जैविक खेती नए जमाने की नई शुरुआत
जैविक खेती नए जमाने की नई शुरुआत
अगर आप युवा हैं तो आपके लिए जैविक खेती एक अच्छा विकल्प है। इससे किसानों को कम लागत में उच्च गुणवत्ता की फसल प्राप्त होती है। देश भर में बड़ी संख्या में युवाओं ने इसमें सुरक्षित व लाभकारी भविष्य को देखते हुए खुद को आजमाना शुरू किया है। सभी के लिए हितकर नए जमाने की इस खेती के बारे में बता रहे हैं संजीव चन्द
भारत की खेती मानसून पर आधारित है। मानसून अच्छा और मजबूत हुआ तो बाजार भी मजबूत होता है। ऐसे में जैविक खेती उन क्षेत्रों के लिए भी फायदे का सौदा साबित हुई है, जो वर्षा पर आधारित हैं। 2001-02 में मध्य प्रदेश में जैविक खेती का आंदोलन चलाकर प्रत्येक जिले के प्रत्येक ब्लॉक में एक-एक गांव में जैविक खेती शुरू की गई और इन गांवों को 'जैविक गांव' का नाम दिया गया।
क्या है जैविक खेती
जैविक खेती वह सदाबहार कृषि पद्धति है, जो पर्यावरण की शुद्धता बरकरार रखती है, भूमि के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखती है, मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ाती है, इसमें रसायनों का उपयोग कम होता है और कम लागत में गुणवत्तापूर्ण उत्पादन होता है। इस पद्धति में रासायनिक उर्वरकों, रासायनिक कीटनाशकों तथा खरपतवारनाशकों की बजाय गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद, बैक्टीरिया कल्चर, जैविक खाद, जैविक कीटनाशकों जैसे साधनों से खेती की जाती है। अंतरराष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिक प्रो. बैजनाथ सिंह का कहना है कि मिट्टी में असंख्य जीव रहते हैं, जो एक-दूसरे के पूरक तो होते ही हैं, साथ ही पौधों के विकास के लिए पोषक तत्व भी उपलब्ध कराते हैं। जैविक खेती का मूल उद्देश्य तेजी से बढ़ती जनसंख्या के मद्देनजर मृदा संरक्षण की प्रक्रियाएं अपनाते हुए जैविक तरीकों से कीट व रोग पर नियंत्रण रखते हुए दलहनी फसलों के उत्पादन को बढ़ाना है, ताकि लोगों को सुरक्षित स्वास्थ्यकारी कृषि उत्पाद उपलब्ध हो सकें और साथ ही कृषि प्रक्रियाओं में पर्यावरण व प्राकृतिक संसाधनों की कम से कम क्षति हो।
ऐसे तैयार करें जैविक खाद
भारत में पहले से ही गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद और जैविक खाद का प्रयोग विभिन्न फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है। जैविक खाद बनाने के लिए पौधों के अवशेष, गोबर, जानवरों का बचा हुआ चारा आदि सभी वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए। जैविक खाद बनाने के लिए 10 फुट लम्बा, 4 फुट चौड़ा व 3 फुट गहरा गड्ढा करना चाहिए। सारे जैविक पदार्थों को अच्छी तरह मिलाकर गड्ढे को भरना चाहिए तथा उपयुक्त पानी डाल देना चाहिए। गड्ढे में पदार्थों को 30 दिन के बाद अच्छी तरह पलटना चाहिए और उचित मात्रा में नमी रखनी चाहिए। यदि नमी कम है तो पलटते समय पानी डाला जा सकता है। पलटने की क्रिया से जैविक पदार्थ जल्दी सड़ते हैं और खाद में पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है। इस तरह यह खाद तीन महीने में बनकर तैयार हो जाती है।
युवाओं ने संभाली कमान
बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पंजाब के कई प्रतिभाशाली युवा उच्च शिक्षा ग्रहण करने के बाद जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए आगे आए हैं। ये खुद तो जैविक खेती कर ही रहे हैं, आसपास के कई गांवों के युवाओं को इससे जोड़कर जागरूक कर रहे हैं। कुछ युवाओं ने इंजीनियर व डॉक्टरी की नौकरी छोड़ बाकायदा संगठन बनाकर जैविक खाद बनाने और किसानों को जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। खेती के जरिए बिजनेस और एंटरप्रेन्योरशिप से न सिर्फ युवाओं को फायदा हो रहा है, बल्कि दूसरों को रोजगार भी मिला है। गांव में काम की तलाश कर रहे युवाओं को यहां काम दिया जाता है।
मांग के मुताबिक बदलें किसान
जैविक खेती के रूप में किसानों का भविष्य उज्ज्वल है, लेकिन इसके लिए उनको लीक से हटकर काम करना होता है। जैविक खेती के दौरान शुरुआत में उत्पादन में कुछ गिरावट और खेती को पटरी पर आने में कुछ समय लग सकता है। किसानों को इसके लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा। जैविक खेती के जरिए सब्जी उगा रहे हैं तो बदल-बदल कर (रोटेशन में) सब्जी बोएं। एक ही सब्जी बार-बार बोने से उपज कम हो जाती है।
सेहत के लिए भी बेहतर
जैविक खेती के दायरे में खाने-पीने की वे चीजें आती हैं, जिन्हें कृत्रिम खाद, कृत्रिम कीटनाशक या कृत्रिम हॉर्मोन की मदद के बगैर तैयार किया जाता है। ये कुदरती तरीके से तैयार चीजें होती हैं। इनसे तैयार चीजों में जिंक और आयरन जैसे खनिज तत्व बड़ी मात्रा में मौजूद होते हैं और ये सेहत के लिहाज से काफी उपयोगी हैं, क्योंकि रासायनिक खाद व कीटनाशकों का धड़ल्ले से इस्तेमाल न सिर्फ जमीन की सेहत के लिए हानिकारक है, बल्कि इनसे तैयार कृषि उत्पाद इंसानों व जानवरों की सेहत पर भी बुरा असर डालते हैं।
उम्मीद जता रहे आंकड़े
एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में साढ़े तीन करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि पर करीब 14 लाख उत्पादक जैविक खेती कर रहे हैं। कृषि भूमि का करीब दो-तिहाई हिस्सा घास वाली भूमि है। फसल वाला क्षेत्र 82 लाख हेक्टेयर है जो कुल जैविक कृषि भूमि का एक-चौथाई है। भारत में वर्ष 2003-04 में जैविक खेती को लेकर गंभीरता दिखाई गई और 42,000 हेक्टेयर क्षेत्र से जैविक खेती की शुरुआत हुई। मार्च 2010 तक यह बढ़कर 10 लाख 80 हजार हेक्टेयर हो गया। मार्च 2015 तक इसमें काफी इजाफा हुआ है। भारत में जैविक निर्यातों में अनाज, दालें, शहद, चाय, मसाले, तिलहन, फल, सब्जियां, कपास के तन्तु, कॉस्मेटिक व बॉडीकेयर उत्पाद शामिल हैं।
योजनाएं बन रहीं सहायक
जैव उत्पाद की महत्ता को देखते हुए कृषि मंत्रालय देश में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना, राष्ट्रीय बागवानी मिशन, पूर्वोत्तर के लिए प्रौद्योगिकी मिशन और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना संचालित कर रहा है। राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना, गाजियाबाद स्थित राष्ट्रीय जैविक खेती केंद्र तथा बेंगलुरू, भुवनेश्वर, हिसार, इंफाल, जबलपुर और नागपुर स्थित छह क्षेत्रीय केंद्रों के माध्यम से अक्तूबर 2004 में लागू की गई है। इसी तरह राष्ट्रीय बागवानी मिशन और पूर्वोत्तर के लिए प्रौद्योगिकी मिशन के तहत जैविक बागवानी के लिए अधिकतम 10 हजार रुपए प्रति हेक्टेयर की लागत से 50 फीसदी की दर पर (प्रति लाभार्थी 4 हेक्टेयर तक) सहायता दी जाती है।
जैविक खेती के महत्व
- भूमि की उर्वराशक्ति में स्थिरता और वृद्धि
- भूमि की गुणवत्ता में सुधार
- प्रदूषण रहित जैविक खेती
- कम पानी की आवश्यकता
- पशुओं का अधिक महत्व
- फसल अवशेष को खपाने की समस्या नहीं
- अच्छी गुणवत्ता की पैदावार
- कृषि मित्र जीव सुरक्षित व संख्या में बढ़ोतरी
- स्वास्थ्य में सुधार
- कम लागत और अधिक लाभ
10 गुण जो बनाएंगे सफल
- जैविक शुद्धता
- हमेशा सीखने का कौशल
- बिजनेस की समझ
- मैनेजमेंट का कौशल
- संगठनात्मक कौशल
- मैकेनिकल नॉलेज
- शारीरिक मजबूती
- इंटरपर्सनल स्किल्स
- शांतचित्त दिमाग
विशेषज्ञ की राय में
छोटे स्तर से कर सकते हैं शुरुआत
जैविक खेती समय की सबसे बड़ी जरूरत है। इन दिनों लोग रासायनिक खाद पर ही पूरी तरह से निर्भर हैं। यूरोप, जापान व अमेरिका जैसे देशों में बच्चों में कैंसर के अधिक मामले आने पर अब पांच साल तक के बच्चों के लिए जैविक खाद्य पदार्थ अनिवार्य कर दिए गए हैं। जबकि भारत में ऐसा नहीं है। लोग रासायनिक खाद पर ही पूरी तरह से निर्भर हैं। इन सब की रोकथाम जैविक खेती से संभव है। इसके लिए सबसे जरूरी है कि किसान के पास जैविक बीज और जैविक खाद की उपलब्धता हो। अभी भी लोगों का मानना है कि जैविक खेती के लिए बड़े पैमाने पर जमीन की जरूरत होती है। जबकि वास्तविकता यह है कि यह खेती छोटे से भूभाग पर भी की जा सकती है।
किसान चाहें तो शुरुआत में अपने परिवार के लिए जैविक फसल उगा सकते हैं। बाद में वे इसे बड़ा आकार या व्यावसायिक रूप दे सकते हैं। इसके जरिए शुरू में गेहूं, धान, सब्जी, मक्का, अरहर व चना आदि की खेती की जा सकती है। जैविक खेती की सबसे बड़ी शर्त यह है कि इसमें रासायनिक खाद का नाममात्र भी प्रयोग नहीं होता। खाद के नाम पर इसमें नीम व सरसों की खली, नीम का तेल, वर्मी कम्पोस्ट को प्रयोग में लाया जाता है। जैविक खाद के लिए ढैंचा सबसे अच्छा विकल्प होता है। ढैंचा मई-जून में बोया जाता है तथा करीब 30-40 दिन के बाद इसे पलट दिया जाता है। इसके बाद धान की रोपाई कर सकते हैं।
प्रो. बैजनाथ सिंह, अंतरराष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिक।

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