Thursday, August 31, 2017

26 August 2017 (Saturday)

August 31, 2017 0
26 August 2017 (Saturday)

दैनिक समसामयिकी

1.भारत-जापान देंगे चीन को एक और संदेश : अगले महीने पीएम शिंजो एबी की भारत यात्रा  के दौरान होगी अहम घोषणा

• पहले भारत और अमेरिका के साथ मिल कर हिन्द  महासागर में बड़ा नौसैनिक अभ्यास और उसके बाद डोकलाम पर भारत का खुला समर्थन। जापान व भारत मिल कर चीन को कूटनीतिक संदेश देने का यह सिलसिला आगे भी जारी रखेंगे।
• अगले महीने जब जापान के पीएम शिंजो एबी भारत के साथ द्विपक्षीय रणनीतिक वार्ता के लिए आएंगे तो दोनो देशों के बीच श्रीलंका और ईरान में दो बंदरगाहों के निर्माण में सहयोग पर बात होगी। इन दोनो बंदरगाहों की खासियत यह है कि ये चीन की तरफ से दक्षिण एशिया में बनाये जा रहे दो बड़े बंदरगाहों के बिल्कुल करीब हैं।
• श्रीलंका में त्रिंकोमाली बंदरगाह और ईरान के चाबहार एयरपोर्ट के विकास पर भारत और जापान के बीच पहले भी बात हुई है लेकिन इस बार इसे ज्यादा ठोस तौर पर आगे बढ़ाया जाएगा। अप्रैल, 2017 में ही दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ था जिसमें एशिया, अफ्रीका में भी ढांचागत परियोजनाओं को संयुक्त तौर पर विकसित करने की बात थी। उस समझौते के बाद पहली बार पीएम नरेंद्र मोदी जापान के पीएम एबी से मिल रहे हैं।
• एबी की यात्रा  की तैयारियों में जुटे अधिकारियों का कहना है कि दूसरे देशों में संयुक्त तौर पर बंदरगाह और सड़क विकास परियोजना दोनो नेताओं के बीच होने वाली बातचीत में प्रमुख होगा।
• श्रीलंका में त्रिंकोमाली बंदरगाह को विकसित करने की रुचि भारत काफी पहले दिखा चुका है। यह चीन की तरफ से श्रीलंका में निर्मित हमबनतोता पोर्ट से 365 किलोमीटर की दूरी पर है। हमबनतोता पोर्ट को बनाने का प्रस्ताव पहले श्रीलंका ने भारत को ही दिया था लेकिन भारत की तरफ से रुचि नहीं दिखाने के बाद उसे चीन ने हासिल किया।
• अब भारत को इस पोर्ट के रणनीतिक महत्व के बारे में अहसास हुआ है और वह इसे जापान के सहयोग से श्रीलंका में दूसरे पोर्ट के निर्माण को लेकर ज्यादा देरी नहीं करना चाहता। हमबनतोता पोर्ट को लेकर पिछले महीने ही श्रीलंका व चीन के बीच नया समझौता हुआ है जिसके मुताबिक यह पोर्ट चीन को 99 वर्षो के लिए लीज पर दिया गया है।
• माना जाता है कि इससे चीन भारत की दक्षिणी समुद्री सीमा में हर जहाज के मूवमेंट पर नजर रख सकेगा।1मोदी और एबी के बीच चाबहार पोर्ट को लेकर पिछले वर्ष शुरुआती बातचीत हुई थी। उसके बाद दोनो देशों के संबंधित मंत्रलयों की तरफ से सहयोग का रोडमैप तैयार किया गया। इस पर सितंबर में होने वाली बैठक के बाद अंतिम रूप दिया जा सकता है।
• बताते चलें कि चाबहार पोर्ट चीन की तरफ से पाकिस्तान में बनाये जा रहे ग्वादर पोर्ट से कुछ ही दूरी पर होगा। कुछ ही हफ्ते पहले भारत के जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी अफगानिस्तान गये थे। गडकरी ने 18 महीने में पोर्ट के पहले चरण का काम पूरा करने की बात कही है। जापान के आने से पोर्ट निर्माण के लिए वित्त का प्रबंधन ज्यादा आसानी से हो सकेगा।

2. अनुच्छेद 35 ए की वैधानिकता पर सुनवाई दीवाली के बाद

• जम्मू कश्मीर के स्थायी निवासियों को संपत्ति और नौकरियों में विशेष अधिकार देने वाले संविधान के अनुच्छेद 35ए की वैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट दीवाली बाद सुनवाई करेगा। मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर सरकार की मांग स्वीकार कर ली। सरकार का आग्रह था कि सुनवाई दीवाली के बाद की जाए। पहले इस मामले पर 29 अगस्त को सुनवाई होनी थी।
• शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी व शोएब आलम ने मुख्य न्यायाधीश की पीठ के समक्ष मामले का जिक्र करते हुए सुनवाई चार सप्ताह टालने का अनुरोध किया। केंद्र सरकार ने भी मांग का विरोध नहीं किया, जिसके बाद कोर्ट ने 35ए की वैधानिकता से जुड़े सभी मामलों को दीवाली के बाद सुनवाई के लिए लगाने का निर्देश दिया।
• पिछली सुनवाई पर कोर्ट ने जरूरत पड़ने पर 35ए की वैधानिकता से जुड़े मामले को संविधान पीठ को विचार के लिए भेजने के संकेत दिए थे।
•  कोर्ट ने कहा था कि पहले इस पर तीन न्यायाधीशों की पीठ सुनवाई करेगी लेकिन अगर जरूरत महसूस हुई तो महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे को विचार के लिए संविधान पीठ को भेजा जा सकता है।
• सुप्रीम कोर्ट में तीन रिट याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें अनुच्छेद 35ए की वैधानिकता को चुनौती दी गई है। एक याचिका में कहा गया है कि इस अनुच्छेद को संविधान में शामिल करते समय तय प्रक्रिया का निर्वाहन नहीं हुआ। इस पर संसद में चर्चा और मंजूरी नहीं हुई। इसे राष्ट्रपति के आदेश से संविधान में शामिल किया गया है, इसलिए ये अनुच्छेद असंवैधानिक है।
• याचिकाकर्ता की दलील है कि राष्ट्रपति को किसी अनुच्छेद को संविधान में शामिल करने या हटाने का अधिकार नहीं है। इसके अलावा एक याचिका कश्मीरी पंडित महिलाओं ने भी डाल रखी है, जिसमें लिंग आधारित भेदभाव का आरोप लगाते हुए अनुच्छेद 35ए को निरस्त करने की मांग की गई है।
• महिलाओं का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में पैदा होने के बावजूद अगर वे बाहर के राज्य के पुरुष से शादी कर लेती हैं तो उनका राज्य में संपत्ति खरीदने, उसका मालिकाना हक रखने या अपनी पुस्तैनी संपत्ति अपने बच्चों को देने का अधिकार खत्म हो जाता है। बाहरी युवक से शादी करने के कारण उनकी राज्य की स्थायी नागरिकता खत्म हो जाती है, जबकि पुरुषों के साथ ऐसा नहीं है।
• राज्य के पुरुष अगर दूसरे राज्य की महिला से शादी करते हैं तो उस महिला को भी राज्य के स्थाई निवासी का दर्जा मिल जाता है। इस तरह अनच्छेद 35ए जम्मू कश्मीर की बेटियों के साथ लिंग आधारित भेदभाव करती है। अनुच्छेद 35ए जम्मू कश्मीर सरकार को राज्य का स्थायी नागरिक तय करने का हक देता है।

3. सरकारी लाभ के लिए अनिवार्य रहेगा आधार

• भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) ने कहा है कि करदाताओं के लिए अपने पैन को आधार से जोड़ने की निर्धारित समय सीमा कायम रहेगी। उच्चतम न्यायालय के निजता पर फैसले से इस आवश्यकता पर कोई प्रभाव नहीं होगा।
• यूआईडीएआई के सीईओ अजय भूषण पांडे ने यहां कहा कि सरकारी सब्सिडी, सामाजिक योजनाओं और अन्य लाभों का फायदा लेने के लिए आधार देने की अनिवार्यता भी फिलहाल जारी रहेगी। सरकार ने पैन को आधार से जोड़ने की समय सीमा बढ़ाकर 31 अगस्त कर दी है।
• यह पूछे जाने पर कि उच्चतम न्यायालय के फैसले से आधार और पैन को जोड़ने पर क्या असर होगा, पांडे ने कहा, पैन को आधार से जोड़ने को आयकर कानून में संशोधन के जरिए अनिवार्य किया गया है। कानून के तहत यह काम जारी रहेगा। इसमें कोई बदलाव नहीं होगा।
•  पांडे ने स्पष्ट किया कि चाहे आधार कानून के प्रावधानों के तहत हो या आयकर कानून या मनी लांड्रिंग कानून के तहत, विभिन्न समय सीमाओं का पालन करना होगा क्योंकि ये कानून वैध हैं। उन्होंने भरोसा जताया कि आधार कानून अपने डेटा सुरक्षा सेफगार्ड के जरिए निजता के मौलिक अधिकार के तहत खरा उतरेगा।
• पांडे ने यह भी कहा कि आधार के लिए नामांकन भी बिना किसी अड़चन के जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि आधार कानून में निजता की सुरक्षा के पहले से प्रावधान हैं। इसमें बिना संबंधित व्यक्ति की सहमति के डेटा को साझा नहीं किया जाता है।

4. अमेरिका चिंतित : आतंकियों के हाथ न लग जाएं परमाणु हथियार

• ट्रंप प्रशासन को इस बात की चिंता है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियार और सामग्री कहीं आतंकी समूहों के हाथ न लग जाएं। सामरिक हथियारों के विकास के साथ साथ यह चिंता और गहरी हो गई है। यह बात अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कही है।
• ट्रंप प्रशासन के इस वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि व्यापक समीक्षा के दौरान एक सबसे बड़ा मुद्दा क्षेत्र में पनप रहा परमाणु हथियारों से जुड़ा खतरा है जो लगातार र्चचा का विषय बना रहा और अमेरिका के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। सम्मेलन के दौरान अधिकारी ने संवाददाताओं से कहा कि यह मामला दक्षिण एशियाई रणनीति का बेहद संवेदनशील हिस्सा है।
• वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने कहा कि ट्रंप सरकार इस बात को लेकर चिंतित है कि पाकिस्तान में परमाणु हथियार और सामग्री आतंकी समूहों या लोगों के हाथ लग सकती हैं।
• अधिकारी ने बताया कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा सोमवार को घोषित की गई दक्षिण एशिया रणनीति में इस बात का जिक्र किया गया था कि परमाणु हथियार या उपकरण गलत हाथों में पड़ सकते हैं।
• उन्होंने बताया कि इन्हीं खतरों के कारण इन नीतियों में भारत और पाकिस्तान की आपसी बातचीत पर जोर दिया गया है।
• अधिकारी ने कहा, इसमें (दक्षिण एशिया नीति) दो परमाणु संपन्न देश, भारत और पाकिस्तान के बीच गहरे हो रहे तनाव को प्राथमिकता दी जा रही है, और उन तरीकों के बारे में विचार किया जा रहा है जिससे दोनों देशों के बीच के तनाव को कम किया जा सके और इनके बीच किसी भी तरह के सैन्य मुकाबले से बचा जा सके।
• अधिकारी ने बताया कि इस नीति में भारत और पाकिस्तान के बीच भरोसा पैदा करने के उपायों पर गौर किया गया है और उन्हें बातचीत के लिए प्रोत्साहित करना भी इसका हिस्सा है।
• ट्रंप ने सोमवार को अफगानिस्तान और दक्षिण एशिया की अपनी नीति में परमाणु हथियारों के खतरे की बात कही थी।
• राष्ट्र के नाम अपने पहले प्राइम टाइम संबोधन में उन्होंने कहा था अपनी ओर से पाकिस्तान अक्सर अराजक, हिंसक और आतंक के एजेंटों को सुरक्षित पनाह देता है। यह खतरा इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु हथियारों संपन्न देश हैं और दोनों के बीच तनावपूर्ण रिश्तों का युद्ध में तब्दील होने का खतरा है। और ऐसा हो सकता है।
• अमेरिकी विशेषज्ञ स्टीफन टैंकल ने हाल ही में सेंटर फॉर ए न्यू अमेरिकन सिक्योरिटी को लिखा था ‘‘भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु तनाव कम करने और अमेरिकी लोगों एवं क्षेत्र के मूलभूत ढाचें के खिलाफ आतंकी हमलों को रोकने में अमेरिका का हित शामिल है।

निजी सूचनाओं की सुरक्षा का बंदोबस्त (उमेश चतुर्वेदी)

August 31, 2017 0
निजी सूचनाओं की सुरक्षा का बंदोबस्त

(उमेश चतुर्वेदी)

(साभार  दैनिक जागरण )
आधार कार्ड की अनिवार्यता के खिलाफ सर्वोच्च अदालत में दायर याचिका में याचिकाकर्ताओं का एक तर्क यह भी रहा है कि आधार कार्ड के जरिए जो लोगों के निजी आंकड़े इकट्ठा किए जा रहे हैं, उनसे लोगों के निजता के अधिकार का उल्लंघन होता है। मनमोहन सिंह सरकार द्वारा सरकारी योजनाओं के लिए आधार कार्ड को जरूरी बनाने की शुरुआत से ही इसका विरोध शुरू हो गया। मगर विरोध का तार्किक आधार इतने दूर तक जा पहुंचेगा कि सर्वोच्च न्यायालय को अलग से यह भी सोचना-देखना पड़ेगा कि निजता का आधार भी मौलिक अधिकारों की तरह है या नहीं और अब सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया है कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हासिल जीने का अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का ही हिस्सा है। आधार के लिए आंकड़ों का इकट्ठा किया जाना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है या नहीं, बेशक अभी फौरी तौर पर इस सवाल का जवाब नहीं मिल पाया है, लेकिन इस एक फैसले ने आधार को लेकर भावी फैसले की थोड़ी सी तस्वीर तो साफ कर ही दी है। साफ है कि अब आधार को लेकर रही सोच पर एक विराम तो जरूर लगेगा।

इस फैसले की महत्ता को इसी से समझा जाना चाहिए कि मामले की सुनवाई नौ जजों की संविधान पीठ ने किया। इस फैसले की एक और अहम बात है कि यह सर्वसम्मति से आया है। इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश जे.एस. खेहर, जस्टिस जे. चेलमेश्वर, जस्टिस एस.ए.बोबडे, जस्टिस आर.के. अग्रवाल, जस्टिस आर.एफ. नरीमन, जस्टिस ए.एम. सप्रे, जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एस. अब्दुल नजीर शामिल हैं। इस पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के दो फैसलों को भी खारिज किया है, जिसके तहत निजता को पहले मौलिक अधिकार नहीं माना गया था। पहला फैसला 1954 में एम.पी. शर्मा बनाम भारतीय संघ में आया था, जिसकी सुनवाई छह न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने की थी। इसी तरह दूसरा मामला खड़ग सिंह बनाम भारतीय संघ था, जिसकी सुनवाई आठ जजों की पीठ ने की थी। इस लिहाज से देखें तो इस बार सुनवाई करने वाली संविधान पीठ सबसे बड़ी थी।

भारतीय संविधान ने नागरिकों को छह मौलिक अधिकार दे रखे हैं। इनका वर्णन संविधान के तीसरे भाग में अनुच्छेद 12 से 35 तक में किया गया है। मौलिक अधिकार अनुच्छेद 12, 13, 33, 34 तथा 35 का संबंध अधिकारों के सामान्य रूप से है। हालांकि 44वें संशोधन के पास होने के पहले तक मौलिक अधिकारों को सात श्रेणियों में बांटा जाता था। मगर 44वें संशोधन ने संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाकर सामान्य कानूनी अधिकार बना दिया। इसके बाद से संवैधानिक तौर पर भारतीय नागरिकों को छह मौलिक अधिकार हासिल हैं। इसमें सबसे पहला समानता का अधिकार है, जिसका जिक्र संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 तक में विस्तृत रूप से किया गया है। इसी तरह व्यक्ति को स्वतंत्रता का अधिकार का अधिकार दिया गया है, जिनका पूरा विवरण अनुच्छेद 19 से 22 तक में दिया गया है। इसी में 19क भी है, जिसके तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी अधिकार है। इसी तरह अनुच्छेद 23 से 24 तक में भारतीय संविधान नागरिकों को शोषण मुक्ति का भी अधिकार दिया है। इसी तरह अनुच्छेद 25 से 28 तक में नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता और अनुच्छेद 29 एवं 30 में सांस्कृतिक और शिक्षा हासिल करने का अधिकार दिया गया है। जबकि संवैधानिक उपचारों का अधिकार का जिक्र अनुच्छेद 32 में किया गया है। चूंकि सुप्रीम कोर्ट ही मौलिक अधिकारों का रखवाला है, लिहाजा अब निजता का अधिकार भी संवैधानिक दायरे में शामिल हो गया है।

सर्वोच्च न्यायालय पहले ही कह चुका है कि आधार के तहत जो आंकड़े लिए जा रहे हैं, उनका इस्तेमाल उन्हीं कामों के लिए होना चाहिए, जिनके लिए ये आंकड़े लिए जा रहे हैं। यहां याद कर लेना चाहिए कि भले ही कुछ संस्थाएं और गैर सरकारी संगठन आधार की अनिवार्यता का विरोध कर रहे हों, मार्च 2017 तक देश की करीब 130 करोड़ की आबादी में से 112 करोड़ ने आधार कार्ड या तो हासिल कर लिया था या उसके लिए पंजीकृत हो चुके थे। इस लिहाज से देखें तो आधार कार्ड के सामान्य सेहत पर इस फैसले से कोई असर तो नहीं पड़ने जा रहा, लेकिन चूंकि अब निजता का अधिकार भी संवैधानिक मौलिक अधिकार बन गया है तो कुछ चीजों पर असर पड़े बिना नहीं रहेगा। इसके बाद अब आधार कार्ड की अनिवार्यता को लागू करने के फैसले को भी निजता के इस अधिकार की कसौटी पर परखा जाएगा। सरकार को अब इस दिशा में बेहद सावधानी से फैसले लेने होंगे। जन कल्याण कार्यक्रमों से लाभ प्राप्त करने से लेकर हवाई यात्र तक के लिए आधार कार्ड अनिवार्य करने के सरकार के प्रयासों को तर्कसंगत आधार पर तैयार करना होगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जिस तरह हर अधिकार पूर्ण नहीं होता, उसी तरह निजता का आधार भी पूर्ण नहीं होगा। जिस तरह जघन्य अपराधों में दोष साबित होने के बाद दोषी के जीवन का अधिकार मुल्तवी हो जाता है, उसी तरह दोषी पाए जाने पर भी व्यक्ति के निजता का अधिकार भी निरस्त हो जाएगा। दूसरी तरफ सरकार को अदालत ने अधिकार दिया है कि निजता के अधिकार पर रोक के लिए उसके पास तार्किक आधार होना चाहिए। इसका मतलब हुआ कि ऐसे हर कानून का विश्लेषण और परीक्षण निजता के अधिकार के चश्मे से ही होगा।

इसका एक असर तो यह भी पड़ेगा कि अब नागरिक की निजी जानकारी बिना उसकी सहमति के सार्वजनिक नहीं हो सकेगी। यानी आधार, पैन, क्रेडिट कार्ड आदि में दर्ज जानकारी सार्वजनिक नहीं होगी। अगर ऐसा नहीं होता है तो निजता के हनन की स्थिति में नागरिक के पास अदालत जाने का अधिकार होगा। चूंकि निजता को भी मूल अधिकार मान लिया गया है, इसलिए अब अनुच्छेद-32 या 226 के तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में याचिका दायर करके लोग निजता की सुरक्षा की मांग भी कर सकेंगे। हाल के दिनों में बढ़े सूचना प्रौद्योगिकी के चलते सूचना प्रौद्योगिकी कानून यानी आईटी एक्ट में भी इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स (आई.एस.पी.) की निजता नीति निर्धारित की गई है। इस कानून की धारा 43, 43-ए, 72-ए के तहत आंकड़ों के सुरक्षा का प्रावधान है।(DJ)
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

चीनी वर्चस्व के समक्ष अडिग भारत (हर्ष वी पंत)

August 31, 2017 0
चीनी वर्चस्व के समक्ष अडिग भारत

(हर्ष वी पंत)

(साभार दैनिक जागरण)
सिक्किम के डोकलाम क्षेत्र में भारतीय और चीनी सैन्य बलों में दो माह बाद भी तनातनी की स्थिति है। इतना वक्त बीत जाने के बाद डोकलाम में जमीनी स्तर पर हालात में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। इस बीच बीजिंग का विषवमन लगातार जारी है। उसने भारत के खिलाफ मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ रखा है जिसमें कभी तो भारत को 1962 के युद्ध की याद दिलाई जाती है तो कभी कहा जाता है कि अगर मोदी सरकार चीन की चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए अपने रवैये पर कायम रहती है तो उसे इसके गंभीर नतीजे भुगतने होंगे। चीनी अधिकारियों ने भारतीय मीडिया के प्रतिनिधिमंडल से यह तक कहा कि भूटान ने कूटनीतिक चैनलों के माध्यम से बीजिंग को कथित तौर पर बताया है कि जिस इलाके को लेकर गतिरोध की स्थिति बनी हुई है वह जमीन उसकी नहीं है। स्वाभाविक ही है कि इसकी पुष्टि के लिए उसके पास कोई प्रमाण नहीं। भारत को उकसाने के लिए चीन कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहा है। वह उत्तराखंड के कालापानी क्षेत्र में या लद्दाख में ‘घुसने’ की परोक्ष रूप से धमकी देते हुए कह रहा है कि अगर उसने ऐसा किया किया तो क्या होगा। चीन ने आधिकारिक रूप से पहली बार कश्मीर का इस तरह उल्लेख किया है।

इस आशय का बयान चीनी विदेश मंत्रलय में सीमा एवं सामुद्रिक मामलों के उप-महानिदेशक वेंग वेनिल की ओर से दिया गया था। यह बयान विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की संसद में उस घोषणा के बाद आया था जिसमें उन्होंने कहा था कि युद्ध कोई समाधान नहीं है और चीन के साथ सीमा पर जारी गतिरोध को बातचीत के जरिये ही सुलझाया जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि भारत की तार्किकता को उसकी कमजोरी कतई नहीं समझना चाहिए। चूंकि हम अपने पड़ोयों से दोस्ताना रिश्ते रखना चाहते हैं तो उन्हें भी लक्ष्मण रेखा नहीं लांघनी चाहिए। भारत ने चीन के साथ हमेशा ही बेहतर रिश्ते चाहे हैं, लेकिन सीमाओं का संयोजन इस मामले से जुड़े तीनों पक्षों भारत, चीन और भूटान के परामर्श और सहमति के बाद ही होना चाहिए। इस सबके साथ उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि बीजिंग के अंधाधुंध दुष्प्रचार के आगे नई दिल्ली किसी तरह डरने वाली नहीं है।

भारत और चीन के बीच मौजूदा गतिरोध अतीत के ऐसे वाकयों से अलग है। असल में नई दिल्ली के रवैये ने इसे खास इसलिए बना दिया है, क्योंकि चीन की तमाम हेकड़ियों के बावजूद भारत ने अपना रुख जरा भी नरम नहीं किया है। बीजिंग ने हर तिकड़म आजमा कर देख ली। भारत को उकसाने के लिए उसने अपने सरकारी मीडिया को खुला छोड़ दिया और आधिकारिक रूप से भी धमकाया। उसने अपनी सुविधा के अनुसार औपनिवेशिक इतिहास के आंकड़ों का भी इस्तेमाल किया। वैश्विक जनमत का दांव भी आजमाया, लेकिन भारत टस से मस नहीं हुआ। भारत का यह रवैया वैश्विक व्यवस्था के भविष्य का पूर्वाभास देता है।

चीन से तनातनी केवल संप्रभुता या फिर सीमा को लेकर नहीं है। डोकलाम से निकलने वाले संदेश के मायने इससे भी कहीं बढ़कर हैं। यह तय करेगा कि क्या एशिया के भविष्य में पूरी तरह से चीन का ही वर्चस्व होगा और वह अपनी शर्तो पर ही दूसरे देशों के साथ सुलूक करेगा या फिर एशिया का भविष्य वास्तविक अर्थो में बहुध्रुवीय होगा? चीन बात तो बहुध्रुवीय व्यवस्था की करता है, लेकिन असल में एशिया में अपना एकछत्र राज चाहता है। हाल के वर्षो में सामुद्रिक विस्तार को लेकर अपने अड़ियल रवैये से चीन ने शायद यह समझ लिया है कि इस क्षेत्र और उससे परे उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं है। पश्चिमी देश खुद अपनी समस्याओं से जूझ रहे हैं और वे इस स्थिति में नहीं दिखते कि चीन के समक्ष चुनौतियां खड़ी कर सकें। क्षेत्रीय क्षत्रप भी खासे कमजोर हैं। वे शायद ही चीनी युद्धोन्माद का कोई माकूल जवाब दे सकें। अगर मुकाबले की बात की जाए तो आयान भी महज कागजी शेर ही मालूम पड़ता है। चीन की बांटो और राज करो वाली रणनीति ने भी दक्षिणपूर्व एशिया में जोड़ने के बजाय तोड़ने का ही काम अधिक किया है। चीनी दबाव में आयान द्वारा दक्षिणी चीन सागर में आचार संहिता के लिए अपेक्षाकृत कमजोर और अप्रभावी वार्ता ढांचे पर बनी सहमति हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक बड़ी चुनौती को दर्शाती है। वह भी ऐसे दौर में जब डोनाल्ड ट्रंप की अगुआई में अमेरिका की एशियाई नीति अस्थिर, अस्पष्ट और डांवाडोल नजर आती है।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीनी वर्चस्व की राह में भारत ही ऐसा देश बना हुआ है जो उसके आगे घुटने नहीं टेक रहा। महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव परियोजना के साथ चीन पहले ही उभरते वैश्विक आर्थिक ढांचे के केंद्र में आ गया है। यहां तक कि इसमें शामिल होने वाले देश जब तक इसके नुकसान समझते तब तक उन्हें इस दुष्चक्र से निकलने का कोई कारगर विकल्प नहीं सूझा। एशिया के बड़े देशों में भारत ही इकलौता देश है जिसने शी चिनफिंग की इस महत्वाकांक्षी योजना का सार्वजनिक रूप से विरोध किया। दुनिया के दूसरे बड़े शक्ति केंद्र चीन को लेकर नीतिगत प्रतिक्रिया के मामले में लाचार ही नजर आए। शिंजो एबे की आक्रामक विदेश नीति के बावजूद जापान के हाथ बंधे दिख रहे। ऑस्ट्रेलिया के आर्थिक भविष्य की डोर चीन के साथ इतनी मजबूती से बंधी हुई है कि आज वहां के अभिजात्य वर्ग में यह बहस चल निकली है कि उन्हें अमेरिका और चीन में से आखिर किसको अपना बड़ा साझेदार  बनाना चाहिए? इसके उलट चीन को जवाब देने के मामले में मोदी सरकार ने त्वरित प्रतिक्रिया वाली नीति दर्शाई। उसने तुरंत ताड़ लिया कि चीन विदेश नीति के मोर्चे पर अपनी ही धुनी रमाए हुए है और वह दुराग्रही नीति से बाज नहीं आएगा। ऐसे में अगर नई दिल्ली ने अपनी विदेश नीति का मिजाज नहीं बदला तो भारतीय हितों को नुकसान पहुंचेगा। हालांकि भारतीय बुद्धिजीवियों के एक तबके को अभी भी लगता है कि भारत अपनी नीतियों से चीन को साध सकता है, वहीं कई नीति निर्माता विभिन्न मोर्चो पर चीन की बढ़ती क्षमताओं का आकलन कर रहे हैं।

देर से ही सही भारत ने भी सीमा पर बुनियादी ढांचा विकत करना शुरू कर दिया है और इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन के लिए जापान, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे समान विचारों वाले देशों के साथ अपनी सहभागिता बढ़ा रहा है। इस लिहाज से चीन के साथ संबंधों में डोकलाम गतिरोध एक निर्णायक मोड़ की तरह है। भारत के समक्ष र्फ एक ही विकल्प है कि वह अपने हितों की रक्षा के लिए चीन के सामने मजबूती से खड़ा रहे। अन्यथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीनी वर्चस्व को मानने के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं होगा और यह स्पष्ट ही है कि अधिकांश भारतीय सपने में भी इस विकल्प के बारे में सोचना नहीं चाहेंगे।(DJ)
(लेखक लंदन स्थित किंग्स कॉलेज में इंटरनेशनल रिलेशंस के प्रोफेसर हैं)

निजता : महिलाओं के लिए राहत (माशा)

August 31, 2017 0
निजता : महिलाओं के लिए राहत

(माशा)

सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। नौ जजों वाली संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया है। पीठ ने कहा कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दिए गए जीने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। यह बहस तब शुरू हुई जब केंद्र सरकार ने आधार मामले में कहा था कि निजता यानी प्राइवेसी का अधिकार मौलिक अधिकारों में शामिल नहीं। जाहिर सी बात है, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सभी स्वागत करते हैं। खासकर औरतें। बेशक, औरतों के लिए निजता का अधिकार बहुत मायने रखता है। निजता और निजता के अधिकार ने महिलाओं की कई अर्थो में मदद की है। निजता आजाद और अच्छी जिंदगी का रास्ता दिखाती है। निजता की इसी अवधारणा के जरिए नियम-कानून की विवेचना करके महिलाओं के अधिकारों की रक्षा होती है। मिसाल के तौर पर दिल्ली गैंगरेप के बाद 2013 में बलात्कार कानून में जो संशोधन किए गए (आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013), उनका आधार महिलाओं की निजता और उसका संरक्षण करना ही था। इन संशोधनों में शारीरिक रूप से पीछा करने के अलावा साइबर स्टॉकिंग का विशेष उल्लेख किया गया। यह साफ किया गया कि सरकार यह मानती है कि पीड़ित महिला के लिए निजता का कितना महत्त्व होता है। महिलाओं की निजता का हनन करने के कई तरीके लोग अपनाते हैं। गली-मोहल्ले में छेड़छाड़ करने से आगे बढ़ते हुए उनका पीछा करना और उन्हें चोरी-छिपे देखना भी औरतों की निजता का ही हनन है। कानून में किए गए संशोधनों में ये सभी शामिल हैं। चोरी-छिपे देखने वालों से निपटने के लिए कानून में कहा गया है कि वॉइयूरिज्म (ताक-झांक) या किसी ऐसी स्थिति में महिला की जासूसी करना, जिसमें उसे निजता की उम्मीद है, एक अपराध है। इसी के आधार पर अप्रैल 2016 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने शैलेश नामक एक शख्स को एक साल की सजा दी थी और 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया था। चूंकि वह शौचालय में एक महिला को छिपकर देख रहा था। इसी संशोधन के चलते बलात्कार पीड़ित की सेक्सुअल हिस्ट्री पूछने का रिवाज भी खत्म हुआ। अक्सर लड़की के चरित्र पर उंगलियां उठाई जाती हैं और उसे दुश्चरित्र मानकर फैसले किए जाते हैं।

1979 का मशहूर मथुरा बलात्कार मामला तो इसकी नजीर ही है। इस मामले में 16 साल की आदिवासी लड़की मथुरा का पुलिस हिरासत में बलात्कार हुआ था, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने दो हवलदारों को यह कहकर बरी कर दिया था कि लड़की चूंकि यौन संबंध की आदी रही है, इसलिए उसका बलात्कार नहीं हो सकता। इस मामले में जब समाज सेवियों और वकीलों ने विरोध दर्ज किया तो आपराधिक कानून में ही संशोधन किया गया। कहा गया कि अगर लड़की ने कहा कि उसकी सहमति नहीं थी, तो अदालत भी यह मानेगी कि उसकी सहमति नहीं थी। इसी निजता के अधिकार का ध्यान रखते हुए बलात्कार पीड़िता का नाम गोपनीय रखा जाता है। उसका बयान प्राइवेट में लिया जाता है। आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 164 कहती है कि पुलिसवाले उस पर इस बात का दबाव नहीं बना सकते कि वे लोगों के बीच अपना बयान दे। महिलाओं के लिए इसीलिए निजता का अधिकार बहुत मायने रखता है। इसी के दम पर रिवेंज पोर्न की घिनौनी प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सकती है। इसी साल अप्रैल में दिल्ली विविद्यालय की एक छात्रा ने रिवेंज पोर्न के डर से आत्महत्या कर ली थी। इस समय साइबर बुलिंग पर तो कानून है पर रिवेंज पोर्न पर नहीं। चूंकि रिवेंज पोर्न को अपराध घोषित करने के लिए पीछे भी एक ही धारणा काम करती है- महिला की निजता का अधिकार।

निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है, इसीलिए आईपीसी की धारा 377 के तहत कुछ सेक्सुअल एक्ट्स को अपराध घोषित नहीं किया जाना चाहिए। इस धारा के तहत महिलाओं, पुरु षों और जीव-जंतुओं के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाना अपराध है। इसी आधार पर समलैंगिकों को अपराधी घोषित करने की आशंका बनी रहती है। निजता के अधिकार का हक सभी को है, और सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी पुष्टि की है, क्योंकि इसके साथ महिलाएं मजबूत होती हैं। हर संघर्ष में यह अधिकार उनका साथ देता है, क्योंकि लड़ाई अभी बहुत लंबी है। इसीलिए यह हथियार तेज धार होना बहुत जरूरी है।

एल्गो ट्रेडिंग ?

August 31, 2017 0
एल्गो ट्रेडिंग ?

एल्गो ट्रेडिंग?

ट्रेडिंग कम्प्यूटर प्रोग्राम या एक खास तरह के सॉफ्टवेयर के माध्यम से की जाने वाली शेयरों की खरीद-बिक्री एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग कहलाती है। इस तरह के सॉफ्टवेयर को उचित शेयरों की पहचान और उनकी खरीद-बिक्री के लिए इंसान की जरूरत नहीं होती।

एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग को ऑटोमेटेड ट्रेडिंग, ब्लैक बॉक्स ट्रेडिंग या एल्गो ट्रेडिंग भी कहा जाता है। इसके तहत इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर ट्रेडिंग की जाती है। इसमें ऑर्डर की टाइमिंग, कीमत और मात्रा सभी कुछ पहले से दिया गया होता है। जैसे ही पहले से निर्धारित समय, मात्रा और कीमत से मार्केट की स्थितियां मेल खाती हैं, उसी वक्त ऑटोमेटिक तरीके से ट्रांजैक्शन हो जाता है। ये कम्प्यूटर प्रोग्राम खुद यह तय करते हैं कि कब, कहां और किस शेयर का कारोबार करना है।

कहाँ किया जाता इस तकनीक का प्रयोग?

इसका इस्तेमाल सबसे अधिक इन्वेस्टमेंट बैंकों, पेंशन फंड, म्यूचुअल फंड आदि में किया जाता है। यह इसलिए किया जाता है, ताकि बड़े ट्रेड को कुछ हिस्सों में बांटकर छोटे-छोटे हिस्सों में ट्रेड किया जा सके, जिससे कि मार्केट इंपैक्ट और रिस्क को मैनेज किया जा सके।

साल 2008 से डायरेक्ट मार्केट एक्सेस की अनुमति मिलने के बाद एल्गोरिद्मिक ट्रेडिंग को बढ़ावा मिला है। मिली सेकंड के भीतर ही ऐसे सॉफ्टवेयर आर्बिट्रेज के मौकों की तलाश कर सौदों को अंजाम दे डालते हैं।

सेबी के द्वारा किये जा रहे उपाय:

भारतीय प्रतिभूति एवं विनियम बोर्ड सेबी ने बाजार में उचित व्यवहार के लिए एक समिति का गठन किया है जो बाजार की निगरानी और एल्गो ट्रेडिंग के नियमों को मजबूत करने के उपाय सुझाएगी। समिति का चेयरमैन पूर्व विधि सचिव टी के विश्वनाथन को बनाया गया है। समिति भेदिया कानून प्रतिबंध, धोखाधड़ी और अनुचित व्यापार व्यवहार निषेध नियमनों में सुधार के उपाय भी सुझाएगी। इसके अलावा समिति को भेदिया कारोबार नियमनों और कंपनी कानून के प्रावधानों के बीच तालमेल के लिए भी सिफारिशें देनी होंगी।

सेबी ने बयान में कहा कि समिति बाजारों में निगरानी को बेहतर करने के लिए लघु और मध्यम अवधि के उपाय सुझाएगी। इसके अलावा वह ऊंची ट्रेडिंग के मुद्दों, निगरानी में प्रौद्योगिकी और विश्लेषण के इस्तेमाल के बारे में भी अपने सुझाव देगी। विश्वनाथन की अगुवाई वाली समिति चार महीने में अपनी रिपोर्ट देगी।

वित्त मंत्रालय का रुख:

वित्त मंत्रालय ने शेयर बाजारों और कारोबारियों से कहा है कि एल्गोरिद्म कारोबार के मामले में नैतिकता जरूरी है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि जोखिमपूर्ण और गैर-प्रतिस्पर्धी कारोबार को नियंत्रित करने के लिये नीतियां विकसित करने की जरूरत है। आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने कहा कि नीति निर्माताओं और पूंजी बाजार नियामक सेबी को ऐसी नीतियां बनानी चाहिये जिसे सभी बाजार भागीदारों को भेदभाव-रहित, उचित और समान पहुंच सुनिश्चित हो।

अन्य प्रमुख तथ्य:

बोस्टन स्थित आइट ग्रुप एलएलसी (Aite Group LLC) के अनुसार, 2006 में यूरोपियन यूनियन और अमेरिका में हुए कुल ट्रेड का एक तिहाई ट्रेड ऑटोमेटिक एल्गोरिद्म से ही हुआ। 2006 में लंदन स्टॉक एक्सचेंज में 40 प्रतिशत से भी अधिक की ट्रेडिंग ऑटोमेटिक एल्गोरिद्म से हुई थी।

अमेरिकन मार्केट और इक्विटी मार्केट में किसी अन्य मार्केट से काफी अधिक एल्गो ट्रेड होता है।