सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। नौ जजों वाली संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया है। पीठ ने कहा कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। यह बहस तब शुरू हुई जब केंद्र सरकार ने आधार मामले में कहा था कि निजता यानी प्राइवेसी का अधिकार मौलिक अधिकारों में शामिल नहीं। जाहिर सी बात है, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सभी स्वागत करते हैं। खासकर औरतें। बेशक, औरतों के लिए निजता का अधिकार बहुत मायने रखता है। निजता और निजता के अधिकार ने महिलाओं की कई अर्थो में मदद की है। निजता आजाद और अच्छी जिंदगी का रास्ता दिखाती है। निजता की इसी अवधारणा के जरिए नियम-कानून की विवेचना करके महिलाओं के अधिकारों की रक्षा होती है। मिसाल के तौर पर दिल्ली गैंगरेप के बाद 2013 में बलात्कार कानून में जो संशोधन किए गए (आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013), उनका आधार महिलाओं की निजता और उसका संरक्षण करना ही था। इन संशोधनों में शारीरिक रूप से पीछा करने के अलावा साइबर स्टॉकिंग का विशेष उल्लेख किया गया। यह साफ किया गया कि सरकार यह मानती है कि पीड़ित महिला के लिए निजता का कितना महत्त्व होता है। महिलाओं की निजता का हनन करने के कई तरीके लोग अपनाते हैं। गली-मोहल्ले में छेड़छाड़ करने से आगे बढ़ते हुए उनका पीछा करना और उन्हें चोरी-छिपे देखना भी औरतों की निजता का ही हनन है। कानून में किए गए संशोधनों में ये सभी शामिल हैं। चोरी-छिपे देखने वालों से निपटने के लिए कानून में कहा गया है कि वॉइयूरिज्म (ताक-झांक) या किसी ऐसी स्थिति में महिला की जासूसी करना, जिसमें उसे निजता की उम्मीद है, एक अपराध है। इसी के आधार पर अप्रैल 2016 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने शैलेश नामक एक शख्स को एक साल की सजा दी थी और 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था। चूंकि वह शौचालय में एक महिला को छिपकर देख रहा था। इसी संशोधन के चलते बलात्कार पीड़ित की सेक्सुअल हिस्ट्री पूछने का रिवाज भी खत्म हुआ। अक्सर लड़की के चरित्र पर उंगलियां उठाई जाती हैं और उसे दुश्चरित्र मानकर फैसले किए जाते हैं।
1979 का मशहूर मथुरा बलात्कार मामला तो इसकी नजीर ही है। इस मामले में 16 साल की आदिवासी लड़की मथुरा का पुलिस हिरासत में बलात्कार हुआ था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने दो हवलदारों को यह कहकर बरी कर दिया था कि लड़की चूंकि यौन संबंध की आदी रही है, इसलिए उसका बलात्कार नहीं हो सकता। इस मामले में जब समाज सेवियों और वकीलों ने विरोध दर्ज किया तो आपराधिक कानून में ही संशोधन किया गया। कहा गया कि अगर लड़की ने कहा कि उसकी सहमति नहीं थी, तो अदालत भी यह मानेगी कि उसकी सहमति नहीं थी। इसी निजता के अधिकार का ध्यान रखते हुए बलात्कार पीड़िता का नाम गोपनीय रखा जाता है। उसका बयान प्राइवेट में लिया जाता है। आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 164 कहती है कि पुलिसवाले उस पर इस बात का दबाव नहीं बना सकते कि वे लोगों के बीच अपना बयान दे। महिलाओं के लिए इसीलिए निजता का अधिकार बहुत मायने रखता है। इसी के दम पर रिवेंज पोर्न की घिनौनी प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सकती है। इसी साल अप्रैल में दिल्ली विविद्यालय की एक छात्रा ने रिवेंज पोर्न के डर से आत्महत्या कर ली थी। इस समय साइबर बुलिंग पर तो कानून है पर रिवेंज पोर्न पर नहीं। चूंकि रिवेंज पोर्न को अपराध घोषित करने के लिए पीछे भी एक ही धारणा काम करती है- महिला की निजता का अधिकार।
निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है, इसीलिए आईपीसी की धारा 377 के तहत कुछ सेक्सुअल एक्ट्स को अपराध घोषित नहीं किया जाना चाहिए। इस धारा के तहत महिलाओं, पुरु षों और जीव-जंतुओं के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाना अपराध है। इसी आधार पर समलैंगिकों को अपराधी घोषित करने की आशंका बनी रहती है। निजता के अधिकार का हक सभी को है, और सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी पुष्टि की है, क्योंकि इसके साथ महिलाएं मजबूत होती हैं। हर संघर्ष में यह अधिकार उनका साथ देता है, क्योंकि लड़ाई अभी बहुत लंबी है। इसीलिए यह हथियार तेज धार होना बहुत जरूरी है।

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