Thursday, August 31, 2017

निजी सूचनाओं की सुरक्षा का बंदोबस्त (उमेश चतुर्वेदी)

(साभार  दैनिक जागरण )
आधार कार्ड की अनिवार्यता के खिलाफ सर्वोच्च अदालत में दायर याचिका में याचिकाकर्ताओं का एक तर्क यह भी रहा है कि आधार कार्ड के जरिए जो लोगों के निजी आंकड़े इकट्ठा किए जा रहे हैं, उनसे लोगों के निजता के अधिकार का उल्लंघन होता है। मनमोहन सिंह सरकार द्वारा सरकारी योजनाओं के लिए आधार कार्ड को जरूरी बनाने की शुरुआत से ही इसका विरोध शुरू हो गया। मगर विरोध का तार्किक आधार इतने दूर तक जा पहुंचेगा कि सर्वोच्च न्यायालय को अलग से यह भी सोचना-देखना पड़ेगा कि निजता का आधार भी मौलिक अधिकारों की तरह है या नहीं और अब सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया है कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हासिल जीने का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का ही हिस्सा है। आधार के लिए आंकड़ों का इकट्ठा किया जाना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है या नहीं, बेशक अभी फौरी तौर पर इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाया है, लेकिन इस एक फैसले ने आधार को लेकर भावी फैसले की थोड़ी सी तस्वीर तो साफ कर ही दी है। साफ है कि अब आधार को लेकर रही सोच पर एक विराम तो जरूर लगेगा।

इस फैसले की महत्ता को इसी से समझा जाना चाहिए कि मामले की सुनवाई नौ जजों की संविधान पीठ ने किया। इस फैसले की एक और अहम बात है कि यह सर्वसम्मति से आया है। इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस एस.ए.बोबडे, जस्टिस आर.के. अग्रवाल, जस्टिस आर.एफ. नरीमन, जस्टिस ए.एम. सप्रे, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर शामिल हैं। इस पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के दो फैसलों को भी खारिज किया है, जिसके तहत निजता को पहले मौलिक अधिकार नहीं माना गया था। पहला फैसला 1954 में एम.पी. शर्मा बनाम भारतीय संघ में आया था, जिसकी सुनवाई छह न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने की थी। इसी तरह दूसरा मामला खड़ग सिंह बनाम भारतीय संघ था, जिसकी सुनवाई आठ जजों की पीठ ने की थी। इस लिहाज से देखें तो इस बार सुनवाई करने वाली संविधान पीठ सबसे बड़ी थी।

भारतीय संविधान ने नागरिकों को छह मौलिक अधिकार दे रखे हैं। इनका वर्णन संविधान के तीसरे भाग में अनुच्छेद 12 से 35 तक में किया गया है। मौलिक अधिकार अनुच्छेद 12, 13, 33, 34 तथा 35 का संबंध अधिकारों के सामान्य रूप से है। हालांकि 44वें संशोधन के पास होने के पहले तक मौलिक अधिकारों को सात श्रेणियों में बांटा जाता था। मगर 44वें संशोधन ने संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाकर सामान्य कानूनी अधिकार बना दिया। इसके बाद से संवैधानिक तौर पर भारतीय नागरिकों को छह मौलिक अधिकार हासिल हैं। इसमें सबसे पहला समानता का अधिकार है, जिसका जिक्र संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 तक में विस्तृत रूप से किया गया है। इसी तरह व्यक्ति को स्वतंत्रता का अधिकार का अधिकार दिया गया है, जिनका पूरा विवरण अनुच्छेद 19 से 22 तक में दिया गया है। इसी में 19क भी है, जिसके तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी अधिकार है। इसी तरह अनुच्छेद 23 से 24 तक में भारतीय संविधान नागरिकों को शोषण मुक्ति का भी अधिकार दिया है। इसी तरह अनुच्छेद 25 से 28 तक में नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता और अनुच्छेद 29 एवं 30 में सांस्कृतिक और शिक्षा हासिल करने का अधिकार दिया गया है। जबकि संवैधानिक उपचारों का अधिकार का जिक्र अनुच्छेद 32 में किया गया है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ही मौलिक अधिकारों का रखवाला है, लिहाजा अब निजता का अधिकार भी संवैधानिक दायरे में शामिल हो गया है।

सर्वोच्च न्यायालय पहले ही कह चुका है कि आधार के तहत जो आंकड़े लिए जा रहे हैं, उनका इस्तेमाल उन्हीं कामों के लिए होना चाहिए, जिनके लिए ये आंकड़े लिए जा रहे हैं। यहां याद कर लेना चाहिए कि भले ही कुछ संस्थाएं और गैर सरकारी संगठन आधार की अनिवार्यता का विरोध कर रहे हों, मार्च 2017 तक देश की करीब 130 करोड़ की आबादी में से 112 करोड़ ने आधार कार्ड या तो हासिल कर लिया था या उसके लिए पंजीकृत हो चुके थे। इस लिहाज से देखें तो आधार कार्ड के सामान्य सेहत पर इस फैसले से कोई असर तो नहीं पड़ने जा रहा, लेकिन चूंकि अब निजता का अधिकार भी संवैधानिक मौलिक अधिकार बन गया है तो कुछ चीजों पर असर पड़े बिना नहीं रहेगा। इसके बाद अब आधार कार्ड की अनिवार्यता को लागू करने के फैसले को भी निजता के इस अधिकार की कसौटी पर परखा जाएगा। सरकार को अब इस दिशा में बेहद सावधानी से फैसले लेने होंगे। जन कल्याण कार्यक्रमों से लाभ प्राप्त करने से लेकर हवाई यात्र तक के लिए आधार कार्ड अनिवार्य करने के सरकार के प्रयासों को तर्कसंगत आधार पर तैयार करना होगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जिस तरह हर अधिकार पूर्ण नहीं होता, उसी तरह निजता का आधार भी पूर्ण नहीं होगा। जिस तरह जघन्य अपराधों में दोष साबित होने के बाद दोषी के जीवन का अधिकार मुल्तवी हो जाता है, उसी तरह दोषी पाए जाने पर भी व्यक्ति के निजता का अधिकार भी निरस्त हो जाएगा। दूसरी तरफ सरकार को अदालत ने अधिकार दिया है कि निजता के अधिकार पर रोक के लिए उसके पास तार्किक आधार होना चाहिए। इसका मतलब हुआ कि ऐसे हर कानून का विश्लेषण और परीक्षण निजता के अधिकार के चश्मे से ही होगा।

इसका एक असर तो यह भी पड़ेगा कि अब नागरिक की निजी जानकारी बिना उसकी सहमति के सार्वजनिक नहीं हो सकेगी। यानी आधार, पैन, क्रेडिट कार्ड आदि में दर्ज जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी। अगर ऐसा नहीं होता है तो निजता के हनन की स्थिति में नागरिक के पास अदालत जाने का अधिकार होगा। चूंकि निजता को भी मूल अधिकार मान लिया गया है, इसलिए अब अनुच्छेद-32 या 226 के तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में याचिका दायर करके लोग निजता की सुरक्षा की मांग भी कर सकेंगे। हाल के दिनों में बढ़े सूचना प्रौद्योगिकी के चलते सूचना प्रौद्योगिकी कानून यानी आईटी एक्ट में भी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स (आई.एस.पी.) की निजता नीति निर्धारित की गई है। इस कानून की धारा 43, 43-ए, 72-ए के तहत आंकड़ों के सुरक्षा का प्रावधान है।(DJ)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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