे विकसित देशों की तुलना में अमेरिका में स्वास्थ्य सेवाएं खासी महंगी हैं। अन्य विकसित देशों में स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रति व्यक्ति 3,200 डॉलर खर्च किए जाते हैं तो अमेरिका में 8,200 डॉलर। तिस पर अमेरिका की स्वास्थ्य परिस्थितियां कमजोर हैं, परंतु अमेरिका में रोगों का उत्तम उपचार उपलब्ध है, लेकिन तभी जब आप उसकी कीमत चुकाने की कूवत रखते हैं। कैंसर जैसे दुरूह रोगों का अमेरिका में सबसे बेहतर उपचार उपलब्ध है। निजी स्वास्थ्य सेवाओं के भी दो पहलू हैं। एक ओर निजी डॉक्टरों द्वारा ऊंची कीमत वसूल की जाती है तो इसके एवज में बेहतरीन किस्म की सेवाएं भी मुहैया कराई जाती हैं। इसका संदेश साफ है कि बेहद महंगी होने के कारण निजी स्वास्थ्य सेवाएं आम अमेरिकी की पहुंच से बाहर हैं।
अमेरिका ने स्वास्थ्य बीमा को अनिवार्य बनाकर इस समस्या का समाधान हासिल करने की दिशा में कदम बढ़ाए। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कानून बनाया था कि प्रत्येक नागरिक को बीमा खरीदना अनिवार्य है। इसमें गरीबों को बीमा खरीदने के लिए कुछ सहायता भी दी जाती है। मेरी समझ से यह समस्या का हल नही है, क्योंकि बीमाधारकों द्वारा उन्हीं निजी डॉक्टरों से ही महंगी स्वास्थ्य सेवाएं ली जाएंगी। स्वास्थ्य सेवाओं में जरूरत से ज्यादा महंगाई बनी रहेगी। अमेरिका में प्रिसक्रिप्शन यानी डॉक्टरी पर्चे के बिना एंटीबायोटिक दवाएं नहीं मिलतीं। पहले डॉक्टर को 200 डॉलर या 13,000 रुपये की फीस देकर पर्चा लिखवाना पड़ता है। फिर दवा खरीदनी होती है। जो दवा भारत में 50 रुपये में उपलब्ध है वही अमेरिका में 2,000 रुपये में बिकती है। स्वास्थ्य खर्चो से अमेरिकी नागरिक इतने दबे रहते हैं कि दीवालिया होने वाले 60 प्रतिशत मामलों के मूल में स्वास्थ्य खर्च ही होते हैं। तात्पर्य यह कि अमेरिका में निजी डॉक्टरों के इस आतंक का कारण कानूनी विसंगति अथवा नियंत्रण का अभाव है।
अमेरिका में यदि भारत की तरह एंटीबायोटिक दवा को सीधे दुकान से खरीदने की कानूनी अनुमति दे दी जाए तो वहां स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च घट जाएगा। चूंकि वहां डॉक्टर भी कम हैं, लिहाजा उनकी फीस भी काफी ऊंची हैं।
लब्बोलुआब यही है कि अमेरिका में निजी स्वास्थ्य सेवाएं निजी डॉक्टरों और दवा कंपनियों के कारण महंगी हैं। निजी स्वास्थ्य व्यवस्था में कोई बुराई नहीं है। बस इसका जनहित में नियंत्रण करने की जरूरत है। कुल मिलाकर अपनी व्यवस्था ठीक है। हमने बाजार में डॉक्टरों की पर्याप्त आपूर्ति करा दी है जिससे डॉक्टरों की फीस न्यून है। डॉक्टरों और अस्पतालों के बीच प्रतिस्पर्धा से स्वास्थ्य सेवाओं और दवा कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा से दवाओं के दाम कम हैं।
भारत दुनिया को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने का पसंदीदा केंद्र बन गया है। निजी खर्चो में जवाबदेही एवं कुशलता होती है। जनता से टैक्स वसूल कर सरकारी सेवाएं दिलाने में वही सेवा महंगी और अकुशल हो जाती है जैसा इंग्लैंड में हो रहा है। सभी सरकारी अस्पतालों का निजीकरण करके रकम को सीधे जनता को देना चाहिए। ‘स्वास्थ्य पुलिस’ बनानी चाहिए जो कि डॉक्टरों और अस्पतालों द्वारा अनावश्यक दवाओं तथा टेस्ट को रोके। दवाओं के जेनेरिक पर्चे अनिवार्य बना दिए जाए जिससे ग्राहक प्रतिस्पर्धी कंपनी की दवा खरीद सके और डॉक्टरों को कमीशन खाने का अवसर न मिले। तभी जनता खुशहाल होगी। (DJ)
(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं आइआइएम बेंगलुरु के पूर्व प्रोफेसर हैं)

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