सर्वोच्च अदालत की नौ सदस्यीय पीठ ने बारह अंकीय बायोमीट्रिक पण्राली यूनिक आइडेंटिफिकेशन (यूआईडी)/आधार संख्या परियोजना संबंधी मामले में फैसला देते हुए कहा है, ‘‘निजता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्निहित अंग के रूप में संरक्षित है, और भारत के संविधान के भाग तीन द्वारा प्रत्याभूत स्वतंत्रताओं का हिस्सा है।’ अदालत ने भारत के अटॉर्नी जनरल के इस तर्क का संज्ञान लिया कि भारत का संविधान निजता के अधिकार का संरक्षण नहीं करता जिस करके भारतीयों को यूआईडी/आधार संख्या के लिए पंजीकृत कराने को विवश किया गया। यूआईडी/आधार संख्या जर्मनी, चीन, फ्रांस, यूके और अमेरिका जैसे देशों में नामंजूर की जा चुकी है। यह फैसला आधार एक्ट, 2016 पर गंभीर प्रभाव डालेगा जिसके तहत सरकार को भारतीयों की यूआईडी/आधार संख्याओं को उनकी सहमति लिए बिना डिएक्टिवेट करने का अधिकार है। संभवत: यूआईडी/आधार संख्या की सेंट्रल आइडेंटिटीज डाटा रिपोजिटरी (सीआईडीआर) और आधार एक्ट को नागरिकों के निजता के अधिकार का उल्लंघन करने वाले करार दे दिया जाए।
अनुचित कानून मान्य नहीं हो सकता। अदालत के रुख से लगा कि जैसे अनुचित कानून काले कानून हैं। अदालत के फैसले से अभी जारी विश्व व्यापार संगठन की वार्ता बैठक के लिए सकारात्मक प्रभाव होंगे जो ई-कॉमर्स को लेकर हो रही है, जिसमें विकसित देशों ने तमाम नागरिकों के डाटा तक आसान पहुंच का मंतव्य जतलाया है। यह दौर ऐसा है, जब सेवाओं का उबेर-आइजेशन और ओला-आइजेशन हो रहा है। और ऐसे प्रयास हो रहे हैं जिनसे वस्तुओं और सेवाओं को नये सिरे से परिभाषित किया जा सके। नागरिकों के डाटा तक पहुंच की यह मांग विश्व व्यापार संगठन की कार्यवाही के दौरान उठी है। यूआईडी/आधार संख्या परियोजना सफरान ग्रुप, एक्सेंटर, अनस्र्ट एंड यंग (फ्रांस), अमेरिका तथा युनाइटेड किंग्डम देशों की बायोमीट्रिक टेक्नोल्ॉजी कंपनियों के सहयोग से क्रियान्वित की जा रही है। ये कंपनियां प्रति पंजीकरण 2.75 रुपये वसूल रही हैं, और 130 करोड़ वर्तमान और भावी भारतीयों का पंजीकरण होना है। स्पष्ट प्रतीत होता है कि विदेशी प्रभाव के चलते केंद्र सरकार का रुख शुरू से ही कपटपूर्ण रहा है।
आज तक इस परियोजना के कुल अनुमानित बजट को जाहिर नहीं किया गया है। जब तक इस परियोजना का कुल अनुमानित बजट नहीं बताया जाता है, तब तक इससे होने वाले तमाम दावों को संदेह की दृष्टि से ही देखा जाएगा। ज्ञातव्य है कि जस्टिस जे. चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के यूआईडी/आधार संख्या मामले में 11 अगस्त, 2015 को पारित आदेश पर सात सौ से ज्यादा दिनों पश्चात 18 जुलाई, 2017 को सुनवाई हुई।
वादी और प्रतिवादी का पक्ष सुनने के उपरांत संविधान पीठ ने आदेश पारित किया : अदालत ने सितम्बर, 2013 से 27 जून, 2017 के बीच जारी अपने तमाम आदेशों में स्पष्ट किया है कि यूआईडी/आधार संख्या स्वैच्छिक है। इसलिए किसी को किसी कार्य के लिए यूआईडी/आधार संख्या प्रस्तुत करने को नहीं कहा जा सकता। आधार एक्ट, 2016 के तहत भी ऐसा किया जाना अनिवार्यत: नहीं है। निजता स्वतंत्रता के अधिकार में अंतर्निहित है। संविधान सभा के निजता को लेकर रुख में संभवत: व्याख्या संबंधी सीमाएं आड़े आई हों। अदालत का फैसला डिजिटल दुनिया-ई-कॉमर्स और डाटा संरक्षण-पर भी लागू होता है। नौ सदस्यीय पीठ में भारत के प्रधान न्यायाधीश, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस एसए बोब्डे, जस्टिस आरके अग्रवाल, जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन, जस्टिस अभय मनोहर सप्रे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे। निजता और आधारभूत ढांचे संबंधी बुनियादी अधिकार पीठ की न्यायशास्त्रीय कल्पना से जाहिर होते हैं। स्पष्ट होता है कि अदालत ने ‘‘असंवैधानिक स्थिति’ के निषेध के सिद्धांत को लागू किया है, जिसका अर्थ हुआ कि सरकार की कोई इमदाद पाने के लिए लाभान्वित को प्राप्त कुछ संवैधानिक अधिकारों का परित्याग का निषेध।
स्पष्ट है कि यूआईडी/आधार का क्रियान्वयन ऐसी कवायद है, जिसे हमारा संविधान वर्जित करार देता है। अदालत के पूर्व में पारित आदेशों को अनदेखा करते हुए और 9 जून, 2017 को जस्टिस एके सीकरी की अध्यक्षता वाली पीठ के फैसले जिसे 27 जून, 2017 को भी दोहराया गया, से अनभिज्ञ यूआईडी/आधार प्रवर्तक वैधानिक रूप दोषपूर्ण सकरुलरों, विज्ञापनों और एसएमएस के जरिए इस परियोजना के कार्यान्वयन में जुटे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही संबद्ध मामले एसएलपी (सीआरआई) 2524/2014- यूआईडीएआई बनाम सीबीआई-में 24 मार्च, 2014 को एक आदेशपारित किया था : ‘‘किसी पात्र/योग्य व्यक्ति को आधार संख्या न होने की सूरत में किसी सेवा से वंचित नहीं किया जा सकता।
सभी प्राधिकरणों को निर्देश देते हैं कि अपने फॉर्म/सकरुलर/लाइक्स को संशोधित कर लें ताकि अदालत के अंतरित आदेश की पालना के मद्देनजर भविष्य में आधार संख्या की अनिवार्यत: न रहने पाए।’ असंवैधानिक स्थितियां सरकार को अपने नागरिकों को लाभों से वंचित रखने को उस स्थिति में निषिद्ध करती हैं, किसी लाभ तक पहुंच के लिए नागरिक को अपने किसी मूल अधिकार से वंचित होना पड़ जाता हो। लोक सभा की वित्त विभाग संबंधी संसदीय स्थायी समिति और उसके बाद राज्य सभा द्वारा यूआईडी/आधार संख्या को मिले झटके उपरांत अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ की व्यवस्था से भी अब सरकार को झटका लगा है। नौ सदस्यीय पीठ के फैसले के पश्चात एक अन्य पीठ यूआईडी/आधार की संवैधानिकता की बाबत फैसला करेगी। यह पीठ आधार एक्ट को मनी बिल के तौर पर पारित किए जाने को भी संवैधानिकता की कसौटी पर कसेगी।
(लेखक सिटीजंस फोरम फॉर सिविल लिबर्टीज के सदस्य हैं)
अनुचित कानून मान्य नहीं हो सकता। अदालत के रुख से लगा कि जैसे अनुचित कानून काले कानून हैं। अदालत के फैसले से अभी जारी विश्व व्यापार संगठन की वार्ता बैठक के लिए सकारात्मक प्रभाव होंगे जो ई-कॉमर्स को लेकर हो रही है, जिसमें विकसित देशों ने तमाम नागरिकों के डाटा तक आसान पहुंच का मंतव्य जतलाया है। यह दौर ऐसा है, जब सेवाओं का उबेर-आइजेशन और ओला-आइजेशन हो रहा है। और ऐसे प्रयास हो रहे हैं जिनसे वस्तुओं और सेवाओं को नये सिरे से परिभाषित किया जा सके। नागरिकों के डाटा तक पहुंच की यह मांग विश्व व्यापार संगठन की कार्यवाही के दौरान उठी है। यूआईडी/आधार संख्या परियोजना सफरान ग्रुप, एक्सेंटर, अनस्र्ट एंड यंग (फ्रांस), अमेरिका तथा युनाइटेड किंग्डम देशों की बायोमीट्रिक टेक्नोल्ॉजी कंपनियों के सहयोग से क्रियान्वित की जा रही है। ये कंपनियां प्रति पंजीकरण 2.75 रुपये वसूल रही हैं, और 130 करोड़ वर्तमान और भावी भारतीयों का पंजीकरण होना है। स्पष्ट प्रतीत होता है कि विदेशी प्रभाव के चलते केंद्र सरकार का रुख शुरू से ही कपटपूर्ण रहा है।
आज तक इस परियोजना के कुल अनुमानित बजट को जाहिर नहीं किया गया है। जब तक इस परियोजना का कुल अनुमानित बजट नहीं बताया जाता है, तब तक इससे होने वाले तमाम दावों को संदेह की दृष्टि से ही देखा जाएगा। ज्ञातव्य है कि जस्टिस जे. चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के यूआईडी/आधार संख्या मामले में 11 अगस्त, 2015 को पारित आदेश पर सात सौ से ज्यादा दिनों पश्चात 18 जुलाई, 2017 को सुनवाई हुई।
वादी और प्रतिवादी का पक्ष सुनने के उपरांत संविधान पीठ ने आदेश पारित किया : अदालत ने सितम्बर, 2013 से 27 जून, 2017 के बीच जारी अपने तमाम आदेशों में स्पष्ट किया है कि यूआईडी/आधार संख्या स्वैच्छिक है। इसलिए किसी को किसी कार्य के लिए यूआईडी/आधार संख्या प्रस्तुत करने को नहीं कहा जा सकता। आधार एक्ट, 2016 के तहत भी ऐसा किया जाना अनिवार्यत: नहीं है। निजता स्वतंत्रता के अधिकार में अंतर्निहित है। संविधान सभा के निजता को लेकर रुख में संभवत: व्याख्या संबंधी सीमाएं आड़े आई हों। अदालत का फैसला डिजिटल दुनिया-ई-कॉमर्स और डाटा संरक्षण-पर भी लागू होता है। नौ सदस्यीय पीठ में भारत के प्रधान न्यायाधीश, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस एसए बोब्डे, जस्टिस आरके अग्रवाल, जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन, जस्टिस अभय मनोहर सप्रे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे। निजता और आधारभूत ढांचे संबंधी बुनियादी अधिकार पीठ की न्यायशास्त्रीय कल्पना से जाहिर होते हैं। स्पष्ट होता है कि अदालत ने ‘‘असंवैधानिक स्थिति’ के निषेध के सिद्धांत को लागू किया है, जिसका अर्थ हुआ कि सरकार की कोई इमदाद पाने के लिए लाभान्वित को प्राप्त कुछ संवैधानिक अधिकारों का परित्याग का निषेध।
स्पष्ट है कि यूआईडी/आधार का क्रियान्वयन ऐसी कवायद है, जिसे हमारा संविधान वर्जित करार देता है। अदालत के पूर्व में पारित आदेशों को अनदेखा करते हुए और 9 जून, 2017 को जस्टिस एके सीकरी की अध्यक्षता वाली पीठ के फैसले जिसे 27 जून, 2017 को भी दोहराया गया, से अनभिज्ञ यूआईडी/आधार प्रवर्तक वैधानिक रूप दोषपूर्ण सकरुलरों, विज्ञापनों और एसएमएस के जरिए इस परियोजना के कार्यान्वयन में जुटे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही संबद्ध मामले एसएलपी (सीआरआई) 2524/2014- यूआईडीएआई बनाम सीबीआई-में 24 मार्च, 2014 को एक आदेशपारित किया था : ‘‘किसी पात्र/योग्य व्यक्ति को आधार संख्या न होने की सूरत में किसी सेवा से वंचित नहीं किया जा सकता।
सभी प्राधिकरणों को निर्देश देते हैं कि अपने फॉर्म/सकरुलर/लाइक्स को संशोधित कर लें ताकि अदालत के अंतरित आदेश की पालना के मद्देनजर भविष्य में आधार संख्या की अनिवार्यत: न रहने पाए।’ असंवैधानिक स्थितियां सरकार को अपने नागरिकों को लाभों से वंचित रखने को उस स्थिति में निषिद्ध करती हैं, किसी लाभ तक पहुंच के लिए नागरिक को अपने किसी मूल अधिकार से वंचित होना पड़ जाता हो। लोक सभा की वित्त विभाग संबंधी संसदीय स्थायी समिति और उसके बाद राज्य सभा द्वारा यूआईडी/आधार संख्या को मिले झटके उपरांत अब सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ की व्यवस्था से भी अब सरकार को झटका लगा है। नौ सदस्यीय पीठ के फैसले के पश्चात एक अन्य पीठ यूआईडी/आधार की संवैधानिकता की बाबत फैसला करेगी। यह पीठ आधार एक्ट को मनी बिल के तौर पर पारित किए जाने को भी संवैधानिकता की कसौटी पर कसेगी।
(लेखक सिटीजंस फोरम फॉर सिविल लिबर्टीज के सदस्य हैं)

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