पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिए जाने के प्रयास में विपक्ष ने रोड़ा अटकाया तो सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की विभिन्न वंचित जातियों में पैठ बनाने का रास्ता खोल लिया। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ओबीसी की केंद्रीय सूची के वर्गीकरण के लिए आयोग बनाने के फैसले को मंजूरी दे दी। यानी इस वर्ग में भी पिछड़ेपन की सीमा को देखते हुए उन्हें आरक्षण का हक दिया जाएगा। एक तरह से यह कोटे के अंदर कोटा होगा। वहीं ओबीसी में क्रीमी लेयर की आय सीमा को छह लाख से बढ़ाकर आठ लाख रुपये करने का फैसला भी लिया गया है। 1अब देखना है कि ओबीसी के अंदर केंद्रीय सूची में शामिल जातियों को क्या उनकी संख्या के अनुरूप सही अनुपात में आरक्षण का लाभ मिल पाएगा? अगर नहीं तो इनका कैसे वर्गीकरण किया जा सकता है, आयोग इसके मापदंडों पर भी विचार करेगा। ध्यान रहे कि पिछड़ा वर्ग आयोग ने तीन वर्गो में वर्गीकरण का सुझाव दिया था। एक वर्ग जो पिछड़ा है। दूसरा वर्ग जो ज्यादा पिछड़ा है और तीसरा जो अति पिछड़ा है। भावी आयोग उन जातियों की संख्या और पिछड़ेपन को ध्यान में रखकर नई सूची तैयार करेगा। यह फैसला भले ही सामाजिक समानता के मुद्दे से जुड़ा है, लेकिन इसका राजनीतिक फलक काफी बड़ा है। दरअसल पिछले चुनावों में ऐसे ओबीसी वर्ग का भाजपा के प्रति झुकाव रहा था, जो बहुत प्रभावी नहीं है। इनकी बड़ी संख्या है और केंद्र एवं राज्यों की सूची को मिलाया जाए तो ऐसी जातियां सैकड़ों में हैं।
बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में जो प्रभावी ओबीसी वर्ग है, वह आरक्षण के 27 फीसद कोटे के अधिकांश हिस्से पर काबिज है। भाजपा की ओर से पहले ही यह संकेत दिया गया था कि वह यह सुनिश्चित करेगी कि पिछड़ों के लिए आरक्षण का लाभ सभी जातियों तक पहुंचे। इसे आगामी चुनावों की तैयारियों के रूप में भी देखा जा रहा है। 1ओबीसी में जातियों के उप-वर्ग के लिए आयोग बनाने की सिफारिश राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग ने 2011 में पहली बार की थी। आयोग की सिफारिश थी कि ओबीसी को तीन उप-वर्ग में बांटा जाए। इससे पहले 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस संबंध में व्यवस्था दी थी। 2012, 2013 और 2014 में संसदीय समितियों ने भी इसकी सिफारिश की थी। उप-वर्ग बनाने का मकसद ओबीसी में सभी वर्गो को बराबर लाभ का मौका देना है।
अक्सर आरोप लगते हैं कि पिछड़ी जातियों में से आर्थिक तौर पर मजबूत कुछ वर्ग ही फायदा उठा रहे हैं। उनके अलावा ज्यादातर पिछड़ी जातियों को फायदा नहीं मिल रहा है। उप-वर्ग बनने पर विशेष जातियों के लिए आरक्षण का बंटवारा हो जाएगा। इस आयोग का नाम ‘अन्य पिछड़ा वर्ग उप-वर्गीकरण जांच आयोग’ होगा। यह ओबीसी की केंद्रीय सूची में शामिल जातियों को आरक्षण के लाभ के असमान वितरण की जांच करेगा। साथ ही असमानता दूर करने के तौर-तरीके और प्रक्रिया तय करेगा।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामले में 16 नवंबर 1992 को अपने आदेश में व्यवस्था दी थी कि पिछड़े वर्गो को पिछड़ा या अतिपिछड़ा के रूप में श्रेणीबद्ध करने में कोई संवैधानिक या कानूनी बाधा नहीं है। लिहाजा कोई राज्य सरकार ऐसा करना चाहती है तो वह कर सकती है। इस परिप्रेक्ष्य में ओबीसी आयोग की सिफारिश पर 11 राज्य पहले ही अपनी ओबीसी सूची में उप-वर्ग बना चुके हैं। इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, तेलगांना, पुडुचेरी, कर्नाटक, हरियाणा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और जम्मू-कश्मीर शामिल है।
क्रीमी लेयर बढ़ने से ओबीसी आरक्षण का लाभ लेने वाले बढ़ेंगे। आठ लाख रुपये सालाना तक आय वाले इस दायरे में आएंगे। पिछड़ा वर्ग आयोग ने 2015 में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 27 फीसद आरक्षण के बाबजूद सरकारी नौकरी में ओबीसी की संख्या 15 लाख रुपये तक बढ़ानी चाहिए। पिछड़ा कल्याण पर संसदीय समिति ने यह सीमा 20 लाख रुपये तक रखने की सिफारिश की थी। सिफारिशो का अध्ययन कर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रलय ने कैबिनेट के पास आठ लाख रुपये आय सीमा की सिफारिश भेजी थी। इससे पहले 2013 में क्रीमी लेयर को 4.5 लाख से बढ़ाकर छह लाख किया गया था।
पिछड़े वर्ग को लाभ पहुंचाने के मकसद से केंद्रीय मंत्रिमंडल पहले ही राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की जगह नया आयोग के गठन को मंजूरी दे चुका है। पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण की बढ़ती मांग को देखते हुए यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में लिया गया था। इसे संवैधानिक दर्जा भी दिया जाएगा। मौजूदा आयोग को यह दर्जा नहीं है। पिछड़ा वर्ग कल्याण से जुड़ी संसदीय समिति ने भी यही सिफारिश कैबिनेट को की थी।
नए आयोग का नाम ‘सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ा वर्ग राष्ट्रीय आयोग’ होगा। अब पिछड़ा वर्ग सूची में किसी नई जाति को जोड़ने या हटाने का अधिकार राज्य सरकारों के पास नहीं रहेगा। संसद की मंजूरी के बाद ही सूची में बदलाव संभव हो सकेगा। यह फैसला उत्तर प्रदेश चुनाव में भाजपा को मिली शानदार जीत के परिप्रेक्ष्य में आया लगता है। यहां पार्टी की जीत में पिछड़े वर्ग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अपना दल जैसी छोटी पार्टियों के माध्यम से भाजपा ने ओबीसी वोट बैंक में पैठ बनाई थी। केंद्र के इस कदम को इसी सामाजिक ताने-बाने के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के तौर पर देखा जा रहा है। इससे भाजपा के दूरगामी राजनीतिक हित सधते दिखाई दे रहे हैं। यह फैसला ऐसे समय आया है जब आरक्षण की मांग देश के अनेक प्रदेशों में उठ रही है। गुजरात के पटेल, राजस्थान के गुर्जर, हरियाणा के जाट और आंध्र प्रदेश के कापू समुदाय के लोग आंदोलनरत थे। गुजरात में तो इसी साल के अंत में चुनाव होने हैं। माना जा रहा है कि मोदी सरकार ने आयोग के गठन का प्रस्ताव लाकर फिलहाल इन समुदायों को विश्वास में लेने की कोशिश की है। साफ है कि भाजपा इस फैसले के जरिये पिछड़ा और अति पिछड़ों में मजबूत पैठ बना लेगी। (DJ)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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