Tuesday, August 29, 2017

कानून से निजता सीमित करने की गुंजाइश बाकी - (रवींद्र गरिया) (साभार दैनिक भास्कर)

सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में प्राइवैसी यानी निजता के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन के अधिकार का हिस्सा मानते हुए उसे मूलभूत अधिकार घोषित किया है। यह फैसला कई मायने में महत्वपूर्ण है। अब तक निजता के अधिकार को लेकर उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों में अलग-अलग राय व्यक्त हुई थी। कई फैसलों में निजता के अधिकार को महत्वपूर्ण अधिकार तो माना गया है लेकिन, इसे स्पष्ट रूप से संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार नहीं कहा गया। अब इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार माने जाने से निजता के अधिकार का दर्जा मूलभूत अधिकार का हो गया है।
इसके साथ यह तय हो गया है कि जब तक कोई ऐसा न्यायसंगत कानून और प्रक्रिया हो, जो किसी की निजता में ताक-झांक की इजाजत देती हो तब तक इस अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। मसलन, बिना यह बताए कि भारत की संसद या विधानसभा ने कौन-सा ऐसा कानून पारित किया है, जिसके तहत कोई सरकारी संस्था या पुलिस आदि किसी की निजता में हस्तक्षेप कर सकती है, ऐसा कोई दखल संभव नहीं है। किसी निजी संस्थान जैसे बैंक, मोबाइल कंपनी, अस्पताल आदि को यह इजाजत बिल्कुल नहीं होगी कि वह किसी दूसरी संस्था या व्यक्ति के साथ ऐसी जानकारी साझा कर सके। हालांकि अभी ऐसे कानून नहीं है कि निजता के उल्लंघन के मामलों के लिए किसी को जेल जाना पड़े या सजा हो। किंतु निजता को मौलिक अधिकार माने जाने के बाद कानूनी तौर पर इसके उल्लंघन पर रोक लगाने की मांग की जा सकती है और मुआवजे का दावा भी किया जा सकता है।
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया है कि निजता के अधिकार का जिक्र संविधान में मूलभूत अधिकार के बतौर होने की वजह से इसे मूलभूत अधिकार नहीं माना जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने तो यहां तक कह दिया कि यह अधिकार सभी मनुष्यों को इसलिए है, क्योंकि वे मनुष्य है और मनुष्य के तौर पर यह उनका नैसर्गिक अधिकार है। किसी भी मनुष्य को उसके नैसर्गिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है। यह नैसर्गिक अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है।
इस तरह निजता के अधिकार को कानूनी सुरक्षा है या नहीं, यह बहस खत्म हो गई है लेकिन, राज्य को नए कानून बनाकर इस अधिकार को सीमित करने की गुंजाइश अभी बाकी है। देखना यह है कि जब सरकारें किसी कानून की आड़ में निजता के उल्लंघन की कोशिश करेंगी और कहेंगी की संविधान उन्हें कानून बनाने की इजाजत देता है तो अदालतें और समाज इस तरह के कानूनों को कितना न्यायसंगत मानेगा या बर्दाश्त करेगा। मसलन, मौजूदा फैसले की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि आधार कार्ड की अनिवार्यता को निजता का उल्लंघन बताने वाले कई मसले अदालत के सामने आए। सुप्रीम कोर्ड के पहले के फैसलों में भिन्न राय होने के कारण मसले को सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ के पास भेजना पड़ा। अब नौ जजों की पीठ के फैसले के बाद यह मसला वापस सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के पास जाएगा, जिसे यह तय करना है कि आधार कार्ड के जरिये लोगों की निजी सूचना सरकार के द्वारा इकट्‌ठा करना जायज़ है अथवा नहीं। और यदि जायज़ भी है तो किस हद तक पुलिस, सेना, बैंक, कर विभाग आदि जैसी सरकारी एजेंसियां इस बायोमेट्रिक निजी जानकारी को हासिल करने अथवा इस्तेमाल करने का हक होगा।
आमतौर पर ये सरकारी एजेंसियां अपराध की रोकथाम या राष्ट्रीय सुरक्षा का अस्पष्ट-सा कारण देकर नागरिकों की निजता के उल्लंघन को जायज़ बताती रही हैं। राज्यों की पुलिस और केंद्र में सीबीआई तथा आयकर विभाग को लेकर लगातार यह धारणा और शंका बनी हुई है कि ये संस्थाएं सत्तारूढ़ दल के इशारे पर राजनीतिक विरोधियों को दबाने या मटियामेट करने के लिए भी काफी तत्परता से काम करती हैं। किसी ऐसे कानून के बनाए जाने की आशंका खारिज नहीं की जा सकती कि किसी भी तरह की अनैतिक (भले ही वह गैर-कानूनी हो) या किसी कानून के उल्लंघन की शंका मात्र होने पर आधार, क्रेडिट कार्ड, मोबाइल आदि पर लगातार निगरानी की इजाजत दे दी जाए। तब सरकार से अलग थोड़ी भी राय रखना या सत्तारूढ़ दल की नीति की आलोचना करना भी मुसीबत का सबब बन जाएगा। यह देश को निरंकुश तानाशाही की ओर भी ले जा सकता है। यूं तो मनुष्य की निजता का अधिकार किसी व्यक्ति ा निजी अधिकार या निजी हानी-लाभ का मामला नहीं है। निजता का अधिकार समाज में विभिन्न मतों, नए विचारों, अभिव्यक्ति की आज़ादी, स्वस्थ आलोचना, लोकतांत्रिक विमर्श और सामाजिक, राजनीतिक नैतिक प्रगति की केवल आवश्यक शर्त है बल्कि जरूरी बुनियाद है।
लेकिन एक बात ध्यान में रखना है कि यह फैसला आधार के मसले पर सरकार को कोई तमाचा नहीं है। पीठ ने फैसले में कहा है कि, 'सूचनागत निजता, निजता के अधिकार का एक पहलू है।' यह स्वीकारते हुए सरकार से आग्रह किया गया है कि वह डेटा प्रोटेक्शन की मजबूत व्यवस्था स्थापित करें। उसे व्यक्तियों के हितों और राज्य की जायज़ चिंताओं के बीच संतुलन स्थापित करना होगा। ये जायज़ चिंताएं भी फैसले में स्पष्ट हैं- राष्ट्रीय सुरक्षा को संरक्षण, अपराध रोकना उसकी जांच करना, इनोवेशन ज्ञान के प्रसार को प्रोत्साहन देना और सबसे बड़ी बात सामाजिक कल्याण के फायदों को बर्बाद होने से बचाना यानी लाभान्वितों तक पहुंचाना। जजों ने कहा है, 'ये नीतिगत मामले हैं, जिस पर केंद्र सरकार को विचार करना है।'
एक बात और। निजता के अधिकार की तरह जानने का अधिकार भी जीवन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का अविभाज्य तत्व है। आकड़ों पर गौर करें तो हर साल निजता और निजी जानकारी के संरक्षण के बहाने दर्जनों आरटीआई याचिकाएं खारिज कर दी जाती हैं। इस पर भी गौर करना होगा। (येलेखक के अपने विचार हैं)

No comments:

Post a Comment